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    Jobless Growth in India

    [email protected]: 15 अगस्त 1947 की सुबह से लेकर इस साल स्वतंत्रता का 75वां सालगिरह मनाने जा रहे भारत ने इस दौरान तमाम चुनौतियों का बखूबी समाधान निकाला है।

    हमसाया मुल्कों चीन और पाकिस्तान द्वारा कई दफ़ा सैन्य आक्रमण का मुँहतोड़ जवाब देना, खाद्य पदार्थों के लिए आत्मनिर्भरता, परमाणु सुरक्षा, खेल की दुनिया में हॉकी के बाद क्रिकेट और अन्य कई स्पर्धाओं में विश्व विजेता बनना, दुनियाभर के बाजार में भारतीय उत्पादों का उपलब्ध होना, दुनिया के बड़ी कंपनियों के सीईओ के ओहदे र भारतीयों का जलवा आदि तमाम ऐसे अनगिनत उपलब्धियां हैं जिसे लेकर भारत एक मुल्क के तौर पर अपनी सफलता की गाथा लिख सकता है।

    यह सब और भी सुखद एहसास देता है कि आज़ाद भारत ने जहाँ से शुरुआत की थी, उसके परिप्रेक्ष्य में यह तमाम उपलब्धियां निश्चित ही अभिमान के लायक है। भारत ने जब ब्रिटानिया हुकूमत से आज़ादी के बाद एक स्वतंत्र मुल्क के तौर पर अपना सफ़र शुरू किया तब देश मे न खाने को पर्याप्त अनाज था ना पहनने को कपड़ा।

    भारत @ 1947
    A picture showing the legacy or impacts of Partition of India (Image Source: The New Yorker)

    धर्म के आधार पर हुए विभाजन के बाद हुए दंगो के दंश के बीच समाज के तौर पर भी जाति, धर्म, ऊंच, नीच, लिंग-विभेद आदि तमाम चुनौतियों से जूझ रहा था। ग़रीबी और भुखमरी से जूझ रहे देश में आये दिन तमाम महामारियों और कुपोषण के कारण आमजन की औसत जीवन प्रत्याशा (Average Life Expectancy) मात्र 32 साल थी।

    स्वतंत्र भारत की जनता में औसत साक्षरता दर महज 12% थी। महिलाओं की हालात तो और भी बुरी थी। हालात यह कि जब प्रथम आम चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग ने लोगों का नाम लिखना शुरू किया तो महिलाएं अपना नाम तक नहीं बता पा रही थीं। वजह कुछ सामाजिक उलझनें, शर्म और निरक्षरता। लिहाजा निर्वाचन आयोग ने उनको मताधिकार देने के लिए “श्याम की माँ, मंगल की धर्मपत्नी, राधे की बहन आदि आदि” संज्ञा का प्रयोग अपने मतपत्र में किया।

    अब इन तमाम चुनौतियों को ध्यान में रखकर तत्कालीन भारत का एक खाका दिमाग मे बनाया जाए और फिर उसे आज के वर्तमान भारत से तुलना की जाए तो निःसंदेह भारत ने एक राष्ट्र के तौर पर पाताल से लेकर आसमान तक कई नए आयाम हासिल किए हैं जो स्वप्न सरीखा लगता है।

    आज भारत चहुँमुखी विकास की दौड़ में है और यह निश्चित ही हर भारतीय के लिए गर्व की बात है। परंतु रोज़गार सृजन के मोर्चे पर हालात आज भी नहीं बदले हैं। बल्कि आज की जनसंख्या और साक्षरता के संदर्भ में यह आज और भी भयंकर हो गईं है।

    1947 का भारत कृषि आधारित अर्थव्यवस्था (Agriculture Based Economy) था। तब भारत की साक्षरता दर मात्र 12 % थी जिसका सीधा मतलब था कि एक बड़ी जनसंख्या सिर्फ खेती या कोई मजदूरी जैसे काम ही कर सकती थी।

    परंतु आज हालात बदल गए हैं। आज भारत मे अनुमानतः 79% आबादी साक्षर है। परंतु इस आबादी का एक बड़ा हिस्सा बेरोजगार है। पिछले 5 सालों के आंकड़े बताते हैं कि भारत का कुल बेरोजगारी दर 7-8% रहा है जो 1.4 अरब की आबादी वाले देश के लिए निश्चित ही चिंताजनक है।

    ऐसा नहीं है कि भारत की अर्थव्यवस्था ने तरक्की नहीं की है। आज भारत एक सर्विस (53.89% of GVA) आधारित अर्थव्यवस्था है जिसमें औद्योगिक क्षेत्र (25.92% of GVA) और कृषि तथा अन्य सम्बद्ध क्षेत्र (20.19% of GVA) का कुल योगदान भी अकेले सर्विस क्षेत्र के योगदान से कम है।

    यह दर्शाता है कि भारत ने इन 75 सालों में तरक्की तो खूब की है लेकिन GDP/GVA की विकास दर ने सरकारों का सृजन या विघटन तो जरूर किया लेकिन इसकी वजह से नई नौकरियों का सृजन नहीं हो पाया है।

    भारत ने जब 1991-92 के दौरान अपने अर्थव्यवस्था को प्राइवेट सेक्टर के लिए और लचीला बनाया तो अचानक से रोजगार-अवसर बढ़े। नतीजतन भारत में लोग अपने बच्चों को इंजीनियरिंग या मैनेजमेंट जैसे कोर्स में बड़ी संख्या में प्रवेश दिलाने लगे।

    फिर एक वक्त आया कि भारत मे शिक्षित और कौशल पूर्ण युवाओं की एक ऐसी फौज तैयार हो गई जिनकी संख्या के हिसाब से भारत की अर्थव्यवस्था रोजगार के नए अवसर पैदा करने में सक्षम नहीं रह गया। सरकारी नौकरियों में दिन व दिन कटौती ने इस समस्या को और भी विकट बनाने का काम किया।

    आज हालात यह है कि भारत मे बेरोजगारी का आलम पिछले चार दशकों में सर्वाधिक है। इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट में ग्रेजुएट युवा आज सड़कों पर ठाकरे खाने पर मजबूर है। इन तमाम बातों को साबित करने के लिए आपको किसी रिपोर्ट या रिकॉर्ड की जरूरत नहीं है बल्कि अपने चारों तरफ़ नजर घुमाकर देखने मे हज़ारों की तादाद में ऐसे फौज दिख जाएंगे।

    अब तो यह समस्या आये दिन सड़कों पर दिख जाता है जब कहीं युवाओं का जत्था रोजगार की मांग करते हुए नागपुर से दिल्ली तक पदयात्रा करते दिख जाता है तो कहीं चक्का जाम और सरकारी संपत्ति का नुकसान करने लगता है।

    अभी हाल में सरकार की अग्निपथ योजना के विरोध में युवा सड़कों पर था और यह स्पष्ट था कि प्रदर्शनकारी युवा बस सेना भर्ती वाले नहीं बल्कि उसकी आड़ में उपरोक्त समस्या से पीड़ित तमाम उम्र के युवाओं का आक्रोश था।

    लोकतंत्र का 75वां वर्षगाँठ (India @ 75) मनाने जा रहे भारत को इन युवाओं की फिक्र करनी होगी। आने वाले 25 साल जो भारत के आज़ादी के 75 से 100वें वर्षगाँठ के बीच का दौर है, यह काफी चुनौती भरा है।

    इस आज़ादी के अमृतकाल में रोजगार के उचित अवसर का सृजन नहीं हो पाया तो आज के ये बेरोजगार युवा 5-10 साल बाद अर्थव्यवस्था के ऊपर बोझ बन जाएंगे और फिर जिस GDP/GVA दर का दम्भ सरकारें भरती हैं, वह भी नीचे आने लगेगा।

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