दा इंडियन वायर » मनोरंजन » हिंदी फिल्म के गीतकारों के जादू को लेकर पत्रकार और लेखक राजीव विजयकर के साथ साक्षात्कार
मनोरंजन

हिंदी फिल्म के गीतकारों के जादू को लेकर पत्रकार और लेखक राजीव विजयकर के साथ साक्षात्कार

राजीव विजयकर 25 से अधिक वर्षों से टेलीविजन और एफएम के लिए एक फिल्म पत्रकारिता का काम कर रहे हैं। वह दो बार प्रतिष्ठित (2011 में 58 वें और 2015 में 62 वें) राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की जूरी में शामिल रहे हैं। साथ ही विजयकर बेंगलुरु में स्थित ‘भारतीय संगीत अनुभव संग्रहालय’ में हिंदी संगीत के एकमात्र सलाहकार हैं। उनका पेपर, ‘द रोल ऑफ ए सॉन्ग इन ए हिंदी फिल्म’, दक्षिण एशियाई सिनेमा अध्ययन, एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम का एक हिस्सा है। उन्होंने तीन किताबें लिखी हैं: ‘द हिस्ट्री ऑफ इंडियन फिल्म म्यूजिक’ (टाइम्स ग्रुप बुक्स, 2010), ‘धर्मेंद्र- नॉट जस्ट ए ही-मैन’ (रूपा प्रकाशन, 2018) और ‘मैं शायर तो नहीं’ (हार्पर कॉलिन्स इंडिया, 2019)। वह वर्तमान में हिंदी सिनेमा के सबसे बहुमुखी संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल पर एक किताब पर काम कर रहे हैं।

‘मैं शायर तो नहीं’ बहुत अच्छी तरह से शोध कर के अंग्रेजी में लिखी एक अद्भुत पुस्तक है। हिंदी फिल्म के गीतों के गीतकारों के बारे में बहुत कम लिखा गया है और उन्हें उससे भी कम समझा गया है। कुछ शीर्ष लेखकों/कवियों को छोड़कर, वे आज भी बॉलीवुड संगीत के ‘अनसंग’ हीरो बने हुए हैं। यह किताब इस खालीपन को बहुत अच्छे से भरती है। पुस्तक गीत लेखन के विवरण और तकनीक और दिलचस्प और प्रेरक उपाख्यानों से भरी हुई है। मैंने राजीव विजयकर के साथ उनकी इस किताब और हिंदी फिल्मों में गीतों और गीतकारों की भूमिका के बारे में बातचीत की।

आदित्य सिंह: आप एक फिल्म इतिहासकार और भारतीय संगीत अनुभव संग्रहालय के सलाहकार हैं। आप गीत लिखने की कला को कैसे देखते हैं और यह भारतीय संगीत अनुभव संग्रहालय वास्तव में क्या है?

राजीव विजयकर: अच्छे गीत लिखना सबसे पहले कहानी और पटकथा की आवश्यकताओं को पूरा करने और एक चरित्र के बौद्धिक, मानसिक और भावनात्मक स्तरों से मेल खाने के बारे में है और फिर यह दिखाने के बारे में है कि आप एक लेखक के रूप में क्या कर सकते हैं। यह निर्देशक और (फिल्म) लेखक की दृष्टि के साथ जाने और उसके भीतर यदि संभव हो तो कुछ नया करने के बारे में है। यह एक सरल भाषा में लिखने और समय के साथ तालमेल बिठाने में है ना कि अपने स्वयं के विश्वासों और अनुभवों को गीत में थोपने के बारे में है। इसके अलावा, जब भी संभव हो सबसे सरल शब्दों के भीतर महान दर्शन को उकेरना जो कि उस स्थिति के लिए संभव हो (गाड़ी बुला रही है / दोस्त; जब कोई बात बिगड़ जाए / जुर्म; साजन रे झूठ मत बोलो / तीसरी कसम)।

इन कारणों से, मैं इन पांच नामों को अब तक के सबसे महान गीतकार मानता हूं: वर्णानुक्रम में आनंद बख्शी, इंदीवर, मजरूह सुल्तानपुरी, राजेंद्र कृष्ण और शैलेंद्र। मेरे लिए, इनके बाद शकील, साहिर, प्रदीप, और कैफ़ी आज़मी और उन जैसे अन्य गीतकार आते हैं।

भारतीय संगीत अनुभव अपनी तरह का एक बड़ा डिजिटल संगीत संग्रहालय है- जो कि भारत के लिए पहला है। इसमें फ्यूजन तक पूरे भारत में सुने गए हर संगीत को शामिल किया गया है। इसे मौखिक रूप से वर्णित नहीं किया जा सकता है, लेकिन इसे वास्तव में एक बार तोह हर इंसान द्वारा अनुभव किया जाना चाहिए। इस संग्रहालय में एक सामान्य भ्रमण के लिए दर्शक को सब ठीक से देखने में कम से कम 3 घंटे का समय लगेगा। आप अपनी रुचि के विशिष्ट क्षेत्र के आधार पर कई घंटे वहां बिता सकते हैं, जैसे हिंदी फिल्म संगीत, कर्नाटक शास्त्रीय, थिएटर संगीत आदि। इसके अलावा, प्रदर्शन में ज्यादातर ऐसी चीजें हैं जिन्हें आप टच-स्क्रीन के माध्यम से देख या अनुभव कर सकते हैं। यह बंगलौर में स्थित है और मैं 2011 के प्रारंभ से इसके साथ जुड़ा हूँ। 2019 में इसका उद्घाटन हुआ। मैं हिंदी फिल्म संगीत के लिए इसका एकमात्र सलाहकार हूं। इसे एक अमेरिकी कंपनी द्वारा संरचनात्मक रूप से डिजाइन किया गया है, जिसने अमेरिका से हांगकांग तक ग्रैमी और माइकल जैक्सन संग्रहालयों जैसे कई संगीत संग्रहालयों का निर्माण किया है।

आदित्य सिंह: आपने अपनी किताब में कई गीतकारों- मजरूह सुल्तानपुरी और आनंद बख्शी से लेकर अमिताभ भट्टाचार्य और मनोज मुंतशिर तक- के साथ मुलाकात का जिक्र किया है। आप इनमें से किस मुलाक़ात को सबसे यादगार मानते हैं या अगर किसी विशेष क्षण को हमारे पाठकों के साथ साझा करना चाहें?

राजीव विजयकर: कुछ के साथ, मेरी कई बैठकें हुईं और दूसरों के साथ, सिर्फ एक या दो। मैं बख्शी और मजरूह के साथ अपनी कई मुलाकातों को सबसे ज्यादा संजोता हूं। साथ ही इंदीवर के साथ मेरी दो मुलाकातें, साधारण और बेफिजूली से दूर हसरत जयपुरी के साथ बैठना और बेबाक योगेश के साथ मेरी मुलाकातें भी मुझे हमेशा याद रहेंगी। जावेद अख्तर ने हमेशा ही शानदार रहे और नए गीतकारों में इरशाद कामिल हैं, जिनके साथ मैं एक दोस्त की तरह ज्यादा हूं।

आनंद बख्शी की टिप्पणी कि कैसे एक व्यक्ति जो स्नान के लिए 20 मिनट लेता है, जरूरी नहीं कि वह 5 मिनट में बाहर आ जाने वाले व्यक्ति से बेहतर स्नान करे। एक अपस्टार्ट निर्देशक के लिए उन्होंने निर्णायक घोषणा की कि उन्होंने अपने जीवन में कभी भी एक सुपर-हिट गीत नहीं लिखा (“मैं गीत लिखें। विभिन्न कारण उन्हें सुपर-हिट बनाते हैं!”), कुछ अन्य गीतकारों के बारे में मजरूह की स्पष्ट राय (जो रिकॉर्ड से बाहर रहेंगी !!), जावेद अख्तर का संस्कृतियों और भाषाओं के बारे में पुस्तक में इस्तेमाल किया गया लंबा बयान, गुलजार की यह टिप्पणी कि तीन खान में से केवल एक (सलमान खान) कलाकार है, जबकि अन्य दो व्यवसायी हैं। नीरज की यह टिप्पणी कि बख्शी एक फिल्मी गीत की स्थिति पर सबसे अच्छी पकड़ वाले व्यक्ति थे, मुझे याद है और रहेगा।

आदित्य सिंह: आमतौर पर कहा जाता है कि आज के समय में गीतों का स्तर काफी कम हो गया है। 1950 से 1970 के दशक के गीतों की तुलना में जिन गीतों को आज लिखा जा रहा है उनमें गहराई का अभाव है। क्या आप भी यही महसूस करते हैं ? और यदि हां, तो इसके लिए किसे दोषी ठहराया जाना चाहिए- गीतकार या निर्देशक-निर्माता की जोड़ी या दर्शक?

राजीव विजयाकर: मांग और आपूर्ति की स्थिति में, निश्चित रूप से फिल्म निर्माता, फाइनेंसर और संगीत लेबल हमेशा प्रमुख अपराधी बने रहेंगे। नौशाद की एक शर्त रहती थी कि संगीत बनाने के समय की बैठक के लिए केवल संगीतकार, गीतकार और निर्देशक ही होंगे; चित्रगुप्त जैसे छोटे संगीतकार ने कभी भी निर्माता को एक नया गीत तब तक नहीं सुनाया जब तक कि इसे रिकॉर्ड नहीं किया गया; लक्ष्मीकांत ने बताया था कि कैसे एक बड़ी फिल्म के लिए बैठक उनके लिए दुःस्वप्न बन गई जब निर्देशक टीम के कई सदस्यों और परिवार के साथ आ गए और कोई भी धुन सभी को संतुष्ट नहीं कर सकती थी।

तथ्य यह है कि इतने सारे पुन: बनाए गए गाने युवाओं के साथ तालमेल बनाते हैं, यह दर्शाता है कि हर कोई अच्छे गीतों से पहचान करता है। ऐसा कहने के साथ यह मेरा दृढ़ विश्वास भी है कि अमिताभ भट्टाचार्य, इरशाद कामिल और कुमार जैसे आज के लेखक मौलिक रूप से ओरिजिनल हैं और उनके पास महान गीतकारों जैसी (80 और 90 के दशक की पीढ़ियों के विपरीत) प्रतिभा है, लेकिन माहौल और अवसर नहीं हैं। प्रसून जोशी, मनोज मुंतशिर और स्वानंद किरकिरे में भी यह गुण मौजूद हैं।

आदित्य सिंह: आपने दो बार प्रतिष्ठित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के जूरी के सदस्य के रूप में काम किया। वह कैसा अनुभव था?

राजीव विजयकर: अनुभव सबसे अनुकूल था। आम धारणा के विपरीत, हमें पूर्ण स्वतंत्रता थी और कोई दबाव नहीं था। उन्होंने हमारी बहुत अच्छी तरह से देखभाल की और हमें फाइव स्टार होटलों में रखा गया। काम पर, हम प्रतिदिन लगभग 5-6 फिल्में देखते थे। हमें जूरी सदस्यों के रूप में अपनी स्थिति को सभी से गुप्त रखने के लिए भी कहा गया था ताकि फिल्म जगत के लोगों की दलीलों और अपीलों के प्रभाव में न आएं।

आदित्य सिंह: अंत में, मैं आपसे साहिर लुधियानवी के बारे में पूछना चाहता हूं। इसके दो कारण हैं: पहला कि वह मेरे पसंदीदा गीतकार हैं और दूसरा यह कि वर्ष 2021 में हम उनकी 100वीं जयंती मन रहे हैं। क्या आप साहिर के बारे में कुछ साझा कर सकते हैं, शायद उन्हें श्रद्धांजलि के रूप में?

राजीव विजयकर: मैंने अपनी किताब में उनके बारे में सब कुछ बताया है। मेरे पत्रकार बनने से बहुत पहले 1980 में उनके निधन होने के कारण मैं उनसे कभी नहीं मिला। उनका बहुत सारा काम वाकई कमाल का है। ‘तोरा मन दर्पण कहे’ (काजल), ‘जब भी जी चाहे’ (‘दाग’), ‘क्या मिलिए ऐसे लोगों से’ (इज्जत), ‘ये परबतों के लिए’ (वासना), ‘संसार से भागे फिरते हो’ (चित्रलेखा), ‘आगे भी जाने ना तू’ (वक्त) और ‘हम इंतजार करेंगे’ (बहू बेगम) शायद उनके गीतों में निजी तौर पे मेरे सबसे पसंदीदा गीत हैं।

About the author

आदित्य सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास का छात्र। खासतौर पर इतिहास, साहित्य और राजनीति में रुचि।

Add Comment

Click here to post a comment




फेसबुक पर दा इंडियन वायर से जुड़िये!