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    केंद्र सरकार और आरबीआई

    अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने कहा है कि वो देश में हाल में चल रही आरबीआई और केंद्र सरकार के बीच अनबन में अपनी नज़रें गड़ाए हुए है। इसी के साथ ही आईएमएफ़ ने कहा है कि विश्व में कहीं भी यदि किसी केंद्रीय बैंक की स्वतन्त्रता खतरे में पड़ती है, तो आईएमएफ़ उसका विरोध करेगा।

    मालूम हो कि पिछले मंगलवार को केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वर्ष 2008 से 2014 के बीच बड़ी संख्य बुरे ऋण या NPA जारी करने के लिए आरबीआई पर दोष लगाया था। इसी के बाद से आरबीआई और केंद्र के बीच तनाव का माहौल पैदा हो गया है।

    आईएमएफ़ के कम्युनिकेशन डायरेक्टर ग्रेसी राइस ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया है कि “हम इस पूरे घटनाक्रम पर नज़र बनाए हुए है और हम आगे भी ऐसा ही करते रहेंगे।”

    गैरी ने बताया है कि “आईएमएफ़ अभी इस मुद्दे पर किसी भी तरह से दखल देने का विचार नहीं बना रहा है।”

    गैरी ने कहा कि “इसी के साथ अंतर्राष्ट्रीय मानकों का सम्मान करते हुए किसी भी सरकार को केंद्रीय बैंक या वित्तीय सलाहकार की स्वतन्त्रता पर सेंध लगाने की कोशिश नहीं करने चाहिए।”

    गैरी के अनुसार विश्व भर में केंद्रीय बैंकों व वित्तीय सलाहकारों की स्वतन्त्रता का पुख्ता होना बहुत जरूरी है। अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो इससे संबन्धित देश की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।

    मालूम हो कि विश्व के तमाम देश अपनी केंद्रीय बैंकों पर पर समय समय पर उंगली उठाते रहते हैं। ऐसे में हाल ही में अमेरिका के डोनाल्ड ट्रम्प ने भी अपनी फेडरल रिज़र्व को फटकार लगाई थी।

    हालाँकि भारत में केंद्र और आरबीआई के बीच तल्खी तब और बढ़ गयी जब आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने ने केंद्र के खिलाफ सारजनिक रूप से तीखे शब्दों में बोलते हुए यह कहा था कि केंद्रीय बैंक की स्वतन्त्रता को खत्म करना ‘संभावित आपदाजनक’ हो सकता है।

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