गुरूवार, फ़रवरी 20, 2020

शनि ग्रह के बारे में जानकारी, उपग्रह

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शनि ग्रह के बारे में जानकारी (information about saturn planet in hindi)

सौर मंडल में पृथ्वी और मंगल के बाद शनि (Saturn) ऐसा ग्रह है जिसको आसानी से पहचाना जा सकता है। शनि के छल्ले या रिंग इसके प्रमुख आकर्षक हैं जिसके द्वारा यह तुरंत पहचान में आ जाता है।

क्रम के आधार पर शनि सौर मंडल का छठा ग्रह है एवं आकार में दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। इसका नाम एक रोमन देवता के नाम पर रखा गया था। सप्ताह का छठा दिन भी शनि के कारण ही शनिवार या Saturday कहलाता है।

खुली आँखों से दिखने वाले ग्रहों में शनि सबसे दूर स्थित ग्रह है। इसके आकर्षक बनावट के कारण लोग इसे टेलिस्कोप से देखना पसंद करते हैं।

ज्यादातर लोगों को शनि ग्रह का छल्ला पसंद आता है। इसकी खोज गैलीलियो ने अपने टेलिस्कोप के मदद से की थी।

शनि ग्रह की भौतिक विशेषताएं (Physical Characteristics of Saturn in Hindi)

शनि गैस का बहुत बड़ा गोला है जिसमे हाइड्रोजन एवं हीलियम गैस की मात्रा प्रमुख है। यह ग्रह 760 पृथ्वी ग्रहों के बराबर है और आकार में सिर्फ बृहस्पति ग्रह से छोटा है।

इसका भार पृथ्वी के मुकाबले 95 गुना ज्यादा है। हालाँकि शनि का घनत्व बाकी ग्रहों के मुकाबले बहुत कम है, यहाँ तक की अगर पानी से भी थोड़ा कम। अगर शनि एक बॉल के आकार का हो और उसे एक पानी से भरे टब में रखा जाये तो वह बहने लगेगा।

शनि के वायुमंडल के ऊपरी भाग में इक्वेटर के तरफ बहुत तेज हवाएं चलती हैं जिनकी गति 1800 किमी प्रति घंटा रहती है जिससे शनि के आंतरिक भाग में काफी ज्यादा उष्णता पैदा होती है।

इसके कारण यह ग्रह पीले एवं स्वर्ण रंग का प्रतीत होता है। यह ग्रह सूर्य के चक्कर लगाने में बृहस्पति के बाद दूसरा सबसे तेज ग्रह है। यह साढ़े दस घंटों में ही सूर्य के चक्कर लगा लेता है।

इतने तेज गति लगाने के कारण इसका इक्वेटर भाग उभरा हुआ है और इसका ध्रुव भाग चपटा है। ध्रुवों के मुकाबले में शनि का इक्वेटर भाग (ग्रह के आंतरिक भाग से निकलते हुए उष्णता को मिलाकर) 12000 किमी ज्यादा चौरा है।

हाल ही के शोधों से यह पता चला है कि शनि के उत्तरी ध्रुव में हेक्सागॉन आकार का बहुत बड़ा गैस की आकृति मौजूद है जिसका हर सिरा (side) 12500 किमी लम्बा है। यह इतना बड़ा है कि इस आकृति में चार पृथ्वी समा सकते हैं।

थर्मल चित्रों के आधार पर यह पता चला है कि यह ग्रह के वायुमंडल से लगभग 100 किमी नीचे स्थित है। हालाँकि यह नहीं पता चल पाया है कि किस कारणवश यह आकृति बनती है, लेकिन वैज्ञानिक मानते हैं कि वायुमंडल में हवाओं के गति के आधार पर यह बनता है।

शनि का एक साल पृथ्वी के तीस सालों के बराबर है। उस ग्रह पर हर साल एक टाइटैनिक या बहुत विशाल भूचाल आता है जो वायुमंडल एवं वहां के आकाशीय हवाओं में बाधा डालता है।

साल 1876 से लेकर अबतक इस ग्रह के छह ऐसे भूचालों को रिकॉर्ड किया जा चुका है। 2011 में नासा का कैसिनी (Cassini) अंतरिक्ष यान पहला ऐसा मिशन बना जिसने इन भूचालों को नजदीक से रिकॉर्ड किया।

संरचना (Composition of Saturn in Hindi)

इसके वायुमंडल में 96 प्रतिशत आवणिक हाइड्रोजन एवं 3.25 प्रतिशत हीलियम मौजूद है। इसके अलावा यहां थोड़े मात्रा में मीथेन, हाइड्रोजन ड्यूटराइड, अमोनिया, इथेन, अमोनिया के अन्य यौगिक आदि मौजूद हैं।

शनि का मैग्नेटिक क्षेत्र पृथ्वी के मुकाबले 578 गुणा ज्यादा मजबूत है। यहाँ का आंतरिक भाग क्षेत्रफल में पृथ्वी के मुकाबले 10 से 20 गुणा ज्यादा है।

इसका कोर भाग गर्म लोहे और पथरीले चीजों से बना हुआ है जिसमे अमोनिया, मीथेन, गैस के मिश्रित बर्फ आदि ठोस रूप में पाए जाते हैं।

उसके बाद तरल हाइड्रोजन एवं हीलियम की परत आती है। ग्रह के सतह के पास पहुंचकर यह ठोस पदार्थ गैस में बदल जाते हैं।

शनि की चन्द्रमाएँ (Moons of Saturn in Hindi)

शनि के 62 चन्द्रमाएँ हैं। इनका ग्रीक देवताओं के नाम के आधार पर रखा गया है। शनि का सबसे बड़ा चन्द्रमा टाइटन है जो आकार में बुध (mercury) से थोड़ा बड़ा है और सौर मंडल का दूसरा सबसे बड़ा चन्द्रमा है।

इसके वायुमंडल में नाइट्रोजन की मात्रा बहुत अधिक है और यहां मीथेन की बारिश होती है। टाइटन का वायुमंडल में हाइड्रोकार्बन भी मौजूद हैं।

शोध के आधार पर यह पाया गया है कि यहाँ पर प्रोपाइलिन केमिकल भी मौजूद है जिसका निर्माण प्लास्टिक बनाने में होता है। यहाँ काफी सारे गहरे खाई मौजूद हैं जिसमे तरल हाइड्रोकार्बन भरे हुए हैं।

इन चन्द्रमा का आकार विचित्र है। पैन एवं एटलस उड़ते हुए यान की तरह दिखते हैं। Lapetus  का एक भाग बर्फ की तरह सफ़ेद है तो दूसरा भाग कोयले के तरह काला है।

वैज्ञानिक मानते हैं कि Enceladus ग्रह पर छुपा हुआ महासागर हो सकता है। कई अन्य चंद्रमाओं का स्थान इस प्रकार है जिससे शनि के छल्ले ठीक से अपनी जगह पर बने रहें।

सौर मंडल पर शनि के गुरुत्वाकर्षण बल का प्रभाव (Gravitational Effect of Saturn on Solar System in Hindi)

बृहस्पति के बाद शनि सौर मंडल का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। इसके खिंचाव के कारण सौर मंडल में कई परिवर्तन हुए हैं। ऐसा कहा जाता है कि युरेनस एवं नेप्चून ग्रह शनि के बल के कारण ही सौर मंडल के बाहरी भाग में पहुँच गए।

बहुत सारे मलबे भी इनके कारण सौर मंडल में इधर उधर बिखरे हुए हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि शनि के गुरुत्वाकर्षण बल के कारण ही खतरनाक उल्का पिंड, क्षुदग्रह आदि पृथ्वी से टकरा नहीं पाते हैं।

शोध (Rsearches & Exploration on Saturn)

साल 1979 में पायनियर 11 शनि ग्रह तक पहुँचने वाला पहला ग्रह बना। यह शनि के सतह से लगभग 22000 किमी ऊपर से गुजरा एवं शनि के दो छल्लों की खोज की।

बाद में वॉइज़र मिशन यहां से गुजरा जिसने इन छल्लों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। इसने कई महत्वपूर्ण जानकारियां भेजीं जिससे शनि के 9 चंद्रमाओं का पता चला।

कैसिनी मिशन ने शनि के सतह से जुड़े कई जानकारियां भेजी जिससे वहां मौजूद गैस आदि के बारे में जानकारी मिली। इसने वहां के चंद्रमाओं के बारे में भी कई जानकारी भेजी।

नासा भविष्य में शनि के चंद्रमाओं पर मिशन भेजने की तयारी कर रही है।

आप अपने सवाल एवं सुझाव नीचे कमेंट बॉक्स में व्यक्त कर सकते हैं।

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