शुक्रवार, दिसम्बर 13, 2019

चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना का भारत नें फिर किया बहिष्कार, जाने कारण

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कविता
कविता ने राजनीति विज्ञान में स्नातक और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। वर्तमान में कविता द इंडियन वायर के लिए विदेशी मुद्दों से सम्बंधित लेख लिखती हैं।

चीन में नियुक्त भारत के राजदूत ने कहा कि “राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महत्वकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव भारत की वाजिब चिंताओं, सम्प्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान नहींए करती है। भारतीय राजदूत विक्रम मिश्री ने अगले माह चीन में आयोजित दूसरी बीआरआई बैठक में शामिल होने से इंकार कर दिया है।

इस आयोजन में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान, इटली और सिंगापुर के प्रधानमंत्री के शामिल होने की सम्भावना है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स में भारतीय राजदूत से पुछा गया कि भारत की बीआरआई को लेकर क्या जटिल अवधारणा है?

इस बाबत राजदूत ने कहा कि “सब ऊपर, कनेक्टिविटी पहल सम्प्रभुता, समानता, और राष्ट्रों की क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर आधारित होनी चाहिए। कोई भी देश ऐसी पहल में शामिल नहीं होना चाहेगा जिसमे उसके देश की वाजिब चिंताओं जैसे सम्प्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को नज़रअंदाज़ किया जाए।”

उन्होंने कहा कि “ईमानदारी से बताऊ तो हमने अपने विचारो को दबा कर नही रखा है और बीआरआई पर हमारी स्थिति स्पष्ट और तर्कयुक्त है। इस बाबत हमने सम्बंधित विभागों को अवगत करा दिया है। भारत कनेक्टिविटी को मजबूत करने की वैश्विक इच्छा रखता है, जो हमारी आर्थिक और कूटनीतिक पहल का एक महत्वपूर्ण भाग है। हम अपने क्षेत्र के कई देशों और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों के साथ कनेक्टिविटी पहल पर काम कर रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि “बहरहाल, कनेक्टिविटी पहल सार्वभौमिक मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय कानून, सुशासन और नियम कानून पर आधारित होने चाहिए। इसमें सामाजिक स्थिरता, पर्यावरण संरक्षण, कौशल प्रचार, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, खुलेपन के सिद्धांतों, पारदर्शिता और वित्तीय स्थिरता को बढ़ावा देना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि “चीन के बाजार में भारत के उत्पादों और सविधाओं को पंहुच मिली है जिससे दोनों सेधों के बीच 58 अरब डॉलर का वित्तीय घाटा कम हुआ है। चीन के बाज़ारों में भारतीय उत्पादों और सुविधाओं की अधिक पंहुच के लिए भारत चीनी पक्ष के साथ कार्य कर रहा है। इसमें कुछ प्रगति हुई है और चीन ने कुछ कृषि उत्पादों के आयात की अनुमति दी है।”

राजदूत ने कहा कि “भारत को चीनी बाजार में आईटी उत्पादों और सुविधाओं व भारतीय फार्माटिकल्स पंहुच पाने की बाधाओं के बाबत बातचीत की जरुरत है। कई चीनी कंपनियां भारत में अच्छा कारोबार कर रही है। सिओमी और अन्य  चीनी कंपनियां भारत में सबसे बड़े मोबाइल वितरकों में से एक है। हम इन कंपनियों का भारत में उत्पादन इकाई स्थापित करने का स्वागत करते हैं, जो व्यापार घाटे में कमी करने में योगदान करेंगे।”

उन्होंने कहा कि “हम इंफ्रास्ट्रक्चर में चीनी निवेश को और अधिक देखना चाहेंगे, मसलन सड़क, रेलवे, इंडस्ट्रियल पार्क और फ़ूड प्रोसेसिंग सेक्टर हैं। हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में भी हम चीनी निवेश का स्वागत करना चाहेंगे। चीन और भारत कई क्षेत्रों में सहयोग किया है। दोनों देशों ने विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर सहयोग को भी मज़बूत किया है। इसमें पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापर और आतंकवाद के लड़ाई शामिल है।

बेल्ट एंड रोड का हिस्सा क्यों नहीं है भारत?

वन बेल्ट वन रोड़ योजना
इस चित्र में आप देख सकते हैं चीन की बेल्ट एंड रोड योजना किस प्रकार भारत को घेरती है

चीन की वन बेल्ट वन रोड योजना का भारत शुरुआत से ही बहिष्कार कर रहा है। इसके सबसे मुख्य कारण है: चीन पाकिस्तान आर्थिक मार्ग (सीपीईसी)

सीपीईसी का यह मार्ग भारतीय राज्य जम्मू कश्मीर से होकर गुजरता है। यह इलाका वर्तमान में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आता है, लेकिन भारत इसे अपना हिस्सा मानता है।

भारत नें शुरुआत में चीन को साफ़ कहा था कि भारत की अनुमति के बिना चीन इस मार्ग का निर्माण नहीं कर सकता है। इसके बावजूद चीन नें इस मार्ग का निर्माण किया है और इसे चीन के शिनजियांग से पाकिस्तान के कराची में स्थित ग्वादर बंदरगाह से जोड़ दिया है।

इसके अलावा अन्य कारण यह है कि भारत को लगता है कि इस योजना से भारत के आस-पास वाले देशों में चीन का प्रभुत्व बहुत ज्यादा बढ़ जाएगा

उदाहरण के तौर पर, चीन नें श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह का विकास किया था इसे बनाने में 1 अरब डॉलर के लगभग खर्च आया था। जब श्रीलंका समय पर चीन का कर्ज चुकाने में असमर्थ रहा, तब चीन नें इस बंदरगाह का संचालन अपने हिस्से में ले लिया।

ऐसे में भारत को लगता है कि चीन हिन्द महासागर इलाके में अपना प्रभुत्व जमाने के लिए इन देशों को भारी कर्जा दे रहा है और धीरे-धीरे इनमें अपनी पैठ ज़माना चाहता है

श्रीलंका के अलावा चीन नें मालदीव में भी भारी निवेश किया था। मालदीव की अब्दुल्ला यामीन की सरकार नें चीन से भारी लोन लिया था। हाल ही में मालदीव की नवनिर्वाचित इब्राहीम सोलिह की सरकार नें भारत की मदद से चीन का कर्ज चुकाया है।

इसके अलावा चीन अफ्रीकी देशों में भी भारी निवेश कर रहा है

अफ्रीकी देशों में चीन द्वारा किया गया निवेश
अफ्रीकी देशों में चीन द्वारा किया गया निवेश (स्त्रोत: ब्रुकिंग)

अफ्रीका के अलावा चीन यूरोपीय देशों में भी भारी निवेश कर रहा है। हाल ही में इटली नें चीन की बेल्ट एंड रोड योजना से जुड़ने का एलान किया है।

ऐसे में भारत को लगता है कि इतनी बड़ी मात्रा में चीन का प्रभुत्व भारत की संप्रभुता के लिए ठीक नहीं है

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