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पेगासस कांड की जांच की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में अगले सप्ताह होगी सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट शुक्रवार को वरिष्ठ पत्रकार एन. राम और शशि कुमार द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया। इस याचिका को पत्रकारों सहित 142 से अधिक संभावित “लक्ष्यों” की सामूहिक जासूसी और निगरानी के लिए एक पूर्व या एक मौजूदा न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र जांच के लिए दायर किया गया था। इस सूची में वकील, मंत्री, विपक्षी राजनेता, संवैधानिक पदाधिकारी और नागरिक समाज के कार्यकर्ता शामिल हैं। याचिका का उल्लेख वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष किया।

6 अगस्त को सुनवाई होने की संभावना

उन्होंने कहा कि प्रस्तुत याचिका पर तत्काल सुनवाई की जानी चाहिए क्योंकि यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता और यहां तक कि राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करने वाले मुद्दों से संबंधित है। यह मुद्दा न केवल भारत में बल्कि विश्व स्तर पर भी लहर बना रहा है। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट से पता चलता है कि याचिका पर 6 अगस्त को सुनवाई होने की संभावना है।

‘अधिकारों का हनन’

याचिका में कहा गया है कि, “सैन्य-ग्रेड स्पाइवेयर का उपयोग करके इस तरह की सामूहिक निगरानी कई मौलिक अधिकारों का हनन करती है और स्वतंत्र संस्थानों में घुसपैठ, हमला और अस्थिर करने के प्रयास का प्रतिनिधित्व करती है जो हमारे लोकतांत्रिक सेट-अप के महत्वपूर्ण स्तंभों के रूप में कार्य करते हैं।”

इस याचिका ने सरकार से इस बात का पूर्ण खुलासा करने की मांग की कि क्या उसने जासूसी को अधिकृत किया था। याचिका में कहा गया है कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति को शांत करने का प्रयास है। सरकार ने अभी तक इसका सीधा जवाब नहीं दिया है कि हैकिंग उसके कहने से की गई थी या नहीं।

‘एक आपराधिक कृत्य’

इसके साथी ही याचिका में यह भी नोट किया गया है कि, “उत्तरदाताओं [गृह मंत्रालय, सूचना प्रौद्योगिकी और संचार] ने अपनी प्रतिक्रिया में निगरानी करने के लिए पेगासस लाइसेंस प्राप्त करने से स्पष्ट रूप से इनकार नहीं किया है, और इन अत्यंत गंभीर आरोपों की एक विश्वसनीय और स्वतंत्र जांच सुनिश्चित करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है।”

जासूसी ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजता के अधिकारों पर गंभीर चोट पहुंचाई है। इसका कोई कानूनी आधार नहीं था। वास्तव में, टेलीग्राफ अधिनियम की धारा 5(2) के तहत निगरानी के लिए कानूनी व्यवस्था को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया।

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आदित्य सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास का छात्र। खासतौर पर इतिहास, साहित्य और राजनीति में रुचि।

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