Thu. Feb 2nd, 2023
    Judiciary vs Centre

    Judiciary Vs Govt: विगत कई महीनों से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और भारतीय न्यायपालिका के बीच लगातार टकराव स्पष्ट दिख रहा है। आये दिन किसी ना किसी बहाने सरकार के तरफ़ से कोई ना कोई टिप्पणी आ ही जा रही है।

    इस बार बुधवार को उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ द्वारा दिये गए एक बयान ((VP Jagdeep Dhankar’s Remark Over Judiciary) ने आग में घी डालने का काम किया है। उपराष्ट्रपति ने यह बयान उस वक़्त में दिया है जब सरकार की ओर से लगातार सुप्रीम कोर्ट के कॉलिजियम सिस्टम (Collegium System) पर सवाल उठाये जा रहे हैं।

    श्री धनखड़ ने राजस्थान विधानसभा में अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में दिए अपने भाषण में सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करते हुए कहा कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को लेकर केंद्रीय संसद द्वारा 2015 में बनाये कानून को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निरस्त किये जाने को लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया।

    श्री धनखड़ ने कहा कि दुनिया मे कहीं भी ऐसा नहीं देखा गया कि लोकतंत्र में संसद द्वारा पारित किसी कानून को दूसरी किसी संस्था ने रद्द कर दिया हो।

    उन्होंने कहा,

    “..1973 में एक गलत परंपरा पड़ी, तब केशवानंद भारती के केस में सुप्रीम कोर्ट ने मूलभूत ढांचे का विचार (Doctrine of Basic Structure of Constitution) रखा…. संसद, संविधान में संशोधन कर सकती है लेकिन मूलभूत ढांचे में नहीं।”

    कुल मिलाकर उनका इशारा इस तरफ था कि न्यायपालिका (Judiciary) केंद्र की शक्तियों में इसी मूलभूत ढांचे को लेकर दखल करती है।

    राज्यसभा के चेयरमैन श्री धनखड़ ने इस से पहले 07 दिसंबर को राज्यसभा में दिए गए अपने पहले वक्तव्य में भी इसी मुद्दे को रेखांकित किया था। उन्होंने तब भी NJAC एक्ट का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) द्वारा ख़ारिज किये जाने को संसद की स्वायत्तता और आम जनमानस की भावनाओं की गरिमा के ख़िलाफ़ बताया था।

    उपराष्ट्रपति श्री धनखड़ के बयान से कुछ दिन पहले केंद्रीय कानून मंत्री ने भी सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति पर बड़े ही कड़े शब्दों में प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि अगर सुप्रीम कोर्ट खुद ही अपनी नियुक्तियाँ करना चाहता है तो फिर वह अपनी सिफारिशें भी हमारे पास न भेजे।

    Judiciary Vs Govt: NJAC एक्ट को लेकर खींचतान

    दरअसल आज से 07 साल पहले केंद्र सरकार ने संसद में संविधान संशोधन कर ऊपरी अदालतों में न्यायधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (National Judiciary Appointment Commission- NJAC) के गठन का प्रावधान किया था।

    मगर सर्वोच्च न्यायालय ने उसे मानने से इनकार करते हुए ख़ारिज कर दिया था। तब से ही सरकार और न्यायपालिका (Govt Vs Judiciary) के बीच मौके-बेमौके तल्खी सामने आती रही है।

    सरकार का कहना है कि संवैधानिक संस्थाओं के सर्वोच्च और महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां सरकार करती है। उसी तर्क पर ऊपरी न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भी सरकार की सहमति से होनी चाहिए। इसी लिए सरकार ने NJAC कानून का प्रावधान किया जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था।

    दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय को आशंका है कि अगर न्यायधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ेगा तो न्याय प्रक्रिया में बाधा पहुंचेगी और राजनीतिक दवाब या सरकार के प्रति निष्ठा के कारण समुचित न्याय की संभावना भी प्रभावित होगी।

    असल मे कॉलिजियम व्यवस्था (Collegium System) इसलिए ही बनाई गई थी क्योंकि न्यायालय के मामले में खासकर जजों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ने लगा था, जिसे लेकर लगातार सवाल खड़ा होने लगा था।

    पर दूसरी तरफ यह भी है कि चूंकि जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं, इसलिए इसमें भी ‘फेवरेटिज्म (Favoritism)’ तथा भाई-भतीजावाद (Nepotism) की संभावना प्रबल होती है।

    Collegium System: जिसके तहत होती है जजों की नियुक्ति

    दरअसल कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) न्यायधीशों की नियुक्ति और उनके स्थानांतरण से जुड़ी एक ऐसी प्रणाली है जो किसी सवैधानिक कानून या  संसद के अधिनियम से नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसलों से उत्पन्न हुआ है।

    कॉलेजियम, भारत के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों के एक समूह को कहते हैं। यह समूह ही सुप्रीम कोर्ट के जजों की नई नियुक्ति करती है। हाई कोर्ट में भी जजों की नियुक्ति भी कॉलेजियम के सलाह से ही होती है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश व राज्य के राज्यपाल शामिल होते हैं।

    हालांकि ऐसा नहीं है, कि कॉलेजियम प्रणाली से जजों की नियुक्ति में सरकार को शामिल नहीं किया जाता है। बल्कि कॉलेजियम जिन नामों को नियुक्त करने के लिए तय करती है, उसे वह सरकार के पास ही भेजती है। सरकार उस पर तमाम जांच जैसे IB आदि के साथ पुख्ता करती है फिर उन नामों पर मुहर लगाती है।

    यही पर न्यायपालिका (Judiciary) और सरकार (Central Govt) के बीच टकराव का वह मैदान तैयार होता है जिसे लेकर आजकल खींचतान चल रही है। बीते कुछ दिनों से सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि वह कॉलेजियम द्वारा भेजे गए नामों वाली फाइल्स दबा कर बैठ जा रही है। केंद्रीय कानून मंत्री का हालिया बयान इसी संदर्भ में था।

    जहाँ तक NJAC कानून की बात है तो सुप्रीम कोर्ट को अधिकार प्राप्त है उन तमाम कानूनों की समीक्षा करने का जो संविधान के मूल-भूत ढांचे (Basic Structure of Constitution) से सबंधित हो। इसी न्यायिक-समीक्षा के अधिकार के तहत ही सर्वोच्च न्यायालय ने NJAC कानून को रद्द कर दिया था।

    इसलिए, NJAC कानून को लेकर केंद्र सरकार या उनके किसी भी प्रतिनिधि का सर्वोच्च न्यायालय पर लगातार हमले करना “खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे” जैसी बात है। इसके लिए संसद की संप्रभुता और स्वायत्तता की दुहाई देना यक़ीनन निरर्थक बात लगती है।

    अव्वल तो यह कि उपराष्ट्रपति महोदय श्री जगदीप धनखड़ द्वारा यह सब कही जा रही हैं जो एक संवैधानिक पद पर आसीन हैं, न कि केंद्रीय मंत्रिमंडल का हिस्सा हैं। उन्होंने अपने जीवन मे राजनीति के अलावे वक़ालत को ही पेशा चुना था, इसलिए उनसे तो कानूनी समझ की अपेक्षा और बढ़ जाती है। ऐसे में उनका न्यायालय के ऊपर तथा संविधान के मूल-भूत ढांचे (Basic Structure) के ऊपर टिप्पणी उनके स्तर से काफ़ी हल्का मालूम पड़ता है।

    सुप्रीम कोर्ट को भारतीय संविधान का आखिरी वाचक तथा संरक्षक कहा जाता है। उसका कर्तव्य है कि वह संविधान की मूल भावना की रक्षा करे। NJAC कोई पहला कानून नहीं है जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने ख़ारिज किया है।

    संसद और न्यायपालिका (Parliament & Judiciary)दोनों ही इस लोकतंत्र के अभिन्न अंग है। इसलिये जरूरी है कि दोनों की शक्तियों और अधिकारों का दायरा अपनी अपनी जगह बनी रहे। इसे लेकर केंद्र सरकार (Centre) और न्यायपालिका (Judiciary) में जारी निरंतर टकराव कदापि ही उचित नहीं है।

    By Saurav Sangam

    | For me, Writing is a Passion more than the Profession! | | Crazy Traveler; It Gives me a chance to interact New People, New Ideas, New Culture, New Experience and New Memories! ||सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ; | ||ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ !||

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