शुक्रवार, नवम्बर 15, 2019

कितना सच हुआ दलितों के लिए भीमराव अंबेडकर का सपना?

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पंकज सिंह चौहान
पंकज दा इंडियन वायर के मुख्य संपादक हैं। वे राजनीति, व्यापार समेत कई क्षेत्रों के बारे में लिखते हैं।

भीमराव अम्बेडकर भारतीय संविधान के जनक कहे जाते हैं। अपनी पूरी जिंदगी बाबासाहेब दलितों और अन्य पिछड़ों के हितों के लिए लड़ते रहे थे। आज भी, भीमराव अम्बेडकर के जन्म दिन पर हम संविधान की तो चर्चा करते हैं, लेकिन यह नहीं पूछते कि क्या दलितों का हित हो रहा है? क्या दलितों को अन्य वर्णों की तरह मौलिक अधिकार मिल रहे हैं या नहीं?

उत्तर प्रदेश के राम मूर्ती की कहानी एक घोड़े के साथ शुरू होती है।

आज से 20 साल पहले राम मूर्ती को उनकी शादी पर घोड़े पर बैठने की अनुमति नहीं दी गयी थी। जब उन्होनें जिद की, तो गाँव के अन्य जाती के लोगों नें दंगे करने की बात कही। अन्य दलितों की सुरक्षा का ख्याल कर राम मूर्ती ने घोड़े पर बैठने के अपने विचार को त्याग दिया।

एक अन्य घटना में उत्तर प्रदेश के ही निजामपुर जिले में इस साल 20 अप्रैल को शादी के बंधन में बंधने वाले संजय कुमार नें घोड़ी पर बैठने की इच्छा जताई। इसके लिए उन्होनें पहले से ही पुलिस से सुरक्षा मांगी।

पुलिस नें उनकी मांग को ठुकरा दिया।

पुलिस के एक अधिकारी राजकुमार सिंह नें इस पर कहा कि, “इस गाँव में आज तक किसी दलित की शादी में ऐसी प्रथा नहीं हुई है। यदि ऐसा होता है तो गाँव की मर्यादा का उल्लंघन होगा और बाकी जातियों के लोगों में द्वेष पैदा होगा।”

संजय की शादी शीतल से होने जा रही है। संजय और शीतल दोनों ही दलित समुदाय से आते हैं, जिस समुदाय को हिन्दुओं द्वारा सदियों से कुचला जा रहा है।

संजय दलित
संजय

भारत में 1950 में ही छुआछुत पर प्रतिबन्ध लगा दिया था, लेकिन देश के बहुत से इलाकों में इस समस्या से छुटकारा आज तक नहीं मिल पाया है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में, जहाँ संजय और शीतल रहते हैं, दलितों नें आर्थिक रूप से बहुत तरक्की कर ली है। इसके बावजूद भी सामाजिक रूप से उन्हें मौलिक अधिकारों के लिए आज तक लड़ना पड़ता है। संजय का कहना है कि उनके पड़ोसी ठाकुर हैं और उन्हें दलितों की तरक्की से हमेशा से घृणा रही है। जब भी दलित बराबरी की बात भी करते हैं, तो उन्हें दबा दिया जाता है।

संजय द्वारा घोड़ी पर बैठने की मंशा जाहिर करना और फिर उसे इस तरह पुलिस और लोगों द्वारा प्रताड़ित करना यह साफ़ दर्शाता है कि जाति किस तरह आज भी समाज की जड़ों में जमी हुई है।

दलित संजय
संजय भीमराव अंबेडकर की मूर्ती के साथ

जैसे-जैसे संजय की शादी की तारीख पास आ रही है, गाँव में दलित और अन्य जाति के लोगों के बीच संघर्ष बढ़ता जा रहा है। यह मामला पुलिस प्रशासन के अलावा हाई कोर्ट तक भी पहुँच चुका है।

हर दिन गाँव में पुलिस और अन्य सरकार अधिकारीयों का ताँता लगा रहता है।

इस पर शीतल का कहना है, “हम क्या गाँव में मंदिर या मस्जिद बनाने की बात कह रहे हैं? हम सिर्फ शादी करना चाहते हैं।”

शीतल दलित
शीतल

एक अन्य घटना में गुजरात के एक दलित युवक प्रदीप राठौड़ की हत्या कर दी जाती है, सिर्फ इस कारण से कि उसने एक घोड़ा खरीदा था और वह उसकी सवारी करना चाहता था। 31 मार्च को प्रदीप को उसी के गाँव वालो नें घेरकर मार डाला।

अप्रैल 2 को 27 साल के रामप्रसाद बामनिया नें जब अपनी शादी के दौरान घोड़ी की सवारी की, तो अन्य जाति के लोगों नें उसपर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। रामप्रसाद को उनसे बचने के लिए घोड़ी पर हेलमेट पहनना पड़ा।

दलितों पर इस तरह की होने वाली घटनाओं को यदि हम खोजना शुरू करें, तो दर्ज करने के लिए समय कम पड़ जाएगा।

पिछले साल मालवा में एक दलित की शादी के दौरान कई पुलिसकर्मियों को उसकी सुरक्षा के लिए आना पड़ा, क्योंकि स्वर्ण जाति के लोगों नें उसपर हमला करने की धमकी दी।

2016 में हरियाणा के कुरुक्षेत्र में एक दलित के विवाह के दौरान कुछ राजपूत जाति के बदमाशों नें उसपर हमला कर दिया। जब बाद में उनसे हमले का कारण पूछा गया तो उन्होनें कहा कि उन्हें युवक का घोड़े पर बैठना अच्छा नहीं लगा।

राजस्थान के जिलों जैसे अजमेर, भीलवाड़ा आदि से भी दलितों की मार पिटाई की घटना आये दिन आती रहती है।

दलितों पर बने नए कानून को लेकर जब दलितों नें हाल ही में प्रदर्शन किया था, तो पुलिस नें कई इलाकों में बल का प्रयोग किया, जिसमे कम से कम 9 प्रदशनकारियों की मौत हो गयी थी।

दलितों का प्रदर्शन देश की सत्ताधारी मोदी सरकार के खिलाफ भी था, जिनके राज में दलितों पर सैकड़ों आयोजित रूप से आक्रमण हुए हैं।

पिछले एक दशक में दलितों और अल्प-संख्यकों पर हमले 25 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं।

इंडियास्पेंड नामक वेबसाइट की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में आदिवासी और दलितों का जीवनकाल अन्य जातियों के मुकाबले बहुत कम है। आदिवासी समुदाय का औसत जीवनकाल सिर्फ 43 साल है और वहीँ दलितों का औसत जीवनकाल सिर्फ 48 साल है।

दलितों पर बढ़ रहे इस अत्याचार के बाद हमें अपने आप से पूछने की जरूरत है, कि इन लोगों का क्या कसूर है, जिन्होनें दलित परिवार में जन्म लिया है?

हम आज भी लोगों को उनकी जाति के आधार पर क्यों आंक रहे हैं?

जब भीमराव अंबेडकर को हम उनके काम से जानते हैं, तो आज के जमाने में जी रहे दलितों को उनकी जाति से क्यों आंकते हैं?

हमें यह ना सिर्फ समझना होगा बल्कि अन्य लोगों को समझाना भी होगा कि हमें इस जात-पात के समाज से ऊपर उठनें की कोशिश करनी चाहिए।

आज देश कितनी भी तरक्की कर ले, जब तक समाज में लोगों के साथ ऐसी घटनाएं होती रहेंगी, तब तक देश और समाज का सिर शर्म से झुकता रहेगा।

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