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Bulldozer in UP: विधि द्वारा स्थापित कानून (Rule of Law) के कितना संगत है यह त्वरित कार्रवाई?

Bulldozer Model in UP

Bulldozer in UP: उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित “बुल्डोजर -ड्राइव” सुर्खियों के लिहाज़ से काफी अच्छा लगता है। एक नज़र में यह एक मजबूत सरकार की क्षवि को भी और मजबूत करता हुआ मालूम पड़ता है। हिंदी मीडिया से लेकर एक खास विचारधारा के लोग इसके पक्ष में तमाम क़सीदे पढ़ते हैं।

मसलन अभी ताजातरीन मामला प्रयागराज में हुए बुल्डोजर की कार्रवाई को ही लें तो पूरे दिन सोशल मीडिया पर इस “एक्शन” के लिए भांति-भांति के उपमा-उपमेय छापे गए। किसी ने कहा “जुम्मे के बाद शनि (Saturday After Friday)” तो किसी ने इसे उपद्रवियों को मिला “Return Gift” बताया।

पर सवाल यह है कि क्या यह वाकई इतना खुश होने वाला विषय है? क्या हम आप इस देश के लोकतंत्र के एक इकाई हैं, एक नागरिक के तौर पर इस पूरे प्रक्रिया को कानून व संविधान के नियमों वाले चश्में से देखने की कोशिश कर रहे हैं?

जवाब है- नहीं। तमाम सवाल है जो हम खुद से नही करते जैसे क्या प्रयागराज के जावेद का घर बस इसलिए गिरा दिया गया क्योंकि उसपर आरोप थे कि उसने हिंसा भड़काया है। हमे आरोपी और गुनाहगार के फर्क को समझने के लिये किसी PhD की डिग्री की आवश्यकता नहीं है।

“Connecting the Dots” of Bulldozer Drive

Bulldozer demolishes the properties of Accused in Kanpur and Saharanpur Riots
सहारनपुर और कानपुर हिंसा के आरोपियों के घर भी चले Bulldozer (Image Credit: The National Bulletin)

उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा चलाये जा रहे बुल्डोजर-मुहीम (Bulldozer Drive) के विभिन्न आयामों को जोड़कर देखें तो यह समझते देर नहीं लगेगी की असामाजिक तत्व, प्रदर्शन, उपद्रव, अवैध निर्माण के नाम पर जिन लोगों को टारगेट किया जा रहा है वे ज्यादातर एक खास धर्म-विशेष से आते हैं।

फिर सरकार के इस कार्रवाई के तौर तरीकों को देखें तो स्पष्ट है कि कहीं ना कहीं विधि द्वारा स्थापित कानून के राज्य (Rule of Law) तथा कानून की उचित प्रक्रिया (Due process of Law) जैसे मौलिक लोकतांत्रिक अवधारणाओं के खिलाफ है।

नुपुर शर्मा के भड़काऊ बयान के बाद उत्तर प्रदेश में हुए प्रदर्शन के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार ने त्वरित व कठोर निर्णय लेने वाली सरकार का तमगा चमकाने के लिए कानपुर, सहारनपुर व प्रयागराज तीनों जगह एक ही पैटर्न मिला।

मुख्य आरोपियों को अवैध निर्माण के लिए नोटिस और उसके महज 24 घंटे के अंदर घरों को जमींदोज कर दिया गया। अवैध निर्माण के आरोपी व्यक्ति को कोर्ट कचहरी में अपनी बात रखने का भी कोई मौका नहीं दिया जबकि यह एक संवैधानिक प्रक्रिया है।

बुल्डोजर से कार्रवाई (Bulldozer Drive) पर दूसरा सवाल यह खड़ा होता है कि अगर यह कार्रवाई अवैध निर्माण को लेकर है तो यह सिर्फ चुन-चुनकर कुछ लोगों को ही टारगेट कैसे किया जा रहा है। क्या सिर्फ इन्ही लोगों ने अवैध निर्माण कर रखे हैं जो असामाजिक गतिविधियों में शामिल होने के आरोपी हैं?

तीसरा सवाल अगर कही दंगे-फ़साद हो रहे हैं तो उसमें दोनों पक्षो के लोग शामिल होंगे पर कार्रवाई की लिस्ट देखकर लगता है कि सिर्फ एक धर्म-विशेष के लोग ही असामाजिक हैं (अपवादों को छोड़ दिया जाए तो).. ऐसा कैसे हो सकता है।

चौथा, अगर गलती मान भी ली जाए कि किसी एक व्यक्ति ने की है तो घर गिराकर उसकी सजा पूरे परिवार को क्यों दी जाए? क्या यह सब परिवार के अन्य लोगों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ नहीं है?

प्रयागराज में हिंसा के बाद मुख्य आरोपी राजनीतिक कार्यकर्ता व व्यापारी जावेद पर हुए कार्रवाई के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर ने इसे पूर्णतया गैरकानूनी बताया। साथ ही इसे विधि द्वारा स्थापित कानून के राज के खिलाफ बताया।

मजबूत सरकार की क्षवि को दुरुस्त करने के चक्कर मे बुल्डोजर ड्राइव द्वारा कार्रवाई की प्रक्रिया UP से होकर दिल्ली व मध्य प्रदेश में भी पहुँच गया है जिसकी बानगी जहांगीरपुरी हिंसा व खरगौन हिंसा में क्रमशः देखने को मिला था।

 किंकर्तव्यविमूढ़ है अदालतें…

सरकारों व अधिकरणों के इस कार्रवाई के मद्देनजर देश के 3 बड़े अदालतों- इलाहाबाद हाईकोर्ट, मध्य प्रदेश हाइकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट- में चुनौती दी गयी है। मामला “मौलिक अधिकारों” और “विधि द्वारा स्थापित कानून की प्रक्रिया” जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक बिंदुओं से जुड़े होने के बावजूद अदालतें किंकर्तव्यविमूढ़ होकर इन याचिकाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार और उसके नुमाइंदे बुल्डोजर मॉडल के सहारे न्याय कर रहे हैं जो देश के अदालतों की जिम्मेदारी है जबकि महत्वपूर्ण अदालतें इस मौके पर चुप्पी साधे बैठी है।

हैरानी होती है कि छोटी छोटी बातों पर कोर्ट की अवमानना का केस बनाकर लोगो को तलब करने वाली ये अदालतें जाने किसका इन्तेजार कर रही हैं। इस से बड़ी बात कोर्ट की अवमानना के लिहाज से क्या हो सकती है जब कोई उनके हिस्से का काम अपने हाँथो में ले ले।

बुल्डोजर मॉडल (Bulldozer in UP): लोकतंत्र में आस्था पर सवाल

कुल मिलाकर बुलडोजरों की गरज के शोर में लोकतांत्रिक आवाज़ों को कहीं ना कहीं दबाया जा रहा है। अदालतों और समाज की चुप्पी, सरकारों का स्वघोषित न्यायिक रवैया और घरों के साथ जमींदोज होती भावनाएं लोगों का देश की लोकतंत्र में आस्था व न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास को चोट पहुंचा रही है।

अगर ऐसे ही सब कुछ चलता रहा तो सरकारें तो जरूर मजबूत हो जाएंगी (जिस बात की कोशिश का नतीजा है बुल्डोजर मॉडल) परंतु इस देश मे लोगों का उस लोकतंत्र पर से भरोसा दरक जाएगा जिसे हासिल करने के लिए हमने विदेशी हुकूमतों से असंख्य कुर्बानियों के बाद हासिल किया था।

बुल्डोजर मॉडल (Bulldozer Model) के नुमाइंदे और उसके तारीफ में कसीदे गढ़ने वाले लोगों के लिए बशीर बद्र की एक लाइन एडिट कर के सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है।

वायरल:

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते उस पर बुल्डोजर चलाने में।

ओरिजिनल:-

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में….

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Saurav Sangam

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