Thu. Jun 8th, 2023
    डोनाल्ड ट्रम्प और किम जोंग उन उत्तर कोरिया

    पश्चिमी एशिया में इस समय युद्ध के आसार बने हुए हैं । उत्तर कोरिया आये दिन नए परमाणु बमो का परिक्षण कर रहा है। हाल ही में उत्तर कोरिया ने हाइड्रोजन बम का परिक्षण किया, जिसके बाद पुरे विश्व में हलचल मच गयी है।

    उत्तर कोरिया के इन परीक्षणों की सबसे बड़ी वजह है, अमेरिका। अमेरिका पर काबू पाने के लिए उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग को सबसे असरदार रास्ता परमाणु हथियारों का लग रहा है। उत्तर कोरिया के इन परीक्षणों से ना सिर्फ अमेरिका, बल्कि जापान, दक्षिण कोरिया समेत कई देश सहमे हुए हैं।

    विशेषगयों की माने तो उत्तर कोरिया अमेरिका पर पहले हमला नहीं करेगा। अगर किम जोंग थोड़ा भी समझदार है, तो वह अमेरिका पर परमाणु बम कभी नहीं गिरायेगा। अमेरिका विश्व की सबसे बड़ी ताकत है। अमेरिका की सेना विश्व की बाकी सेनाओं से कहीं आगे है। इसके अलावा अमेरिका के पास रूस के बाद सबसे ज्यादा परमाणु हथियार हैं। अगर अमेरिका उत्तर कोरिया पर पूरी ताक़त से हमला करता है, तो उसे उत्तर कोरिया को ख़तम करने में ज्यादा वक़्त नहीं लगेगा।

    इसके अलावा अमेरिका भी उत्तर कोरिया पर पहले हमला नहीं कर सकता। अगर अमेरिका ऐसा करता है, तो किम जोंग को उसके परमाणु हथियारों के भंडार को इस्तेमाल करने में जरा भी वक़्त नहीं लगेगा। ऐसे में अमेरिका के कई शहर इसकी चपेट में आ सकते हैं। अमेरिका के अलावा जापान और दक्षिण कोरिया भी किम जोंग के दायरे में होंगे।

    अगर युद्ध के विकल्प को छोड़ दिया जाए, तो अमेरिका और कैसे उत्तरी कोरिया को नियंत्रण में कर सकता है?

    दरअसल सबसे असरदार विकल्प, जिसकी बात खुद डोनाल्ड ट्रम्प कर चुके हैं, वह है उत्तर कोरिया के साथ किसी भी तरह के व्यापार को बंद कर देना। उत्तर कोरिया अपने इस्तेमाल के लिए लगभग 60 प्रतिशत वस्तुओं को दूसरे देशो से खरीदता है। इनमे कच्चा तेल, कोयला, खाद्य पदार्थ आदि शामिल है। चीन उत्तरी कोरिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साथी है। कोरिया के कुल आयात में से 50 प्रतिशत चीन से आती हैं। ऐसे में चीन का सहारा लेकर उत्तर कोरिया पर दबाव बनाया जा सकता है।

    पर सवाल यह है, कि क्या चीन अमेरिका के कहने पर उत्तरी कोरिया पर दबाव बनाएगा? 

    किम जोंग और शी जिनपिंग

    दरअसल अभी तक ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला है। पहले जहाँ चीन खुले में उत्तर कोरिया का समर्थन करता था, अब उसने उत्तर कोरिया के बारे में बोलना बंद कर दिया है। जब भी अमेरिका और उत्तर कोरिया के बीच जंगी हालात होते हैं, चीन मामले को शांति से सुलझाने की बात करता है। दरअसल चीन और उत्तर कोरिया के बीच ऐतिहासिक सम्बन्ध हैं। 1950 के दशक में जब कोरियाई युद्ध हुआ था, तब चीन ने उत्तर कोरिया का साथ दिया था। इसके बाद हालाँकि दोनों देशों के रिश्ते कमजोर होते चले गए। कमजोर रिश्तों के बावजूद उत्तर कोरिया चीन के लिए काफी अहम् है।

    पहला तो उत्तर कोरिया चीन के लिए व्यापारिक तौर पर एक बड़ा देश है। इसके अलावा चीन और उत्तर कोरिया के बीच हज़ारों किमी लम्बी सीमा है। ऐसे में अगर कोई युद्ध कोरियाई द्वीप पर होता है, तो इसका असर चीन पर जरूर पड़ेगा।

    ऐसे में चीन का पक्ष साफ़ नहीं है। चीन के अलावा रूस एक ऐसा देश है, जो सीधे तौर पर उत्तर कोरिया को कुछ कहने से बच रहा है। ऐसे में अमेरिका के लिए उत्तर कोरिया पर दबाव बनाना कठिन होता जा रहा है।

    चीन और रूस के रुख को देखते हुए ट्रम्प के पास एक ही विकल्प बचा है, वह है जापान और दक्षिण कोरिया को मजबूत बनाना। ट्रम्प ने हाल ही में कहा था कि अमेरिका जापान और दक्षिण कोरिया को आधुनिक लड़ाकू हथियार देगा। इन सबके बावजूद एक बात तो तय है कि चीन और रूस के हस्तक्षेप के बिना उत्तर कोरिया पर किसी प्रकार की कार्यवाई नहीं की जा सकती। अब देखना होगा कि किस तरह ट्रम्प पुतिन और शी जिनपिंग को इस युद्ध में शामिल करते हैं?

     

    By पंकज सिंह चौहान

    पंकज दा इंडियन वायर के मुख्य संपादक हैं। वे राजनीति, व्यापार समेत कई क्षेत्रों के बारे में लिखते हैं।