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न्यूक्लिअर फ्यूज़न क्या है? परिभाषा, मतलब

नुक्लेअर फ्यूज़न nuclear fusion in hindi

फ्यूज़न क्या है? (fusion in hindi)

दो परमाणुओं जो जब एक दूसरे के बहुत पास लाया जाता है, तब वे आपस मे मिल जाते हैं। उनके इस मिलने को अंग्रेज़ी में फ्यूज़न कहते हैं। फ्यूज़न के बाद एक या एक से ज़्यादा नए परमाणु बनते हैं और न्यूट्रॉन या प्रोटोन भी निकलता है।

साथ ही में बहुत सी ऊर्जा भी पैदा होती है। और ऊर्जा ही वह मुख्य कारण है जिससे हमें फ्यूज़न में रूचि है।

फ्यूज़न निभर करता है परमाणुओं की बाइंडिंग ऊर्जा पर। इसलिए हम पहले बाइंडिंग ऊर्जा को समझेंगे।

बाइंडिंग ऊर्जा (binding energy in hindi)

किसी भी न्यूक्लियस को तोड़ने के लिए, यानि कि न्यूक्लियस के अंदर के प्रोटोन और न्यूट्रॉन को अलग करने के लिए ज़रूरी ऊर्जा को बाइंडिंग ऊर्जा कहते हैं। यह ऊर्जा दो परमाणुओं के बीच रसायनिक बंधन या इलेक्ट्रान न्यूक्लियस के बंधन की ऊर्जा से बहुत ज़्यादा होती है। जिस कारण न्यूक्लियस के टूटने पर भयानक मात्रा में ऊर्जा पैदा होती है।

हर न्यूक्लियस का फ्यूज़न संभव नहीं। कुछ ही ऐसे न्यूक्लियस होते हैं, जो सरलता से जुड़ते हैं। ये जुड़ना बाइंडिंग ऊर्जा प्रति न्युक्लियौन ( प्रोटोन और न्यूट्रॉन को न्युक्लियौन कहते हैं) पर निर्भर है।

बाइंडिंग ऊर्जा प्रति न्युक्लियौन (binding energy per nucleon in hindi)

यदि एक न्यूक्लियस के सारे प्रोटोन और इलेक्ट्रान का व्यक्तिगत रूप से वज़न किया जाए, तो उनका कुल वज़न उसी न्यूक्लियस से वज़न से ज़्यादा होता है। इसे मास डिफेक्ट ( भार में गलती ) कहते हैं। न्युक्लियौनस को साथ लाने से ऊर्जा का निकास होता है, जिसके अनुपात वज़न भी कम हो जाता है।आइंस्टीन की प्रसिद्ध समीकरण E = mc^2 से पता चलता है कि निकली हुई ऊर्जा मास डिफेक्ट के अनुपातिक है।

जितनी ज्यादा बाइंडिंग ऊर्जा प्रति न्युक्लियौन उतना ही ज्यादा वह परमाणु स्थिर होगा। पाया गया की मास नंबर ( प्रोटोन और न्यूट्रॉन की कुल संख्या) 56 के परमाणु की बाइंडिंग ऊर्जा प्रति न्युक्लियौन 8.8 Mev है जो कि सबसे ज़्यादा है। इसलिए वह सबसे ज़्यादा स्थिर भी है। यह परमाणु आयरन ( लोहा) तत्व है।

जो तत्व आयरन 56 के नीचे आते हैं, मतलब जिनका एटॉमिक नंबर आयरन से कम है, उनकी बाइंडिंग ऊर्जा प्रति न्युक्लियौन कम होती है। इसलिए वो मिलके, यानी फ्यूज होके आयरन के आप पास का मास नंबर पाने की कोशिश करते हैं। जिससे उनकी भी बाइंडिंग ऊर्जा प्रति न्युक्लियौन बढ़ जाए।

न्यूक्लिअर/कूलम्ब फ़ोर्स (nuclear/coulomb force in hindi)

न्यूक्लियस के अंदर दो प्रकार के बल ( फ़ोर्स ) काम करते हैं। कूलम्ब फ़ोर्स, जो की अनन्तता तक काम करेगी। कूलम्ब फ़ोर्स से दो प्रोटोन्स के बीच दूरी बढ़ती है ( रिप्पलशन)। और न्यूक्लिअर फ़ोर्स जो इन प्रोटोन्स को बांधे रखता है। ये फ़ोर्स छोटी दूरी तक सीमित है।

जब न्यूक्लियस छोटे हैं ( 56 से कम मास नंबर) , तब न्यूक्लिअर फ़ोर्स इतना सक्षम होता है की प्रोटोन्स को सातग रख पाए। पर जब बड़े न्यूक्लियस होते हैं, तब रिप्पलशन बढ़ जाता है। और न्यूक्लिअर फ़ोर्स उसे संभाल नहीं पाता।

फ्यूज़न प्रतिक्रिया (nuclear fusion reaction in hindi)

कुछ ऊर्जा प्रदान कर, 56 से कम मास नंबर के परमाणुओं को अत्यंत पास लाया जाता है। ये इतने पास हो जाते हैं कि एक दूसरे में मिल के नए परमाणु और प्रोटोन या न्यूट्रॉन बना लेते हैं। इन हल्के न्यूक्लियस में जो अतिरिक्त आकर्षण बल ( अट्रैक्टिव फोर्सेज ) रहते हैं, जिनसे प्रोटोन और न्यूट्रॉन बंधे रहते हैं, वही ऊर्जा में बदल जाते हैं।

नए परमाणुओं का कुल वज़न असल वाले से कम होता है। आइंस्टीन के प्रसिद्ध समीकरण E = mc^2 अनुसार वज़न की कमी के बराबर ही ऊर्जा पैदा होती है।

भारी न्यूक्लियस वाले परमाणुओं में ऐसा संभव नहीं क्योंकि उनमें कोई अतिरिक्त आकर्षण बल नहीं। उन्हें तोड़ने के लिए कुछ ऊर्जा प्रदान करनी पड़ती है। टूटने के बाद वे भारी मात्रा में ऊर्जा देते हैं। इसे फिशन कहते हैं।

उदाहरण

दो परमाणुओं को निकट लाने के लिए भी बहुत ऊर्जा ख़र्च होती हैं। परंतु अंत मे मिलने वाली ऊर्जा उसके मुकाबले कई ज़्यादा होती है।

प्राप्त हीट ( ऊर्जा ) रासायनिक बंधन, या इलेक्ट्रान को न्यूक्लियस से जोड़े रखने वाली फ़ोर्स से बहुत बढ़कर होती है। एक इलेक्ट्रान को परमाणु( एटम) से निकलने में 13.6ev देने पड़ते हैं। परंतु जब ड्यूटेरियम और ट्रिटियम ( तीसरा उदहारण ) मिलत हैं, तो 17.59Mev ऊर्जा मिलती है। मिलियन गुना ज़्यादा!

प्रकृति में फ्यूज़न रिएक्शन (natural fusion reaction in hindi)

सूरज और तारों का ऊर्जा स्रोत फ्यूज़न रिएक्शन ही है। दो हाइड्रोजन “H” के परमाणु मिलकर हीलियम “He” बनाते हैं।

फ्यूज़न से मिली ऊर्जा से बिजली बनाना और उसका व्यावसायिक उपयोग करना ही हमारा लक्ष्य है। इसके उपयोग से प्रकृति को कोई हानि न हो, इस बात का ध्यान रखते हुए ही हमारे वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं।

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अनुश्री कनोडिया

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