Mon. Apr 15th, 2024
    Kangana Ranaut Vs Supriya Shrinate Row

    Kangana Ranaut Row: जैसे जैसे लोकसभा चुनाव की तारीखें नजदीक आते जा रही है, नेताओं द्वारा अपने प्रतिद्वंदियों के लिए प्रयुक्त भाषा का स्तर भी गिरता जा रहा है। इस निम्नतम स्तर की राजनीति का एक नज़ारा हालिया दिनों में दो राष्ट्रीय दलों के वरिष्ठ नेताओं द्वारा देखने को मिला।

    सबसे पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेत्री, राष्ट्रीय प्रवक्ता और पार्टी के सोशल मीडिया प्रमुख सुप्रिया श्रीनेत (Supriya Shrinate) के सोशल मीडिया एकाउंट से सोमवार को किये गए एक पोस्ट में हिमाचल प्रदेश के मंडी लोकसभा सीट से बीजेपी प्रत्याशी और मशहूर अदाकारा कंगना रनौत (Kangana Ranaut) के लिए बेहद निम्नस्तरीय भाषा का प्रयोग हुआ। इस पोस्ट में अभिनेत्री कंगना रनौत के एक तस्वीर को साझा करते हुए लिखा गया –“क्या भाव चल रहा है मंडी में…”

    ज़ाहिर है, कांग्रेस के किसी बड़े नेता के सोशल मीडिया एकाउंट से ऐसा विवादास्पद टिप्पणी किसी बीजेपी के प्रत्याशी के लिए आने के बाद बवाल मचना ही था और बवाल मचा भी। कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे पर चौतरफा घिरती दिखी और बीजेपी ने जमकर हमला बोला।

    लेकिन अभी बवाल थमता, उस से पहले ही बीजेपी के वरिष्ठ नेता दिलीप घोष ने बंगाल के महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Dileep Ghosh on Mamata Banerjee) के लिए एक बेहद निंदनीय बयान दिया। उन्होंने सुश्री बनर्जी के लिए कहा कि “पहले वह अपने असली पिता को पहचान लें..”

    दिलीप घोष का यह बयान महिला मुख्यमंत्री के लिए बेहद घटिया श्रेणी की थी और इसके बाद जो बीजेपी सुप्रिया श्रीनेत के बयान के बाद कांग्रेस पर हमलावर थी, वह खुद मामला समेटने में भिड़ गयी।

    इसमें कोई दो राय नहीं है कि दोनों की राष्ट्रीय दल के दो वरिष्ठ नेताओं द्वारा दिया गया बयान स्त्री के प्रति समाज मे व्याप्त एक द्वेष की भावना से भरी हुई है। टेलीविजन चैनलों पर होने वाले चर्चाओं और सोशल मीडिया पर एक दूसरे के नए पुराने बयानों का हवाला देकर यह जुबानी जंग जरूर जीती जा सकती है कि किसने किस हद तक निम्नस्तरीय बयानबाजी की है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे बयानों पर व्यक्तिगत स्तर पर और पार्टी के स्तर पर भी जवाबदेही तय हो।

    ज्यादातर मौकों पर यह देखा गया है कि पार्टियां ऐसे बयानों को नेताओं का निजी बयान बताकर अपना पल्ला झाड़ लेती हैं। कई बार तो नेतागण खुद के ही बयान से यह कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं कि उनके बयान को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया है।

    अभी के ताजे मामले में कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने कंगना रनौत (Kangana Ranaut) के लिए अपने बयान की जिम्मेदारी ली लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उनके एकाउंट से यह पोस्ट किसी और ने डाला है। हालांकि सुप्रिया के पद और कद को देखते हुए उनकी यह सफ़ाई हज़म होने वाली बात नहीं लगती;फिर भी इस बात को जरूर रेखांकित किया जाना चाहिए कि उन्होंने अपने बयान की जिम्मेदारी ली।

    दिलीप घोष को भी उनकी पार्टी (BJP) ने नोटिस थमाया और इसके बाद दिलीप घोष ने यह कहते हुए माफी मांगी कि उनके बयान से पार्टी और अन्य लोग खुश नहीं है। इसका मतलब यह कि उन्हें अपने बयान के लिए कोई खेद नहीं है, बस पार्टी के दवाब में माफी मांग रहे हैं।

    ऐसी टिप्पणियां- चाहे इसके निशाने पर अभिनेत्री से नेत्री बनी कंगना रनौत (Kangana Ranaut) हो या बंगाल की कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) हों या फिर लोक-गायिका नेहा सिंह राठौड़ (Neha Singh Rathore) या फिर भारतवर्ष की कोई भी नारी हो, यह समाज के उस मानसिकता को उजागर करती है जो महिलाओं द्वारा सार्वजनिक जीवन मे अपने लिए उपयुक्त स्थान बनाने की शक्ति को पहचानने से इनकार करता रहा है।

    खेल हो या अर्थव्यवस्था, कला हो या संस्कृति, सेना हो या विज्ञान, राजनीति हो या नौकरशाही- आज महिलाऐं हर एक सार्वजनिक क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज करवा रही है। चुनावी गुणा-गणित में भी बीते कई चुनावों से यह देखने को मिला है कि महिला मतदाताओं की संख्या लगातार बढ़ी है। आगामी लोकसभा चुनाव के लिए भी 100 से ज्यादा संसदीय क्षेत्रों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों के मुकाबले ज्यादा है।

    इन तमाम क्षेत्रों में नेतृत्व करती महिलाओं की बढ़ती उपस्थिति वर्तमान में एक स्पष्ट वास्तविकता है। यही वजह है कि महिलाओं के तमाम क्षेत्रों में बढ़ती भागीदारी को देखकर अभी हाल ही में केंद्र सरकार भी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में भी महिलाओं के लिए सीट आरक्षित करने का प्रावधान लेकर आई थी।

    हालांकि इस वजह से एक नई तरह की बहस निकलकर सामने आई कि आरक्षण देकर महिलाओं को अधिकार देने की बात अपने आप मे महिलाओं की स्वायत्तता और गरिमा को पहचानने और सम्मान करने से इनकार करने जैसा है।

    यह दृष्टिकोण महिलाओं को या तो योजनाओं से लुभाने के लिए निष्क्रिय लाभार्थी के रूप में चित्रित करता है, या फिर ऐसे रूप में जिनका यौन शोषण किया जाता रहा है और अपमानित किया जाता है। यह अक्सर ही असभ्य टिप्पणियों में प्रकट होता है जैसा कि अभी सुप्रिया श्रीनेत (Supriya Shrinate) ने कंगना रनौत (Kangana Ranaut) के लिए किया है या फिर बीजेपी के दिलीप घोष द्वारा ममता बनर्जी के लिए किया गया हो।

    कुलमिलाकर, आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर अगले कुछ महीनों में नेताओं द्वारा एक दूसरे पर तरह तरह के आरोप-प्रत्यारोप और टिप्पणियां की जाएंगी; लेकिन राजनीतिक दलों को यह सुनिश्चित करना होगा कि महिलाओं के प्रति टिप्पणी करने में थोड़ी सावधानी बरतें। भारत आज तेजी से बदल रहा है और महिलाएं इस बदलाव की धुरी हैं। ऐसे में एक दूसरे के खिलाफ ओछी बयानबाजी करने से दलों द्वारा आम महिलाओं के प्रतिनिधित्व कर पाने की क्षमता पर सवाल खड़ा करता है।

    By Saurav Sangam

    | For me, Writing is a Passion more than the Profession! | | Crazy Traveler; It Gives me a chance to interact New People, New Ideas, New Culture, New Experience and New Memories! ||सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल ज़िंदगानी फिर कहाँ; | ||ज़िंदगी गर कुछ रही तो ये जवानी फिर कहाँ !||

    One thought on “Kangana Ranaut Row: महिलाओं के प्रति द्वेष वाली राजनीति का एक नमूना.”
    1. काफी वक़्त बाद मौका मिला आपके विचारों से रूबरू होने का।।।इस राजनीति के मुद्दे के पीछे छिपे महिलाओ के प्रति आपके विचार काफी सराहनीय है।।

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