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    Siklyara Tunnel Collapse Uttarakhand

    Silkyara Tunnel Collapse : हाल ही में उत्तराखंड में सड़क निर्माण के दौरान एक सुरंग (Silkyara Tunnel, Uttarakhand) में 41 प्रवासी मजदूर (Migrant Labors) लगभग 17 दिन तक फंसे रहने के बाद जब बाहर निकले तो मीडिया और राजनीति ने इस पूरी घटना को “नए और मज़बूत भारत” वाले नव-राष्ट्रवाद के रंग में प्रस्तुत करना शुरू किया।

    इस कार्य के लिए उत्तराखंड सरकार के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अन्य लोग जो भी इस बचाव कार्य में मुश्तैदी से भिड़े रहे, उनकी सराहना होनी चाहिए।

    मीडिया ने जहाँ इस पूरी घटना को मजदूरों को इक्षाशक्ति की जीत से ज्यादा सरकार के दृढ़संकल्प के रूप में परोसने में कोई कसर नही छोड़ी वहीं राजनीति ने भी कैमरे के आगे इन प्रवासी मजदूरों के साथ तस्वीरे खिंचाने का सिलसिला अभी तक जारी रखा है।

    ये 41 प्रवासी मजदूरों (Migrant Labors) के सुरंग (Silkyara Tunnel) में फंसे रहने की ख़बर पहले 07-08 दिन तक क्रिकेट विश्वकप और विधानसभा चुनावों के खबरों के बीच या तो गायब ही रही थीं या मीडिया के खबरों में किसी कोने में थोड़ी सी जगह देकर खानापूर्ति की गई थी। इस उदासीनता की वजह जो भी हो, लेकिन जैसे ही यह ख़बर आने लगी कि वे किसी भी वक़्त सुरंग से बाहर निकाले जा सकते हैं, मीडिया का हुजूम और राजनीति के धुरंधरों की भीड़ वहाँ इकट्ठा होने लगी।

    इन सब के बीच सुखद बात यह रही कि इन 41 प्रवासी मजदूरों के लिए जो सम्मान और संवेदना हर किसी के चेहरे पर देखने को मिली; वह सम्मान इन प्रवासी मजदूरों (Migrant Labors) को शायद ही कभी जीवन मे नसीब हुआ होगा। माला-फूल से स्वागत, मुख्यमंत्री की मुलाकातें और प्रधानमंत्री द्वारा फ़ोन से ढाढस और प्रोत्साहन, मीडिया इंटरव्यू और आम जनमानस के आंखों में हीरो की क्षवि… यह सब न सिर्फ इन 41 मज़दूर बल्कि हर प्रवासी मज़दूर के लिए अद्वितीय अनुभव होगा।

    प्रवासी मजदूरों के सुरंग में फंसने की इस कथा के बाद इन्हें भारतीय मीडिया और राजनीति के केंद्र में जगह तो मिली, लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि क्या इन मजदूरों की समस्या (Migrant Labors’ Conditions) मीडिया या राजनीति के लिए तभी चर्चा का विषय बनेगा जब कहीं मजदूरों का जत्था किसी सुरंग में फंसकर जीवन-मौत की लड़ाई लड़े?

    भला कोई कैसे भूल सकता है उन तस्वीरों को जब कोरोनाकाल में लॉकडाउन के दौरान लाखों करोड़ों की संख्या में ये प्रवासी मज़दूर हज़ारों किलोमीटर की दूरियां पैदल चलकर घर वापस जाने पर मजबूर थे। कइयों की तो रास्ते मे ही मौत हो गई थीं जबकि कुछ ऐसे भी थे जो घर तो चले गए लेकिन परिवार का पेट पालने में असक्षम होने के कारण आत्महत्या जैसे कदम उठाने पर मजबूर हो गए।

    हर साल पर्व त्योहारों के दौरान दशहरे से लेकर दीपावली और छठ तक ट्रेनों के जनरल कोच में यात्रा करने की बेबस तस्वीरें ऐसी होती हैं मानो यह मजबूरी की यात्रा नहीं बल्कि मज़दूर होने की यातना हो। इस सालाना उत्पीड़न के शिकार होकर हर साल कई लोग साँस उखड़ने या भगदड़ के शिकार होकर मर जाते हैं।

    सड़क, सुरंग, नहर, पुल, मंदिर, बड़ी बड़ी मूर्तियां, कॉर्पोरेट से लेकर सरकारी इमारतें आदि बनाकर उनका नामकरण किसी नेता, क्रिकेटर, बॉलीवुड हस्तियों आदि के सम्मान में करते रहते हैं और इन सबके बीच वे लोग जिन्होंने इन सड़क, सुरंग पुल, नहर आदि आधारभूत संरचनाओं का असल निर्माण करते हैं- यानी मज़दूर वर्ग का सम्मान कहीं गुम हो जाता है।

    प्रवासी मजदूरों के जीवन मे समस्याओं का दौर उस वक़्त से शुरू हो जाता है जब वे अपने गाँव-परिवार छोड़कर किसी अनजान नए शहर में नए माहौल में जाते हैं। भाषाई दिक्कतें, रहन सहन का अंतर और सीमित संसाधनों के साथ नए जगह पर स्थायित्व की तलाश कोई मामूली बात नहीं है।

    फिर ये मज़दूर वहाँ रोजगार की चुनौतियों के बीच कई तरह के हादसों के शिकार होते हैं। कोरोना जैसी स्वास्थ-आपातकाल में शहरों को छोड़कर भागने  को मज़बूर होते हैं तो कभी किसी बहुमंजिली इमारत- जिसमें कोई और रहता है लेकिन उसके नीचे उनकी झुग्गियां होती है-के गिरने से मलबों में दबकर मौत का शिकार हो जाते हैं। इन बेचारों को कई बार फैक्टरियों आदि में पूरी सुरक्षा मानक के बगैर काम करना पड़ता है तो कभी किसी सुरंग खोदने के दौरान फंसकर जिंदगी की बाट जोहना पड़ता है।

    भारत के भीतर इन प्रवासी मज़दूरों के पलायन के कई भिन्न रूप देखने को मिलती हैं- अंतर्राज्यीय (Intra-state) या अंतरराज्यीय पलायन (Inter-State Migration), दूरी के हिसाब से पलायन (Short & Long Distance Migration), ग्रामीण से शहरी इलाके की ओर पलायन (Rural to Urban Migration and Vice versa), मौसमी और चक्रीय पलायन (Seasonal & Periodic Migration) आदि। इस दौरान अपने घर-परिवार को एक अलग तरह की चुनौतियों में छोड़कर खुद नए परिवेश में झोंक देता है।

    आम तौर पर यह माना जाता है कि, भारत वर्ष के अंदर लगभग 35-40% आबादी नौकरी और जीविका के तलाश में देश के भीतर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पलायन करने पर मजबूर होते हैं। जहाँ तक अंतरराज्यीय पलायन की बात है तो भारत के ग़रीब राज्य बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश आदि से बड़ी संख्या में लोग केरल, महाराष्ट्र, पंजाब और कर्नाटक आदि राज्यों के तरफ़ पलायन करते हैं; लेकिन इनमें से बहुत कम लोग संगठित क्षेत्र की नौकरियों में जाते हैं।

    इस बात की तस्दीक आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2021-22 (Periodic Labor Force Survey 21-22) भी करते हैं जिसके मुताबिक़ संगठित क्षेत्रों में मात्र 22 प्रतिशत लोग नौकरियां करते हैं जबकि एक बड़ा तबक़ा असंगठित क्षेत्र में रोजगार करने को मज़बूर हैं। यह अलग बात है कि जब हम भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर 5 ट्रिलियन की जीडीपी के रंग में रंगते हैं तो संगठित क्षेत्र में इतनी कम भागीदारी की बात दबकर रह जाती हैं।

    जिन प्रवासी मज़दूरों (Migrant Labors) के श्रम से बनी इमारतें, और अन्य आधारभूत संरचना जिन्हें सरकारें नए भारत की पहचान और राष्ट्रीय प्रतीक बताती हैं, वही मज़दूर मूलभूत जरूरतों से महदूद रहते हैं। कई बार तो ये लोग जरूरी मानवाधिकार से भी वंचित रह जाते हैं।

    हमारे देश मे राष्ट्रमार्ग बनाने के कई-कई नियम कानून हैं लेकिन इन राष्ट्रमार्गों के निर्माण में अमूल्य योगदान देने वाले प्रवासी मजदूरों को लेकर कोई स्पष्ट और प्रभावी कानून नहीं हैं। सरकारें इन प्रवासी मज़दूरों को व्यापक लेबर कानून (General Labor Laws) के दायरे में ही रखती हैं।

    इन प्रवासी मज़दूरों के ऊपर केंद्रित एकमात्र स्पष्ट कानून – अंतर-राज्य प्रवासी मज़दूर कानून, 1979 (Inter-State Workmen Act 1979) ही है जो शायद 37% आबादी से जुड़े हर समस्या के समाधान करने में सक्षम नहीं हैं;  फिर भी उनके आवास, स्वास्थ्य, न्यूनतम मजदूरी आदि कई बिंदुओं को परिभाषित करने में सक्षम है।

    इन सब के बावजूद इन प्रवासी मज़दूरों को कई अन्य तरह के अधिकारों को लेकर कानूनी दायरे से बाहर छूट जाते हैं। आजकल जिस रफ़्तार से शहरीकरण हो रहा है और इन शहरों के मूल निवासियों की जिंदगी जिस तेजी से बदल रही हैं; इन सबके बीच ये प्रवासी मज़दूर कई तरह के भेदभाव के शिकार होते हैं।

    एकीकृत आर्थिक व्यवस्था (Financial Integration) की कमी, अमानवीय रहन-सहन (Inhumane Living Conditions), चिकित्सा सुविधा के अभाव (Lack of Proper and Affordable Health Services), कार्य-स्थल पर सुरक्षा के मानकों की कमी, बच्चों के पालन पोषण (Child Care Facilities) की असुविधा आदि के बीच शहरों में काम करने वाले प्रवासी मज़दूरों (Migrant Labors) की जिंदगी उनके काम के तरह ही है जिसमें शरीर को गलाकर भी उचित मूल्य मिलना असंभव सी बात होती है।

    पुरूष और महिला दोनों के काम पर जाने के कारण परिवार के बड़े बच्चों को छोटे भाई बहनों के ख्याल रखने की जिम्मेदारी उठाना पड़ता है जिसका सीधा असर उनकी शिक्षा-दीक्षा पर पड़ता है। इस वजह से परेशानियों का यह सिलसिला इन प्रवासी मज़दूरों के लिए एक पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली व्यथा बनकर रह जाती हैं।

    इन सब के बावजूद हम “स्मार्ट सिटी (Smart Cities)” बनाने में लगे रहते हैं….. बिना इसकी फिक्र किये कि इन स्मार्ट सिटी के असल निर्माताओं की जिंदगी कितनी पिछड़ती जा रही है। दरअसल, स्मार्ट सिटी (Smart Cities) के जगह हमें एक ‘विवेकपूर्ण शहर (Thoughtful Cities)’ का निर्माण करना चाहिए जहाँ इन्हें बनाने में बुनियादी नींव रखने वाले मजदूरों को भी एक गुणवत्तापूर्ण जीवन हासिल हो सके और उनकी आगामी पीढियां भी स्मार्ट हो सके।

    उत्तराखंड के सिलक्यारा सुरंग (Silkyara Tunnel, Uttarakhand) में फंसे मज़दूरों को बचा लिया गया, यह निश्चित ही संतोष की बात है। हालांकि यह अलग बात है कि सुरंग से बाहर निकलने के बाद मीडिया और राजनीति ने उसे अपने राष्ट्रवाद और देश की विविधता में एकता जैसे विषयों में फंसा दिया है, जिससे बाहर आना ज्यादा मुश्किल है।

    होना तो यह चाहिए कि हमें इस ‘सुरंग कथा (Siklyara Tunnel Collapse)’ से सीख लेकर इन प्रवासी मज़दूरों के अधिकारों और उनकी जिंदगी के तंगी पर बात करनी होगी। सरकारों से सवाल करने होंगे कि कब तक कोई मज़दूर जो असल राष्ट्र-निर्माण करता है, कभी किसी सुरंग में तो कभी सीवर लाइन में फंसकर जीता रहेगा?

    कभी तो जीवन के तमाम कठिनाइ -रूपी अँधेरे सुरंग से बाहर उन्हें कोई उम्मीद की रौशनी  दिखें। 

    By Saurav Sangam

    | For me, Writing is a Passion more than the Profession! | | Crazy Traveler; It Gives me a chance to interact New People, New Ideas, New Culture, New Experience and New Memories! ||सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ; | ||ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ !||

    2 thoughts on “प्रवासी मज़दूरों के प्रति जवाबदेही की “सुरंग-कथा””

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