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श्रम बाजार: परिभाषा, प्रकृति , प्रकार, मांग और पूर्ती

श्रम बाजार क्या है? (what is labour market)

श्रम बाजार जिसे नौकरी बाजार के नाम से भी जाना जाता है, श्रम की मांग एवं पूर्ति की और संकेत करता है। यहाँ कर्मचारी या श्रमिक आपूर्ति प्रदान करते हैं एवं नियोक्ता(काम देने वाला) श्रम की मांग करता है। श्रम अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है क्योंकि हर आर्थिक गतिविधि में श्रम का एक अहम योगदान होता है।

श्रम बाजार की परिभाषा : (definition of labour market)

श्रम बाजार एक ऐसी जगह है जहां श्रम की मांग एवं पूर्ति द्वारा श्रम की मात्र एवं श्रम के मूल्य(वेतन) का निर्धारण किया जाता है।

अतः इस बाजार में श्रमिक नियोक्ता द्वारा दिया गया काम करके अपना योगदान देते हैं एवं इसके बदले उन्हें वेतन के रूप में प्रतिफल दिया जाता है। बता दें की श्रमिक की काम करने की रूचि को बरकरार रखने के लिए उन्हें नियमित तौर पर वेतन देने की आवश्यकता होती है।

श्रम बाजार की विशेषता : (characteristics of labour market)

श्रम बाजार की मुख्य विशेषताएं निम्न है :

  1. कठोर एवं अनम्य
  2. विनियामितता
  3. अपूर्ण प्रतियोगिता

1. तीन स्तरीय बाजार : (three level market)

बड़े अर्थशास्त्रियों के अनुसार श्रम बाजार खंडित होता है। इसके तीन मुख्य भाग होते हैं। इन तीन में विभिन्न श्रमिक वर्गीकृत होते हैं। सबसे पहले स्तर में वे श्रमिक आते हैं जिनके पास उच्च स्तरीय कौशल होता है। इन श्रमिकों का वेतन सबसे अधिक होता है एवं ये बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करते हैं।

दूसरा स्तर होता है उन श्रमिकों का जिनके पास उच्च स्तरीय शिक्षा एवं कौशल नहीं होता है। ये पहले स्तर के श्रमिकों के नीचे काम करते हैं एवं उनसे कम वेतन पाते हैं।

तीसरे स्तर के श्रमिक वे होते हैं जोकि मुख्यतः शारीरिक काम करते हैं एवं इनके पास किसी प्रकार की शिक्षा नहीं होती है। इस वर्ग में मुख्यतः ऐसे श्रमिक होते हैं जोकि दैनिक वेतन पर काम करते हैं।

2. कठोर एवं अनम्य :

श्रम बाजार के कठोर एवं अनम्य होने से अभिप्राय है की अलग अलग स्थानों पर समान काम के लिए अलग वेतन होता है। ऐसा मुख्यतः भौगोलिक अलगाव के कारण होता हैं। हम जानते हैं श्रम का मूल्य एवम मात्रा बाजार में श्रम की मांग एवं आपूर्ति से निर्णय किया जाता है। हर जगह श्रम की अलग मांग एमव आपूर्ति होती है जिसके कारण लोगों का अलग वेतन होता है।

3. विनियामितता : (regulatory)

एक श्रम बाजार का विनियमित होने से अभिप्राय है की विभिन श्रमिकों के विभिन्न संगठन होते हैं जो यह निर्णय करते हैं की श्रमिकों को काम के लिए कितना न्यूनतम वेतन मिलना चाहिए। यदि ये शर्त नहीं मानी जाती हैं तो ये संगठन अपने हिसाब से इसके खिलाफ कार्यवाही करते हैं एवं श्रमिकों के हक के लिए लड़ते हैं।

4. अपूर्ण प्रतियोगिता : (imperfect competition)

श्रम बाजार के अपूर्ण प्रतियोगीई होने से अभिप्राय है की श्रम की कीमत यानी वेतन हर बार मांग एवं आपूर्ति से ही निर्धारित नहीं होता है यह कई बार राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय संस्थान जैसे मजदूर संगठनों से भी प्रभावित होकर निर्धारित होता है। जब कंपनियां नियमों का पालन नहीं करती हैं तो ये संगठन कार्यवहन में हस्तक्षेप करते हैं एवं वेतन का निर्धारण करते हैं। अतः श्रम बाज़ार को पूर्ण प्रतियोगी बाज़ार नहीं कहा जा सकता है।

श्रम बाज़ार के प्रकार: (types of labour market)

श्रम बाज़ार मुख्यतः तीन प्रकार का होता है :

  1. प्राथमिक,
  2. द्वितीयक
  3. तृतीयक

ये बाज़ार के मुख्य स्तर होते हैं जिनके आधार पर बाज़ार को वर्गीकृत किया जाता है।

1. प्राथमिक श्रम बाज़ार : (primary labor market)

यह बाज़ार का पहला वर्ग होता है। इस वर्ग में ऐसे श्रमिक आते हैं जिनके पास अत्यधिक उन्नत कौशल होता है एवं इन्हें उच्च स्तरीय शिक्षा प्राप्त होती है। इनका काम मुख्यतः कंपनियों के विभिन्न निर्णय लेना होता हैं एवं ये बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बड़े ओहदे पर काम करते हैं। इनका वेतन सबसे अधिक होता है एवं समय समय पर इन्हें पदोंन्नती भी मिलती है।

2. द्वितीयक श्रम बाज़ार : (secondary labor market)

द्वितीयक श्रम बाज़ार वह बाज़ार होता है जहां ऐसे स्श्रमिक होते हैं जिनके पास ज्यादा उच्च स्तरीय शिक्षा नहीं होती है। इनके पास प्राथमिक श्रमिक जितना उन्नत कौशल भी नहीं होता है एवं इनका उनसे कम वेतन होता हैं।

3. तृतीयक श्रम बाज़ार: (tertiary labor market)

तृतीयक श्रम बाज़ार में ऐसे श्रमिक आते हैं जिनके पास सबसे कम शिक्षा होती है या ना के बराबर शिक्षा होती है। इनका वेतन सबसे कम होता है क्योंकि ये किसी भी काम में कुशल नहीं होते हैं एवं ऐसे लोग मुख्यतः दैनिक वेतन पर काम करते हैं जोकि बहुत कम होता है।

श्रम बाजार की मांग और आपूर्ति : (demand and supply in labor market)

जैसा की हम ऊपर पढ़ चुके हैं की श्रम बाजार में वेतन एवं श्रम की मात्र का निर्धारण मांग और आपूर्ति की वजह से होता है। हम यहाँ जानेंगे की मांग और आपूर्ति श्रम बाजार को किस तरह प्रभावित करते हैं।

श्रम बाजार की मांग से अभिप्राय है कंपनियों द्वारा किसी कोई काम को करवाने के लिए जब श्रमिक की ज़रुरत होती है तो यां उनके द्वारा ममांग होती है। वे विभिन्न कार्यों के लिए विभिन्न वेतन देते हैं।

श्रम बाजार की आपूर्ति से अभिप्राय है वे सभी लोग जोकि वर्तमान समय में एवं वेतन दर पर काम करने के लिए तैयार हैं एवं अपने कौशल का प्रयोग करके नियोक्ता के प्रति अपना योगदान देना चाहते हैं।

श्रम बाज़ार में मांग और आपूर्ति

ऊपर चित्र में जैसा की आप देख सकते हैं मांग एवं पूर्ती की शक्तियां किस प्रकार श्रम बाज़ार में वेतन एवं मात्र को प्रभावित करती हैं। यदि श्रम की मांग अधिक बढ़ जाती है एवं पूर्ती कम होती है तो इससे वेतन में बढ़ोतरी हो जाती है लेकिन यदि पूर्ती की मात्र अधिक होती है एवं ज़रुरत या मांग कम होती है तो इससे वेतन घट जाता है।

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About the author

विकास सिंह

विकास नें वाणिज्य में स्नातक किया है और उन्हें भाषा और खेल-कूद में काफी शौक है. दा इंडियन वायर के लिए विकास हिंदी व्याकरण एवं अन्य भाषाओं के बारे में लिख रहे हैं.

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