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महेश भट्ट: “सड़क 2” मेरे लिए नयी शुरुआत नहीं है

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मशहूर निर्देशक-निर्माता महेश भट्ट ने आखिरी बार 1999 में आई फिल्म ‘कारतूस’ का निर्देशन किया था। जबसे लेकर अब तक उन्होंने बॉलीवुड में कई प्रतिभाशाली लोगो को पाला है। अब वह एक बार फिर फिल्म “सड़क 2” से निर्देशक की कुर्सी पर बैठने वाली हैं लेकिन उनका कहना है कि फिल्म एक निर्देशक के तौर पर उनका कमबैक नहीं है।

सड़क 2” 1991 में आई ब्लॉकबस्टर फिल्म ‘सड़क’ का सीक्वल है। IANS से बात करते हुए, उन्होंने कहा-“मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं 20 साल बाद वापस आकर ‘सड़क 2’ का निर्देशन करूँगा लेकिन आपको पता है, मैं इसे अपनी दूसरी पारी या फिल्ममेकर के रूप में एक नयी शुरुआत कहने के लिए इच्छुक नहीं हूँ। ये बस हो गया। मुझे नहीं पता आने वाला कल क्या लाएगा लेकिन मैं निश्चित रूप से बहुत सारी स्क्रिप्ट वाले उस दौर में वापस नहीं जा रहा हूँ जहाँ मै फिल्मो का निर्देशन ही करता रहूँगा।”

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उन्होंने इस साल संजय नाग द्वारा निर्देशित फिल्म ‘योर्स ट्रूली’ से अभिनय की शुरुआत भी की है जिसमे उनकी पत्नी सोनी राजदान भी नज़र आएँगी।

अभिनय में डेब्यू करने पर उन्होंने कहा-“मैं खुद चौक गया था जब संजय ने मुझे कॉल किया और बहुत ईमानदारी से मुझे ‘योर्स ट्रूली’ में एक भूमिका निभाने का आग्रह किया। यह एक स्पेशल अपीयरेंस है। मैंने उनसे कहा कि, ‘देखिए, मैं अभिनेता नहीं हूँ। मैं हमेशा कैमरे के पीछे रहा हूँ, लेकिन अगर आपको लगता है कि मैं इस हिस्से के लिए फिट हूँ, तो मैं इसे आपके लिए करूंगा’।”

“प्रस्ताव को ‘हां’ कहने के कारणों में से एक मेरे दिल के काफी करीब है। यह पहली बार है जब मेरी पत्नी सोनी एक फिल्म में मुख्य भूमिका निभा रही है और मुझे उसी फिल्म में एक भूमिका की पेशकश की गई थी। मेरे बच्चों को अपने माता-पिता को एक साथ ऑन-स्क्रीन देखने का मौका मिलेगा।”

भट्ट ने कई शानदार फिल्में बनाई है जिसमे ‘डैडी’, ‘जख्म’, ‘हम है राही प्यार के’ और ‘गुमराह’ जैसी फिल्में भी शमी है। उनकी फिल्मो में सितारों से ज्यादा कहानी को महत्त्व दिया गया है। उन्होंने कहा कि वह सितारों की ताकत से ज्यादा कहानी में यकीन करते हैं।

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उनके मुताबिक, “मुझे लगता है कि हमें यह समझने में जीवन भर लगता है कि अगर यह पृष्ठ में नहीं है, तो यह मंच में नहीं है। भले ही कुछ भी हो, कहानी को काम करना ही है। सभी पात्र, सितारे, हम फिल्म को कैसे आगे बढ़ा रहे हैं, बाद में आता है। यदि कहानी समग्र रूप से काम करती है, तो चीजें अपने आप प्रवाहित होंगी।”

“लेकिन फिर, एक अच्छी कहानी एक चमत्कार है, निश्चित रूप से एक अच्छी कथा का मंथन करना आसान नहीं है।”

क्या ये अधिक चुनौतीपूर्ण नहीं है?

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उन्होंने कहा-“हां, ये चुनौतीपूर्ण है। अगर आप सिनेमा बना रहे हो जो व्यक्तिगत है, जो बाज़ार की दिशा के अनुरूप नहीं चलता, ये हमेशा चुनौतीपूर्ण होता है और आपको दुनिया से ये उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वह इसे बनाने के लिए आपके लिए रेड कारपेट बिछायेंगे। लेकिन फिर आता है विकल्प। आपको एक फिल्ममेकर होने के नाते, फैसला लेना पड़ता है। तब फिल्ममेकर का यकीन आता है।”

“तो फिल्म तभी बनाइये जब आपको कहानी में यकीन हो क्योंकि आपके लिए दो तरह की चुनौती इंतज़ार कर रही हैं। शुरुआत में, फिल्म बनाने के लिए पैसा लेना। फिर आखिर में, अच्छी रिलीज़ लेना। ये महंगा है। लेकिन बिना अच्छी रिलीज़ के, आप दर्शको तक नहीं पहुंचोगे। हां, फिल्में बनाना मुश्किल सफ़र है।”

 

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