टैकनोलजी

कंप्यूटर नेटवर्क में पैकेट स्विचिंग और डिलेज क्या हैं?

पैकेट स्विचिंग क्या है? (packet switching in computer network in hindi)

पैकेट स्विचिंग वो प्रक्रिया है जिसके द्वारा डाटा को किसी नेटवर्क में भेजा जाता है। डाटा को वेरिएबल लेंथ के छोटे-छोटे टुकड़ों यानी कि पैकेट में तोड़ने का कारण है-

  • डाटा ट्रान्सफर तेज गति से हो,
  • डाटा ट्रान्सफर की एफिशिएंसी अधिक हो, और
  • ट्रांसमिशन लेटेंसी कम हो।

डेस्टिनेशन पर पहुँचते ही इन सभी छोटे टुकड़ों यानी कि समान फाइल के पैकेट्स को reassemble किया जाता है। एक पैकेट के अंदर बहुत सारे payloads के साथ साथ और भी जरूरी सूचनाएं रहती है। इसके लिए कोई पहले से सेट-अप या फिर संसाधनों केरिजर्वेशन कि कोई जरूरत नहीं होती।

पैकेट स्विचिंग पैकेट्स को स्विच करते समय Store and Forward तकनीक का प्रयोग करते हैं और प्रत्येक पैकेट को भेजने यानी ट्रान्सफर करने से पहले सूए तोरे कर लिया जाता है फिर आगे भेजा जाता है।

ये तकनीक बहुत ही प्रभावशाली है क्योंकि ऐसा हो सकता है कि किसी hop पर जाकर पैकेट खो जाए। सोर्स और डेस्टिनेशन के बीच एक से ज्यादा रास्ते भी संभव हो सकते हैं।

सभी पैकेट सोर्स और डेस्टिनेशन का एड्रेस अपने पास रखे रहते हैं जिसका इस्तेमाल करते हुए वो स्वतंत्रतापूर्वक नेटवर्क में यात्रा करते हैं। दूसरे श्स्ब्दों में कहे तो एक ही फाइल से सम्बन्धित सारे पैकेट्स हो सकता है कि अलग-अलग रास्तों से होकर डेस्टिनेशन तक पहुंचे। अगर किसी भी रास्ते में congestion है तो पैकेट्स को ये स्वतन्त्रता रहती है कि वो अभी वाले रास्ते से हटकर नेटवर्क के अंदर ही कोई और रास्ता चुन ले।

सर्किट switched नेटवर्क कि कमजोरियों को हटाने के लिए ही पैकेट स्विच नेटवर्क का डिजाईन किया गया था क्योंकि सर्किट switched नेटवर्क छोटे संदेशों को भेजने में उतने प्रभावशाली नहीं थे।

पैकेट स्विचिंग और सर्किट स्विचिंग (packet switching and circuit switching in hindi)

पैकेट स्विचिंग इन मामलों में सर्किट स्विचिंग से बेहतर है:

  • ये bandwidth के मामले में ज्यादा एफ़्फ़िकिएन्त है क्योंकि रिजर्वेशन सर्किट का यहाँ पर कोई कांसेप्ट नही है।
  • इसके ट्रांसमिशन की लेटेंसी बहुत ही कम है जो कि अच्छी बात है।
  • ज्यादा भरोसेमंद डेस्टिनेशन खोये हुए पैकेट्स को डिटेक्ट कर सकते हैं।
  • इसमें फाल्ट tolerant भी ज्यादा है क्योंकि अगर कोई लिंक डाउन हो तो पैकेट किसी और रास्ते को फॉलो कर सकते हैं। ये चीज सर्किट स्विचिंग में नहीं है।
  • ये खर्च के मामले में भी सही है और इसके सेट-अप में सर्किट स्विचिंग की तुलना में कम खर्च होते हैं।

पैकेट स्विचिंग इन मामलों में सर्किट स्विचिंग से कमतर है:

  • पैकेट स्विचिंग पैकेट्स को क्रम में नहीं भेजता है जबकि सर्किट स्विचिंग में पैकेट्स एक ही रस्ते को फॉलो करते हुए बिलकुल क्रम मे जाते हैं।
  • चूँकि पैकेट क्रम में नहीं होते इसीलिए हमे हर पैकेट को एक सीक्वेंस संख्या देनी होती है ताकि डेस्टिनेशन जब उसे reassemble करे तो उसे आसानी हो।
  • एक से ज्यादा रास्तों को फॉलो करने की छूट के कारण हर नोड पर कोम्प्लेक्सिटी भी ज्यादा होती है।
  • रि-रूटिंग के कारण ट्रांसमिशन डिले भी इसमें ज्यादा होता है।
  • पैकेट स्विचिंग केवल छोटे-छोटे संदेशों के लिए ही बेहतर है लेकिन जब डाटा बड़े हों तो सर्किट स्विचिंग का विकल्प चुनना ही अच्छा है।

पैकेट स्विचिंग की मोड्स (packet switching modes in hindi)

पैकेट स्विचिंग के दो मोड हैं जिनकी चर्चा एक-एक कर के नीचे कि गई है।

  1. कनेक्शन-ओरिएंटेड पैकेट स्विचिंग (virtual circuit)

ट्रांसमिशन को शुरू करने से पहले ये सिग्नलिंग प्रोटोकॉल का प्रयोग करते हुए सेंडर और रिसीवर के बीच एक लॉजिकल रास्ता या वर्चुअल संपर्क स्थापित कर लेता है और इस से सम्बन्धित जितने भी पैकेट होने वो इसी पहले से परिभाषित रास्ते को फॉलो करते हैं। स्विच या राऊटर द्वारा इस वर्चुअल कनेक्शन की पहचान करने के लिए एक वर्चुअल सर्किट आईडी दी जाती है। डाटा को छोटे छोटे यूनिट में विभाजित कर दिया जाता है और बाद में सभी यूनिट को दिए गये अलग-अलग सीक्वेंस संख्या कि मदद से पहचाना जाता है। ये पूरी प्रक्रिया इन तीन फेज में पूरी होती है:

  • सेट-अप,
  • डाटा ट्रान्सफर, और
  • tear डाउन फेज।

सारे एड्रेस सूचनाओं को केवल सेट-अप फेज में ही ट्रान्सफर किया जाता है। डेस्टिनेशन तक जाने वाले रूट को खोजा जाता है और फिर सभी बीच में आने वाले नोड्स के स्विचिंग टेबल में एंट्री डाली जाती है। डाटा ट्रान्सफर के समय पैकेट हेडर (लोकल हेडर) के पास लेंथ, टाइम्समैप, सीक्वेंस संख्या जैसे सूचनाएं हो सकती है।

कनेक्शन-ओरिएंटेड स्विचिंग सबस इ ज्यादा उपयोगी switched WAN में साबित होता है। कुछ और प्रसिद्द प्रोटोकॉल्स जो वर्चुअल सर्किट का प्रयोग करते हैं वो हैं; X.25, फ्रेम-रिले, एटीएम और मल्टी प्रोटोकॉल लेबल स्विचिंग (MPLS)।

2. कनेक्शन-लेस पैकेट स्विचिंग (datagram)

कनेक्शन-ओरिएंटेड पैकेट स्विचिंग के विपरीत कनेक्शन-लेस पैकेट स्विचिंग में हर एक पैकेट के पास एड्रेस सम्बन्धी सारी जरूरी सूचनाएं होती है जैसे कि सोर्स एड्रेस, डेस्टिनेशन एड्रेस, पोर्ट संख्या इत्यादि।

डाटा ग्राम में प्रत्येक पैकेट को अलह-अलग स्वतंत्र रूप से देखा जाता है। एक फ्लो से जुड़ा हुआ पैकेट हो सकता है कि कोई दूसरा रास्ता ले ले क्योंकि rout का निर्णय dynamically लिया जाता है।

इसीलिए डेस्टिनेशन पर पहुँचने वाले पैकेट क्रम से बहार हो सकते हैं। इसके पास कोई कनेक्शन सेट-अप और tear डाउन फेज नहीं होता जैसा कि वर्चुअल सर्किट में होता है।

कनेक्शन-लेस पैकेट स्विचिंग में पैकेट के डिलीवर होने यानी कि सफलतापूर्वक डेस्टिनेशन तक पहुँचने कि कोई गारंटी नहीं होती। इसीलिए भरोसेमंद डिलीवरी के लिए सिस्टम में अतिरिक्त प्रोटोकॉल्स का जोड़ा जाना जरूरी होता है।

पैकेट स्विचिंग में डिले (delay in packet switching in hindi)

पैकेट स्विचिंग में निम्नलिखित delays होते हैं:

ट्रांसमिशन डिले (transmission delay)

लिंक में पैकेट को डालने में जितना समय लगता है उसे ट्रांसमिशन delay कहते हैं। इसका मललब हुआ डाटा बिट को वायर या कम्युनिकेशन माध्यम में डालने में लगा समय। ये पैकेट कि लेंथ और नेटवर्क के बैंडविड्थ पर निर्भर करता है।

Transmission Delay = Data size / bandwidth = (L/B) second

Propagation delay

पहले बिट के द्वारा सेंडर से रिसीवर एंड तक पहुँचने हेतु लिए गए समय को propagation delay कहते हैं। इसका मतलब हुआ बिट्स के शुरूआती पॉइंट से डेस्टिनेशन तक पहुँचने का समय। ये दूरी और propagation कि गति पर निर्भर करता है।

Propagation delay = distance/transmission speed = d/s

Queuing डिले

ये क्वो समय है जो कोई जॉब queue में होता है और एक्सीक्यूट होने से पहले चाहता है। ये congestion पर निर्भर करता है। Queuing डिले का अर्थ हुआ डाटा के डेस्टिनेशन तक पहुचने और एक्सीक्यूट या प्रोसेस होने के बीच का समय। इसके तीन कारण हो सकते हैं-

  • originating Switches
  • इंटरमीडिएट Switches, और
  • कॉल रिसीवर सर्विंग Switches
Average Queuing delay = (N-1)L/(2*R)
where N = no. of packets
      L=size of packet
      R=bandwidth

प्रोसेसिंग डिले (processing delay)

routers को पैकेट हेडर को प्रोसेस करने में जितना समय लगता है उसे ही प्रोसेसिंग डिले कहते हैं।

पैकेट्स कि प्रोसेसिंग उसके ट्रांसमिशन के समय होने वाले बिट लेवल एरर को पकड़ने में मदद करती है। तेज गति के राऊटर को ये कार्य करने में एक माइक्रो सेकंड या फिर उस से भी कम समय लगता है।

Total time or End-to-End time  
= Transmission delay + Propagation delay+ Queuing delay
                                  + Processing delay

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यह पोस्ट आखिरी बार संसोधित किया गया August 8, 2018 12:38

अनुपम कुमार सिंह

बीआईटी मेसरा, रांची से कंप्यूटर साइंस और टेक्लॉनजी में स्नातक। गाँधी कि कर्मभूमि चम्पारण से हूँ। समसामयिकी पर कड़ी नजर और इतिहास से ख़ास लगाव। भारत के राजनितिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक इतिहास में दिलचस्पी ।

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