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ताजपोशी के बाद आसान नहीं होगी ‘कांग्रेस अध्यक्ष’ राहुल गाँधी की राह

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी
राहुल गाँधी ऐसे नाजुक वक्त में कांग्रेस की कमान सँभालने जा रहे हैं जब पार्टी का राजनीतिक भविष्य ढ़लान पर है। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के पहले ही कई चुनौतियां राहुल गाँधी का मुँह खोले इंतजार कर रही हैं। ताजपोशी के बाद राहुल गाँधी का सबसे पहला काम इनसे निपटना होगा।

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने पार्टी अध्यक्ष बनने की तरफ मजबूती से कदम बढ़ा दिए हैं। राहुल गाँधी ने आज कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए नामांकन का पहला सेट भरा। नामांकन के लिए निर्धारित समय सीमा में अन्य किसी उम्मीदवार ने अपना नामांकन नहीं भरा जिस वजह से राहुल गाँधी के सर्वसम्मति से निर्विरोध कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने का रास्ता भी साफ हो गया। देश की सबसे पुरानी पार्टी की कमान सँभालने जा रहे राहुल गाँधी के समक्ष कई ऐसी चुनौतियां खड़ी है जिससे निपटना किसी लिहाज से आसान नहीं है। राहुल गाँधी ऐसे नाजुक वक्त में कांग्रेस की कमान सँभालने जा रहे हैं जब पार्टी का राजनीतिक भविष्य ढ़लान पर है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या राहुल गाँधी का नेतृत्व कांग्रेस को पुनर्जीवित कर पाने में सफल हो पाएगा?

कांग्रेस अध्यक्ष बनने के पहले ही कई चुनौतियां राहुल गाँधी का मुँह खोले इंतजार कर रही हैं। ताजपोशी के बाद राहुल गाँधी का सबसे पहला काम इनसे निपटना होगा। इन चुनौतियों में मोदी लहर को थामना, वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चलना, पार्टी संगठन को मजबूत करना और प्रदेश इकाईयों में पड़ रही फूट को थामना है। आइए एक नजर डालते हैं बतौर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों पर :

गुजरात विधानसभा चुनाव

कांग्रेस अध्यक्ष पद सँभालने के बाद राहुल गाँधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है गुजरात विधानसभा चुनावों में पार्टी का अच्छा प्रदर्शन। गुजरात में पिछले 22 सालों से कांग्रेस सियासी वनवास काट रही है और भाजपा सत्ताधारी दल है। राहुल गाँधी गुजरात में कांग्रेस की सत्ता वापसी के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं और जातीय समीकरण साधकर भाजपा को घेरने में लगे हुए हैं। पाटीदार और ओबीसी आंदोलन के नेता प्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस के साथ आ चुके हैं जबकि दलित नेता जिग्नेश मेवानी परोक्ष रूप से कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं। बीते 2 दशक में पहली बार कांग्रेस गुजरात में भाजपा को टक्कर देती नजर आ रही है। गुजरात विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन राहुल गाँधी के सियासी भविष्य की दिशा तय करेगा।

परिवारवाद-वंशवाद से निकलना

कांग्रेस पर हमेशा से ही वंशवाद की राजनीति करने का आरोप लगता रहा है। अगर बीते 2 दशक की बात करें तो नेहरू-गाँधी परिवार के हाथ में ही कांग्रेस की बागडोर रही है। सोनिया गाँधी वर्ष 1998 से कांग्रेस की कमान सँभाले हुए हैं। आजादी के बाद से कांग्रेस पर गाँधी-नेहरू परिवार का दबदबा रहा है। अब राहुल गाँधी के सामने यह चुनौती है कि वह अपने नेतृत्व और सियासी सूझबूझ से यह साबित करें कि उनमें कांग्रेस अध्यक्ष बनने की योग्यता थी। देश के सियासी महकमों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि नेहरू-गाँधी परिवार का वंशज होने की वजह से उन्हें यह ओहदा मिला है। राहुल गाँधी को अपने परिवार की विरासत के बोझ से बाहर निकलना होगा और सीधे तौर देश की जनता से जुड़ना होगा।

स्वयं की छवि में सुधार

अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गाँधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती है स्वयं की छवि में सुधार करना। सत्ताधारी दल भाजपा आज भी राहुल गाँधी को गंभीर नेता नहीं मानती और अक्सर उन्हें मजाकिया नेता के तौर पर पेश करती है। खुद कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता राहुल गाँधी को गंभीर नेता नहीं मानते और उनकी सियासी समझ को खास तवज्जो नहीं देते हैं। ऐसे में राहुल गाँधी को अपनी छवि में सुधार के लिए आगामी चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन सुधारना होगा। राहुल गाँधी को अपनी इस छवि को तोड़कर एक मजबूत और गंभीर नेता बनना होगा जिससे ढ़लान पर खड़ी कांग्रेस को स्थायित्व मिल सके।

मोदी लहर को थामना

राहुल गाँधी ऐसे वक्त में कांग्रेस की कमान संभल रहे हैं जब पूरे देश में मोदी लहर चल रही है। मोदी-शाह के करिश्माई नेतृत्व में भाजपा एक के बाद एक देश के सभी राज्यों में फतह हासिल करती जा रही है। पूरा देश भगवामय होने की राह पर है। देशभर में कमल खिलता जा रहा है। कांग्रेस के सबसे मजबूत गढ़ों में से एक असम में भी भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में आ चुकी है। एक-कर सभी राज्यों से कांग्रेस का सफाया होता जा रहा है और पार्टी देश के 6 राज्यों में सिमट कर रह गई है। विधानसभा चुनावों में भी जनता मोदी के चेहरे पर भाजपा को वोट दे रही है। ऐसी नाजुक परिस्थितियों में राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस का पंजा अपनी छाप छोड़ पाएगा या नहीं, इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं।

देश को मजबूत विपक्ष देना

मोदी सरकार के कार्यकाल में देश को एक मजबूत विपक्ष की कमी अखर रही है। कांग्रेस लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है पर उसके पास 10 फीसदी सांसद बल भी नहीं है। कांग्रेस की इस कमजोरी का मोदी सरकार फायदा उठा रही है और बहुत बेफिक्री से देश चला रही है। जबकि कांग्रेस सरकार के दौर में ऐसा कुछ नहीं था। तब भाजपा ने एक मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाई थी और सरकार चलाने में कांग्रेस के पसीने छूट गए थे। अब कांग्रेस को भी कुछ ऐसा ही करने की जरुरत है। मायावती के राज्यसभा इस्तीफे और लालू की रैली के अवसर पर विपक्ष की एकजुटता नजर आई थी पर यह क्षणिक खुशी थी। ऐसे में राहुल गाँधी को विपक्ष को एकजुट कर संसद से सड़क तक मोदी सरकार के खिलाफ संघर्ष करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।

कांग्रेस संगठन को मजबूती देना

संगठन की मजबूती वह बिंदु है जिसपर भाजपा कांग्रेस से मीलों आगे चल रही है। कांग्रेस जमीनी हकीकत को जांचे-परखे बगैर अकेले दम पर भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकने का दम्भ भरती है। अगर 2014 लोकसभा चुनावों के बाद देश में हुए विधानसभा चुनावों पर नजर डालें तो हकीकत खुलकर सामने आती है। कांग्रेस को तकरीबन हर चुनाव में शिकस्त ही हाथ लगी है। अपवाद रहे बिहार और पंजाब में कांग्रेस के सत्ता में आने का कारण कुछ और था। बिहार में महागठबंधन का जातीय समीकरण भाजपा पर भारी पड़ गया था वहीं पंजाब में शिरोमणि अकाली दल के प्रति जनता में व्याप्त रोष भाजपा-अकाली दल गठबंधन पर कहर बनकर टूटा था। बिहार, गुजरात, हिमाचल प्रदेश समेत कांग्रेस की कई राज्य इकाईयों में बगावती सुर उठे थे जो किसी लिहाज से पार्टी हित में नहीं थे। संगठन को मजबूत करने के लिए राहुल को कड़ी मेहनत करनी होगी।

दिग्गजों को साथ लेकर चलना

यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि राहुल गाँधी की आज कांग्रेस में जो भी जगह है उसके पीछे उनके उपनाम का बड़ा हाथ है। राहुल गाँधी अगर नेहरू-गाँधी परिवार से नहीं आते तो शायद भारतीय राजनीति में पहचान बना पाना उनके लिए असंभव था। राहुल गाँधी भी इस बात को भली-भाँति जानते हैं और इसी वजह से अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। राहुल गाँधी को इसका एहसास है कि अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस में उनके कद और भूमिका की तुलना सोनिया गाँधी, राजीव गाँधी, इंदिरा गाँधी सरीखे दिग्गजों से की जाएगी। वीरभद्र सिंह, मणिशंकर अय्यर, जयराम रमेश सरीखे कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता आज भी राहुल गाँधी की सियासी समझ को कुछ खास तवज्जो नहीं देते हैं हालाँकि खुले तौर पर कोई उनका विरोध नहीं करता। बतौर कांग्रेस अध्यक्ष सबको साथ लेकर चलना राहुल गाँधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी।

युवाओं और दिग्गजों के बीच तालमेल बिठाना

राहुल गाँधी के अध्यक्ष बनने के बाद एक बात तो तय है कि वह सियासत के पुराने दिग्गजों की जगह नए मोहरों संग आगे की बाजी खेलेंगे। उन्होंने 2014 लोकसभा चुनावों के पहले सचिन पायलट को अशोक गहलोत पर तरजीह देकर राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष बनाकर इसके संकेत दे दिए थे। आगामी वर्ष मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस दिग्विजय सिंह को दरकिनार कर ज्योतिरादित्य सिंधिया के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुकी है। दिल्ली में भी कांग्रेसी दिग्गज शीला दीक्षित और अजय माकन के बीच के रिश्ते जगजाहिर हैं। कांग्रेस के सियासी दिग्गज एक पुराने वृक्ष की तरह हैं जिनके कटने का असर आस-पास के छोटे पेड़-पौधों पर भी होगा। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि राहुल गाँधी इन पुराने दिग्गजों के साये से निकलकर किस तरह कांग्रेस को नया कलेवर दे पाते हैं।

खोए जनाधार को तलाशना

कभी देश की सियासत पर राज करने वाली कांग्रेस के सामने आज अस्तित्व बचाने का संकट आ गया है। अगर आज से 5 वर्ष पहले की भी बात करें तो कांग्रेस की स्थिति इतनी बुरी नहीं थी। दोनों सदनों में कांग्रेस सबसे बड़ा दल था। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दूसरे कार्यकाल में हुए घोटालों की वजह से जनता का कांग्रेस से मोहभंग हो गया था। 2014 लोकसभा चुनावों से कांग्रेस का जनाधार खिसकना शुरू हुआ जो लगातार खिसकता ही जा रहा है। पिछले कुछ वक्त से राहुल गाँधी राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय रहे हैं और जमीनी मुद्दों पर आधारित राजनीति कर रहे हैं। राहुल गाँधी मोदी सरकार के खिलाफ किसानों की दुर्दशा, युवाओं की बेरोजगारी जैसे मुद्दों को आधार बना रहे हैं। कांग्रेस के सियासी भविष्य के लिए यह काफी अच्छा है। कांग्रेस के खिसकते जनाधार को साधना राहुल गाँधी के लिए बड़ी चुनौती होगी।

कांग्रेस की ‘हिंदुत्व विरोधी’ छवि

कांग्रेस पर हमेशा आरोप लगता रहा है कि वह एक हिंदुत्व विरोधी दल है और अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण करती आई है। 2014 के लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस ने पूर्व रक्षामंत्री ए के एंटनी के नेतृत्व में हार के कारणों का पता लगाने के लिए कमेटी गठित की थी। इस रिपोर्ट में कांग्रेस की हिंदुत्व विरोधी छवि को भी हार के प्रमुख कारणों में से एक माना गया था। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी पिछले कुछ समय से पार्टी की इस छवि को तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं। राहुल गुजरात में अपने चुनावी दौरों पर मंदिर-मंदिर फिर रहे हैं और माथे पर त्रिपुण्ड-तिलक लगाए नजर आ रहे है। राम मंदिर आन्दोलन के वक्त से भाजपा हिंदुत्व के मुद्दे को कांग्रेस के खिलाफ ब्रह्मास्त्र की तरह इस्तेमाल करती आई है। बतौर पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी के सामने कांग्रेस की हिंदुत्व विरोधी छवि सुधारने की बड़ी चुनौती है।

जनता में दोबारा पैठ बनाना

देश में कांग्रेस की गिरती लोकप्रियता का मुख्य कारण है पार्टी नेताओं की जनता से बढ़ती दूरी। कांग्रेस 2019 लोकसभा चुनावों में राहुल गाँधी को नरेन्द्र मोदी के खिलाफ खड़ा करने की तैयारी में है और इस वजह से लगातार उनकी छवि चमकाने पर काम चल रहा है। अपने हालिया विदेश दौरों से लौटने के बाद राहुल गाँधी लगातार जमीनी मुद्दों को आधार बनाकर भाजपा के खिलाफ सियासी जमीन तलाशने में जुटे हुए हैं। राहुल गाँधी लगातार किसानों की दुर्दशा, बेरोजगारी और आर्थिक मोर्चे पर सरकार की विफलता जैसे मुद्दों को आधार बना रहे हैं और गुजरात से लेकर महाराष्ट्र तक में इसके खिलाफ रैलियां कर चुके हैं। अपनी गुजरात यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने नर्मदा विस्थापितों, आदिवासियों और बाढ़ प्रभावित किसानों से भी मुलाकात की थी और उन्हें हरसंभव मदद देने का वायदा किया था।

राहुल गाँधी ने अपने रवैये से स्पष्ट संकेत दे दिया है कि वातानुकूलित कमरों में बैठकर राजनीति करने वाले नेताओं के दिन अब लद चुके हैं। राहुल गाँधी के साथ-साथ कई राज्यों के कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष जमीनी मुद्दों पर आधारित राजनीति कर रहे हैं। बीते दिनों उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर किसानों की बदहाली के मुद्दे पर प्रदेश की सत्ताधारी योगी सरकार के खिलाफ खुद धरने पर बैठे नजर आए थे। राजस्थान कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट ने राजस्थान में किसान यात्रा निकाली थी। वहीं हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष दीपेंद्र सिंह हुड्डा यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर गाँवों में किसान पंचायत लगा रहे हैं और प्रदेश की सत्ताधारी भाजपा सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने की कोशिशों में जुटे हैं। जनता में दोबारा कांग्रेस की पैठ बना पाना राहुल गाँधी के लिए बड़ी चुनौती होगी।

मुद्दों की तलाश

अगर मोदी सरकार के पिछले 3 वर्षों के कार्यकाल पर नजर डालें तो यह स्पष्ट दिखता है कि देश के युवा लगातार बेरोजगार होते जा रहे हैं। पूंजीपतियों का विकास हुआ है और अमीर-गरीब के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। मोदी सरकार द्वारा लागू की गई जीएसटी से छोटे व्यवसायियों और व्यापारियों की कमर टूट गई है। इससे पूर्व हुई नोटबंदी की वजह से व्यापारी वर्ग के साथ-साथ आम जनता को भी काफी परेशानियां उठानी पड़ी थी। भाजपा के कई नेताओं ने आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार की विफलता को लेकर बयान दिए थे। भाजपा की संगठन इकाई आरएसएस से जुड़े कई संगठन भी मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों से खुश नहीं है। ऐसे में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी इस मौके को भुनाने में लगे हैं और लगातार इन मुद्दों पर लगातार मोदी सरकार पर हमलावर रहे हैं।

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी केंद्र की सत्ताधारी मोदी सरकार को घेरने के लिए ताजातरीन मुद्दों की सूची बना चुके हैं। उनके द्वारा चिन्हित प्रमुख मुद्दों में बेरोजगारी, किसानों की बदहाली, छोटे और मझोले उद्योगों की सुस्त पड़ती रफ्तार और कश्मीर में बेकाबू होते हालात हैं। अपने अमेरिका दौरे के दौरान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने इन सभी मुद्दों का जिक्र किया था। अपने हालिया अमेठी और गुजरात दौरों पर भी उन्होंने सत्ताधारी भाजपा सरकार को इन्ही मुद्दों के आधार पर घेरा था। राहुल गाँधी और कांग्रेस वह मुद्दे पहचान चुके हैं जो उनको सत्ता तक पहुँचा सकते है और इसी वजह से वह लगातार मोदी सरकार को घेरने में सफल रहे हैं। पीएम मोदी पर व्यक्तिगत हमलों से इतर कांग्रेस को मुद्दा आधारित राजनीति की राह पर लौटाना राहुल गाँधी के लिए बड़ी चुनौती होगी।

About the author

हिमांशु पांडेय

हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है।

मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।

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