दा इंडियन वायर » राजनीति » “संसद में चर्चा” की चर्चा: संसद सत्र की घटती मर्यादा और कम होती उपयोगिता चिंता का विषय
राजनीति विशेष

“संसद में चर्चा” की चर्चा: संसद सत्र की घटती मर्यादा और कम होती उपयोगिता चिंता का विषय

संसद सत्र के दौरान हंगामे की तस्वीर

संसद में चर्चा: 25 जुलाई को मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के चार लोकसभा सांसदों को पूरे मानसून सत्र तथा उसके अगले दिन राज्यसभा में 19 सांसदों का एक हफ्ते के निलंबन के बाद एक बार फिर आसार नजर आ रहे हैं कि पिछले साल के तरह इस साल भी संसद का मानसून सत्र हंगामे के भेंट चढ़ सकता है।

इन सांसदों पर आरोप है कि सदन में विरोध जताते हुए अध्यक्ष/चेयरमैन के आगे महंगाई आदि के प्लेकार्ड लेकर प्रदर्शन कर रहे थे और सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाने का काम किया है।

इन सब के बीच आरोप-प्रत्यारोप का जंग जारी है। विपक्ष का कहना है कि सरकार जरूरी विषयों जैसे महंगाई, बेरोजगारी, गिरता रुपया, GST आदि जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा से भाग रही है। वहीं सरकार के मंत्री इसी तरह का आरोप विपक्ष पर लगा रहे हैं कि विपक्ष सदन को चलने देना नहीं चाहती और हंगामा करती है जिसके कारण चर्चा संभव नही है।

संसद की कार्यवाही और आर्थिक नुकसान

संसद की मर्यादा भंग करने के आरोप में 4 कांग्रेसी सांसदों का निलंबन
संसद की मर्यादा भंग करने के आरोप में 4 कांग्रेसी सांसदों का निलंबन (Image credit : Amar Ujala)

पक्ष-विपक्ष के इन आरोप और दावों के बीच सदन की कार्यवाही में व्यवधान से सबसे ज्यादा नुकसान आम आदमी यानि  “जनता-जनार्दन” का है। आम आदमी के सरोकार जैसे महंगाई, बेरोजगारी आदि या चीन का तथाकथित रूप से भारत मे घुसपैठ जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला या फिर लोकतांत्रिक संस्थाओं जैसे ED आदि तमाम मुद्दों पर सार्थक चर्चा का ना हो पाना निःसंदेह निराशाजनक है।

साथ ही, सदन का व्यर्थ में धुल जाना आर्थिक मोर्चे पर भी नुकसानदेह है। आपको बता दें, संसद के एक मिनट की कार्यवाही पर प्रति घंटे लगभग 1.5 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। सत्र के दौरान औसतन एक दिन में 7 घंटे का कार्यक्रम होता है जिसमें 10.5 करोड़ रुपये खर्च होते हैं।

इस सत्र में कुल 6 दिन हंगामे के भेंट चढ़ गए हैं और इसे 1 दिन के औसत खर्च से गुना किया जाए तो लगभग 65 करोड़ रुपये बर्बाद हुए हैं। इसमें इन सांसदों को दिए जाने वाले तनख्वाह, भत्ता, रेल/जहाज के किराए आदि को सम्मिलित नहीं किया गया है।

देश एक तरफ़ महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों से जूझ रहा है और दूसरी तरफ़ जिन्हें मिल जुल कर एक जुट होकर इन समस्याओं का हल निकालना चाहिए था, वे “माननीय” लोग संसद को प्ले स्कूल का सबसे जूनियर कक्षा बना कर रखे हैं।

सदन की गरिमा और उपयोगिता पर सवाल

भारत जब आज़ाद मुल्क बना तो लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को चुना और आज़ादी के नायकों और तत्कालीन नेताओं ने एक ऐसी व्यवस्था की नींव रखी जिस से राष्ट्र-निर्माण के सपने को पंख मिले।

राष्ट्र निर्माण के जरूरी था कि चुने हुए जनप्रतिनिधियों द्वारा देश के हर व्यक्ति की आवाज़ और उसकी भावनाओं को देश के सबसे बड़े पंचायत यानि संसद भवन के पटल पर सुनी जाये, उस पर संरचनात्मक बहस हो, वाद-प्रतिवाद हो और फिर निष्कर्ष निकाला जाए कि राष्ट्र हित मे क्या नियम कानून बनाये जा सकते हैं।

इसका सीधा मतलब है कि जितनी साभ्रांत, गंभीर और संरचनात्मक बहस सदन के पटल पर होंगी, राष्ट्र निर्माण के सपनों को उतनी ही मजबूत पंख मिलेगा।  इसके लिए संविधान में संसद की संरचना (अनुच्छेद 79-80), तथा सत्र या जरूरी बैठक (अनुच्छेद 85) उल्लेखित किया गया ताकि जनता की आवाज़ को देश के विधि-निर्माताओं तक पहुंचे।

संसद के इन बहसों और उस से निकले कानूनों तथा योजनाओं का ही असर है कि तमाम “थर्ड वर्ल्ड” देशों के बीच भारत का लोकतंत्र सबसे सुदृढ और सफ़ल माना जाता है।

परंतु बढ़ते समय के साथ ज्यों-ज्यो लोकतंत्र परिपक्व होता गया, दलगत राजनीति और चुनावी हथकंडे सदन के बहसों और कार्यकलापों पर हावी होने लगा। नतीजतन, सदन की उपयोगिता और गरिमा दोनों कम होने लगे हैं।

सदन के बहस कब चुनावी भाषणों में तब्दील हो गए, पता ही ना चला। नीति-निर्माण की बहसें और विरोध कब तंज कसने वाले चुनावी भाषण और हुड़दंगबाजी में बदल गई, इसकी खबर ना नागरिकों को लगी ना उन नेताओं को जिनके कंधों पर जिम्मेदारी थी सदन की गरिमा को बनाये रखने की।

स्पष्ट बहुमत से प्रभावित संसद

यूँ तो राजनीतिक दल रोज ही ये दावा करते हैं कि वे सदन की कार्रवाई को कमतर नहीं आँकते चाहे वो बहुमत में हो या अल्पमत में। लेकिन भारतीय लोकतंत्र और केंद्र सरकारों का इतिहास यह बताता है कि जब जब पूर्ण बहुमत की सरकार केंद्र में बनी है, सरकारें विपक्ष के दवाब को चुटकियों में मसलने का काम करती रही हैं।

अगर अपवाद के तौर पर प्रधानमंत्री पंडित नेहरू की सरकार को छोड़ दें तो सम्पूर्ण बहुमत की सरकारों का विपक्ष के प्रति वही रवैया रहा है जो आज भारतीय जनता पार्टी पर आरोप लगते हैं.. फिर चाहे इंदिरा गांधी हों या राजीव गांधी या फिर वर्तमान में मोदी सरकार..।

इंदिरा गांधी के पूर्ण बहुमत की सरकार में इतने संविधान संशोधन किए गये उतने संशोधन NCERT के किताबों में नहीं हुई होगी। राजीव गाँधी की सरकार विपक्ष के प्रति फिर भी थोड़ी सहिष्णु थी। मोदी सरकार सदन के दोनों अंग – राज्यसभा और लोकसभा- में बहुमत में है।

सरकार ‘शायद’ इसी वजह से विपक्ष के चर्चा को बिलों और कानूनों को पास करने में महत्वपूर्ण नहीं समझती। बीते दिनों में ऐसे कई उदाहरण हैं कि सदन में हो-हल्ला का फायदा उठाकर ध्वनि मत से कई महत्वपूर्ण बिल पास करवा लिए गए हैं। केंद्रीय पार्लियामेंट्री कमिटी में अब बस 10-20% बिल भेजे जाते हैं जो चिंता का सबब है।

चिंता का सबब इसलिए क्योंकि हमें यह समझना होगा कि विपक्ष के पास जितने भी 100-150 सांसद हैं, वह भी इसी देश के किसी कोने की जनता के जनप्रतिनिधि हैं।

अगर बिल पर चर्चा होगी नहीं, ये बिल या कानून समीक्षा के लिए पार्लियामेंट्री कमिटी में भेजे नहीं जाएंगे तो ऐसे मे जो बिल जनता के लिए बनाई जा रही है, उसमें जनता के बीच से ही एक बड़े भाग के प्रतिनिधियों का कोई विचार शामिल ही नहीं होगा।यह निश्चित ही पार्लियामेंट्री परम्पराओं और गरिमा के लिए ठीक नहीं है।

सदन की उपयोगिता को कागजों पर 14वीं, 15वीं, 16वीं, और 17वीं लोकसभा में उत्पादकता लगभग लगभग 86%, 85%, 95% और 106% थी। लेकिन हक़ीक़त यह है कि इसी सदन नव मात्र 19 मिनट में 34 बिल भी पास किये हैं।

अब यह साधारण समझ की बात है कि 1 बिल पर कितने देर की चर्चा हुई होगी… यह हाल किसी एक छोटे राज्य के सदन की बात नहीं बल्कि इतने बड़े देश के जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और दूसरा सबसे बड़ी आबादी का देश है, उसके केंद्रीय संसद-भवन का हल है।

संसद के सदनों में चर्चा न होने के लिए कौन है जिम्मेदार?

ऐसा नहीं है कि इसके लिए सिर्फ एक पार्टी या एक नेता जिम्मेदार है। हर दल, हर नेता, हर सदस्य इसमें शामिल है। बस फर्क यह है कि आज सत्ता में कोई और है, कल कोई और था और परसो कोई और होगा…

आज बीजेपी विपक्ष को जिम्मेदार बताती हैं लेकिन शायद वह उसी सदन के पटल पर अपने ही पुराने नेताओं के व्यक्तव्य को शायद भूल गयी है जब वे विपक्ष में थे।

30 जनवरी 2011 को बतौर नेता प्रतिपक्ष बीजेपी नेता अरुण जेटली ने सदन में कहा था कि “संसद का काम है कि चर्चा सुनिश्चित हो। लेकिन कई बार सरकार मद्दों से बचने की कोशिश करती है तो गतिरोध भी प्रजातंत्र के हक़ में है। संसदीय गतिरोध कतई अलोकतांत्रिक नहीं है।”

26 अगस्त 2012 के फिर उन्होंने सदन के बाहर आकर कहा कि हम गतिरोध नहीं बंद करेंगे, क्योंकि इस से सरकार को बच निकलने का रास्ता मिल जाएगा। वहीं, 07 सितंबर 2012 को नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने भी सदन में कहा था कि संसद को न कि चलने देना भी प्रजातंत्र का एक रूप है।”

इन बयानों और बीजेपी जब विपक्ष में थी, तब के रवैये को और आज की बीजेपी जो सत्ता में है, द्वारा आज के विपक्ष पर लगाये गए आरोपों से जोड़कर देखिये तो स्पष्ट है कि बस आरोप-प्रत्यारोप का दौर है, सदन अपने मक़सद मे नाकामयाब है।

संसद के सदनों के कार्यवाही की जिम्मेदारी सभी सांसदों की ही होती है। लेकिन सच यह भी है इसकी बड़ी जिम्मेदारी सत्ता पक्ष पर होती है क्योंकि विपक्ष का सवाल सरकार से है;लोकसभा अध्यक्ष उसी पार्टी से हैं और वह पूरे सदन के कार्यवाही को नियंत्रित करते हैं।

राजनीति से ऊपर उठकर बात की जाए तो चर्चा के जिम्मेदारी पक्ष और विपक्ष दोनों की है। सदन के हर दिन सुबह 9-10 बजे संसद के बिजनेस एडवाइजरी कमिटी दिन के चर्चा के लिए मुद्दों को तय करती है और एक बार मुद्दे तय हो जाने के बाद 11 बजे से चर्चा शुरू होती है। ऐसे में सवाल यही है कि सरकार और अध्यक्ष महंगाई, GST आदि जैसे मुद्दों को टाल क्यों रही है?

विपक्ष को भी जिम्मेदारी लेनी होगी कि अगर दिन की शुरुआत में यह तय हो गया कि दिन में किस मुद्दे पर चर्चा होगी तो फिर यह आरोप लगाना कि सरकार चर्चा से भाग रही है और प्ले कार्ड लेकर अध्यक्ष के आगे खड़े होकर विरोध जताना कहाँ से जायज़ है?

स्पष्ट है कि संसद के अंदर चर्चा का माहौल बनाना ना पक्ष वाले चाह रहे हैं और ना विपक्ष। ऐसे में संसद की कार्यवाही पर गंभीर सवाल उठना लाजिमी है। राज्यों के विधानसभाओं का हाल और भी बुरा है।

भारत के नेताओं को उसी ब्रिटेन की सदन से सीखना चाहिए जिस से हमने अपने संसदीय प्रणाली की रूप रेखा तय की थी। ऐसा इसलिए कि वहाँ हाल ही में एक कैबिनेट मंत्री ने इस्तीफे की घोषणा बस इसलिए कर दी थी क्योकि वह विपक्ष के सवालों के जबाव देने सदन में देर से पहुंचे थे।

अगर यही हाल रहा तो न सिर्फ एक सत्र के धुलने या एक सरकार के ऊपर सवाल नहीं है। बल्कि यह उस संसदीय प्रणाली पर सवालिया निशान है जिसे अंबेडकर, नेहरू, पटेल, लोहिया, बाजपेयी जैसे नेताओं ने अपने विचारों से सींचकर 75 सालों से भारत की बुनियाद को मजबूत किया है। वरना वह दिन दूर नहीं जब सदन के भीतर इस बात पर चर्चा करनी पड़ेगी की सदन चर्चा के लिए है भी या नहीं।

 

About the author

Saurav Sangam

Add Comment

Click here to post a comment

फेसबुक पर दा इंडियन वायर से जुड़िये!

Want to work with us? Looking to share some feedback or suggestion? Have a business opportunity to discuss?

You can reach out to us at [email protected]