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Resort Politics in India: “जन-प्रतिनिधि मस्ती में, भले फिर आग लगे जनता की बस्ती में”

Resort Politics Episode in Maharashtra

Resort politics: महंगी वोल्वो बसों में भर कर कहीं नेता…. रिजॉर्ट (resort) या कोई महंगा होटल… चार्टर्ड प्लेन… और फिर मीडिया का हुजूम…. यह ऐसा दृश्य है जो पिछले कुछ वर्षों में आपकी TV की स्क्रीन पर खूब दिखे हैं।

भारतीय राजनीति में नेताओं की “हॉर्स ट्रेडिंग (Horse Trading) ” होने या “हॉर्स ट्रेडिंग (Horse trading)” से बचाने- दोनों के लिए यह कदम उठाए जाते हैं। लेकिन क्या यह भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ के लिहाज़ से सही है? उत्तर है- नहीं!

इसको समझने के लिए Resort Politics के ताजा-तरीन एपिसोड जो महाराष्ट्र में जारी है, उसको उदाहरण के तौर पर समझते हैं। शिवसेना के बागी विधायक जिस असम के आलीशान महंगे होटल में भारी सुरक्षा के बीच कैम्प कर रहे हैं, वह असम बाढ़ से बुरी तरह जूझ रहा है और आम जनता अपना घर, परिवार, रोज़गार सब कुछ खो रही है।

पहले इस पूरे “मुम्बई टू गुवाहाटी वाया सूरत” वाले एपिसोड पर औसतन न्यूनतम खर्च को समझिए। सूरत में ये विधायक होटल ली मेरीडियन में रुके थे जहाँ औसतन एक कमरे का 24 घंटे का किराया 5000₹/- मान लिया जाए।.. यहाँ 47 कमरे हैं, ऐसा होटल ने अपने वेबसाइट पर लिखा है। फिर 400 से ज्यादा गुजरात पुलिस के जवान इनकी सुरक्षा में लगा दिए गए। खाना-पीना व अन्य सुख सुविधाओं पर खर्च अलग से…..

फिर ये विधायक सूरत से गुवाहाटी चार्टर्ड प्लेन से पहुंचे हैं। Business Today में छपे रिपोर्ट के अनुसार, सूरत से गुवाहाटी के लिए 30 सीटों वाली चार्टर्ड प्लेन का खर्च लगभग 40 लाख रुपये हैं तथा 8 सीटों वाली प्लेन का खर्च 17-18 लाख रुपए है। इसके ऊपर 18% GST अलग से चार्ज होता है।

विधायकों की संख्या एकनाथ शिंदे के मुताबिक 42 हैं जो गुवाहाटी पहुंचे हैं। तो इस हिसाब से औसतन 65-70 लाख रुपये खर्च हुए हैं बस सूरत से गुवाहाटी यात्रा पर…

गुवाहाटी पहुँच कर ये विधायक वहाँ से सबसे अच्छे होटलों में से एक रेडिसन ब्लू में रुके हैं। Times now news के अनुसार यहाँ इन विधायकों के लिए 70 लक्ज़री कमरे 7 दिन के लिए बुक हैं। खाने पीने व सारी सुविधाओं को मिलाकर औसतन ₹1.12 करोड़ का खर्च यहाँ भी अपेक्षित है। फिर भारी सुरक्षा बल की तैनाती है, वह अलग….

आखिर इतना पैसा आ कहाँ से रहा है और कौन कर रहा है यह फंडिंग? क्या इसपर कोई ED या NIA की जाँच नहीं होनी चाहिए? सनद रहे यह सब उंस वक़्त पर हो रहा है जब असम भयंकर बाढ़ के चपेट में है और जनता त्राहिमाम कर रही है।

Resort Politics का लंबा है इतिहास

Karnataka is termed as Hub Of Resort Politics
कर्नाटक को Hub of Resort Politics कहा जाता है; तस्वीर 2019 की (साभार : Times of India)

उपरोक्त खर्च के आँकड़े बस एक राज्य महाराष्ट्र तक महदूद नहीं है। Resort Politics अब धीरे धीरे भारतीय राजनीति में धीरे धीरे एक सामान्य प्रक्रिया के तरह खुद को स्थापित करते जा रही है।

सच है कि यह कोई नई बात नहीं है।  पिछले कुछ सालों में इसकी आवृत्ति बढ़ गयी है। 80 के दशक में भी हरियाणा में ताऊ देवीलाल की इंडियन नेशनल लोक दल (INLD) और तत्कालीन बीजेपी ने गठबंधन की सरकार बनाने के लिए 48 विधायकों को दिल्ली के एक बड़े होटल में जमा कर लिया था।

फिर भी बहुमत साबित नहीं कर पाए क्योंकि आखिरी समय मे एक विधायक फिल्मी स्टाइल में पानी के पाइप के सहारे होटल से भाग निकलने में सफल गो गया था। यह कहानी भारतीय राजनीति में “Horse Trading” और ” Resort Politics” की न सिर्फ बानगी थी, बल्कि एक नजीर भी।

उसके अगले साल यानि 1983 में “Resort Politics की झलक कर्नाटक में दिखी जिसकी पुनरावृत्ति कुछ अर्थों में 2019 में भी देखने को मिली थी। उसके बाद आंध्रप्रदेश, गुजरात, बिहार आदि सभी राज्यों में सरकारों को गिराने के लिए “Resort Politics” या विधायकों की होटल में लामबंदी की गई।

महाराष्ट्र में भी यह 2002 में हो चुका है और अभी 2022 में फिर से उसी “Resort Politics” का सहारा लिया जा रहा है।

लोकतंत्र और “अंतरात्मा की आवाज”

महाराष्ट्र में जारी ताजा राजनीतिक उठा-पटक सिर्फ महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश के लोकतंत्र के संदर्भ में नुकसानदेह है। हालाँकि यह पहला वाकया नहीं है जब सत्ता को गिराने और हथियाने का खेल हुआ हो; ना ही यह कोई नई बात है। कर्नाटक और मध्यप्रदेश इसके सबसे ताजा उदाहरण हैं और अब बारी महाराष्ट्र की आई है।

यह सच है कि सत्ता-सुख के लालच में राजनीति के खिलाड़ी “अंतरात्मा की आवाज” सुनकर पहले भी सरकारें गिराते और बनाते रहे हैं परंतु इन दिनों पिछले 7-8 साल में यह खेल सत्ता और राजनीति के धुरंधरों को कुछ ज्यादा ही भा गया है

2016 से लेकर अब तक 5 ऐसे राज्यों- उत्तराखंड (2016), अरुणाचल प्रदेश (2016) गोआ (2017), कर्नाटक(2019), मध्यप्रदेश (2020)- में सफलतापूर्वक चुनी हुई या संवैधानिक रूप से गठित सरकारों का तख्तापलट हो चुका है जबकि 3 मर्तबा- दिल्ली(2017), पश्चिम बंगाल(2020), राजस्थान(2020)- यह कोशिश नाकामयाब रही है।

इनमें से कई को “ऑपेरशन लोटस” का नाम दिया गया यानि कि बीजेपी, जो केंद्रीय सत्ता में है, उसके दबाव के आगे दूसरे दलों के नेताओं ने अपनी पार्टियों से बगावत कर के पाला बदल लिया है।

अभी महाराष्ट्र में जारी धमा-चौकड़ी के पीछे क्या वजह हैं, यह स्पष्ट होना बाकि हैं। क्या इसे शिवसेना के भीतर अंदरूनी फूट मानी जाए या फिर यहाँ भी “ऑपेरशन लोटस” का जलवा?

बागी विधायकों के तेवर और उनका मुम्बई से गुवाहाटी वाया सूरत तक का सफ़र इसी ओर इशारा कर रहा है कि “आपरेशन लोटस” ही असली वजह है; हालाँकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि आगे क्या होगा।

भारतीय जनता पार्टी इस पूरे प्रकरण पर मुखर होकर नहीं बात कर रही है लेकिन मौन भी नहीं है क्योंकि पूरा मामला विधायकों के संख्याबल के गुणा-गणित का है। अतीत में NCP के अजित पवार के साथ हाँथ मिलाकर बीजेपी ठोकर खा चुकी है इसलिए वह “वेट एंड वॉच” के हालात में है।

Resort Politics की शिकार “बेचारी जनता”

अब इन सभी प्रकरणों (Resort Politics) में मध्यप्रदेश, राजस्थान और अभी महाराष्ट्र के मामले को ध्यान में रखिये कि यह सब तब हो रहा जब तक देश की जनता सरकार से आर्थिक और नीतिगत मदद के लिए उनकी तरफ़ मुँह किये खड़ी है लेकिन सरकार-महोदय सत्ता के खेल में उलझे हुए हैं।

देश की अर्थव्यवस्था कोरोना के कारण घरों में कैद थी और ऑक्सीजन के अभाव में हुई मौतों के कारण लाशें नदियों में तैर रही थी; लोगों का रोजी-रोजगार पर आफत था तथा 80 करोड़ लोग एक वक्त के भोजन के लिए सरकार के PDS के आगे झोली फैला रहे थे, उस वक़्त भी ये “जनसेवक” मध्यप्रदेश में सत्ता गिराने और सरकार बनाने के खेल में मशगूल थे।

अभी असम में भी एक तरफ आम जन के घर उजड़ रहे है, प्रजा त्राहिमाम कर रही है, हर तरफ़ पानी ही पानी है… दूसरी तरफ़ उसी असम के धरती से आलीशान होटलों में बैठे ये “जनता के सेवक” ढाई साल सरकार चलाने के बाद “अंतरात्मा की आवाज” पर सरकार गिराने और बनाने की कवायद में जुटे हैं।

Resort Politics: “Two Wrongs never make a Right”

कुछ लोग इस वाकये को पुराने इतिहास की घटनाओं (Resort Politics से जुडी) की दुहाई देकर जायज़ ठहरा सकते हैं। अगर यह सब पहले कभी भी हुआ था तो भी गलत था और आज भी हो रहा है तब भी गलत है। जनता के साथ विश्वाघात उनके अपने ही प्रतिनिधियों द्वारा तब भी हुआ था और आज भी हो रहा है। अगर तब “बुरे दिन” थे तो आज भी कोई “अच्छे दिन” नहीं है… फिर आखिर बदला क्या?

आज की हालात ज्यादा संवेदनशील है। कोरोना की मार, गिरती अर्थव्यवस्था, भीषण बेरोजगारी और अनियंत्रित महँगाई- ने जनता को पहले ही त्रस्त कर रखा है ऊपर से “राजनीतिक छलावा” और सत्ता-लालच में पानी के तरह बहाया जा रहा है पैसा- कुल मिलाकर वर्तमान में सरकारों की “नीति और नियत” दोनों पर सवाल खड़ा करता है।

यह ना तो भारतीय राजनीति के लिहाज से उचित है ना ही समाज के विकास के लिए। क्योंकि जब सरकारें बदलती हैं या गिरती हैं तो सिर्फ चेहरे नहीं बदलते बल्कि बदलती है- सरकार की नीतियां… सरकार के कार्यकलाप में प्राथमिकताएं… जिनका सीधा असर पड़ता है वहाँ की जनता के उपर।

भारतीय राजनीति के इस नए फैशन – “Resort Politics” को लेकर यह कहना कतई अनुचित नहीं होगा कि – “जनता के सेवक जन-प्रतिनिधि मस्ती में, भले फिर आग लगे जनता की बस्ती में”|

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Saurav Sangam

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