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    difference between uefi and cmos in hindi

    बेसिक इनपुट आउटपुट सिस्टम यानी कि BIOS जल्द ही विलुप्त होना जा रहा है क्योंकि इंटेल ने अपने सारे चिपसेट में 2020 तक इसे UEFI यानी यूनिफाइड एक्सटेंसिबल फर्मवेयर इंटरफ़ेस से रिप्लेस करने का एलान कर दिया है।

    अब आगे हम आपको बतायेंगे कि UEFI और BIOS क्या है और कैसे दोनों अलग हैं एक-दूसरे से।

    दोनों ही UEFI और BIOS लो लेवल सॉफ्टवेर हैं जो तब स्टार्ट होते हैं जब आप अपने सिस्टम यानी पीसी को अपने ऑपरेटिंग सिस्टम को बूट करने से पहले बूट करते हैं।

    लेकिन UEFI एक आधुनिक हल है जो बड़े हार्ड ड्राइव्स को सपोर्ट करता है और तेज गति से बूट होता है और इसमें सुरक्षा के फीचर भी ज्यादा हैं।

    इसके साथ ही इसमें ग्राफ़िक्स और माउस कर्सर भी काफी अच्छे होते हैं।

    आपको ये जान कर हैरानी होगी कि अभी जो नये पीसी बाजार में बिक रहे हैं और जो UEFI के साथ आ रहे हैं वो भी यूजर को कोई confusion ना हो इसीलिए इसे BIOS ही लिखते हैं ताकि ऐसे यूजर जो पुराने वाले के प्रयोग के आदि हैं वो भी इसे खरीदने में नहीं हिचकें।

    इसीलिए अगर आपका पीसी BIOS टर्म का प्रयोग करता है तब भी अगर आपने अभी उसे खरीदा है तो वो UEFI पर चलेगा- ज्यादा चांस इसी बात के हैं। आपको बताते हैं कि क्यों।

    BIOS क्या है?

    बेसिक इनपुट आउटपुट सिस्टम यानी BIOS एक लो लेवल सॉफ्टवेर है जो आपके कंप्यूटर के मदरबोर्ड के चिप में निवास करता है। जब आपका कंप्यूटर शुरू होता है तब BIOS लोड होता है और आपके कंप्यूटर के सारे हार्डवेयर को जगाने के लिए भी BIOS ही जिम्मेदार होता है।

    ये इस बात को सुनिश्चित करता है कि वो सब अच्छी तरह से फंक्शन कर रहे हैं। फिर ये बूटलोडर को रन करता है जो आपके विंडोज या जो भी ऑपरेटिंग सिस्टम आपने इनस्टॉल किया हुआ है, उसे बूट करता है।

    आप BIOS सीप स्क्रीन में कई तरह के सेटिंग को कॉन्फ़िगर कर सकते हैं। कंप्यूटर के हार्डवेयर कॉन्फ़िगरेशन, सिस्टम टाइम, बूट लोडर जैसे सेटिंग यहीं पर मौजूद होते हैं।

    आप इस स्क्रीन को कंप्यूटर के बूट होते समय अपने कीबोर्ड से एक ख़ास key को प्रेस कर के एक्सेस कर सकते हैं जो कि अलग-अलग कंप्यूटर में अलग-अलग हो सकता है- Esc, F2, F10, या Delete. जब आप किसी सेटिंग को सेव करते हैं तो ये आपके मदरबोर्ड के मेमोरी में ही सेव होता है।

    जब आप अपने कंप्यूटर को बूट करते हैं तब BIOS आपके पीसी को इन सेव किये हुए सेटिंग से कॉन्फ़िगर करता है।

    BIOS आपके ऑपरेटिंग सिस्टम को बूट करने से पहले एक POST यानी कि पॉवर ओन सेल्फ टेस्ट से होकर गुजरता है।

    ये आपके हार्डवेयर कॉन्फ़िगरेशन के सही होने की जांच करता है और देखता है कि ये सही से कार्य कर रहा है या नहीं।

    अगर कुछ गलत हो तो आपको कोई एरर मैसेज दिखेगा या बीप साउंड की आवाज आयेगी। आपको कंप्यूटर के मैन्युअल में देख कर ये पता करना होगा कि किस तरह के या किस क्रम में आने वाले बीप किस सेटिंग किस तरफ इशारा करते हैं।

    जब आपका कंप्यूटर बूट होता है और जब POST पूरा हो जाता है तब BIOS एक मास्टर बूट रिकॉर्ड या MBR के लिए देखता है जो बूट डिवाइस में स्टोर होते हैं और इसके प्रयोग से ही बूटलोडर को लांच किया जाता है।

    आपने कहीं-कहीं- इस से सम्बन्धित एक टर्म CMOS देखा होगा जिसका मतलब होता है कोम्प्लिमेंटरी मेटल ऑक्साइड सेमीकंडक्टर।

    ये बैटरी द्वारा बैक किये गये मेमोरी की तरफ इशारा करता है जहां BIOS मदरबोर्ड में तरह-तरह के सेटिंग स्टोर किये हुए होता है।

    ये अब एक्यूरेट नहीं होता क्योंकि इस मेथड को आजकल के सिस्टम में फ़्लैश मेमोरी से रिप्लेस कर दिया गया है जिसे EEPROM भी कहा जाता है।

    BIOS आउटडेटेड क्यों है?

    BIOS इसीलिए आउटडेटेड हो गया है क्योंकि UEFI इस से बहुत ही अच्छा और सही ढंग से काम करता है। BIOS के उपर UEFI की कुछ खासियत निम्नलिखित है:

    • साइज़ की कोई लिमिट नहीं होती: UEFI फर्मवेयर 2.2TB से लेकर ठोरितिकल रूप से 9.4 जीटाबाइट तक के ड्राइव को बूट कर सकता है। ये इन्टरनेट पर मौजूद सारी सूचनाओं का लगभग तीन गुना है।ऐसा इसीलिए सम्भव हो पता है क्योंकि GPT अपने टेबल में 64 बिट की एंट्री का प्रयोग करता है जिस से बूट डिवाइस साइज़ बहुत ही ज्यादा बढ़ जाता है।
    • गति और परफॉरमेंस: UEFI 32 बिट और 64 बिट दोनों ही मोड में रन कर सकता है और इसमें BIOS से ज्यादा एड्रेस करने लें एड्रेस स्पेस होते हैं जिसका मतलब हुआ कि आपके बूट की प्रक्रिया तेज गति से होगी।
    • यूजर फ्रेंडली इंटरफ़ेस: चूँकि UEFI 32 बिट और 64 बिट- दोनों ही मोड में रन कर सकता है, ये एक अच्छा UI कॉन्फ़िगरेशन देता है जिसमे अच्छा ग्राफ़िक्स तो होता ही है साथ-साथ वो माउस कर्सर को भी सपोर्ट करता है।
    • सुरक्षा: UEFI इसके साथ ही सिक्यूरिटी बूट की सुविधा भी देता है। ये केवल ऑथेंटिक ड्राइवर्स और सर्विसेज को ही बूट होने समय लोड होने की अनुमति देता है जिस से ये सुनिश्चित हो सके कि कंप्यूटर के स्टार्ट होने पर कोई मैलवेयर लोड नहीं हो। ये ड्राइवर्स और केर्नेल्स के डिजिटल सिग्नेचर को भी देखता है जिसके कारण पायरेसी और बूट सेक्टर मैलवेयर को काउंटर करने के लिए ये एक असरदार टूल साबित होता है।

    इस लेख से सम्बंधित यदि आपका कोई भी सवाल या सुझाव है, तो आप उसे नीचे कमेंट में लिख सकते हैं।

    By अनुपम कुमार सिंह

    बीआईटी मेसरा, रांची से कंप्यूटर साइंस और टेक्लॉनजी में स्नातक। गाँधी कि कर्मभूमि चम्पारण से हूँ। समसामयिकी पर कड़ी नजर और इतिहास से ख़ास लगाव। भारत के राजनितिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक इतिहास में दिलचस्पी ।

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