बुधवार, फ़रवरी 26, 2020

2019 लोकसभा चुनाव : सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन के सियासी मायने

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हिमांशु पांडेय
हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।

2019 में प्रस्तावित लोकसभा चुनावों के लिए सभी राजनीतिक दल अपनी तैयारियों में जुट गए हैं। सत्ताधारी दल भाजपा जहाँ दक्षिण भारत में अपनी सियासी जमीन तैयार कर रहा है वहीं विपक्षी दल मोदी सरकार के खिलाफ एकजुट होकर धर्मनिरपेक्ष मोर्चा बनाने में जुटे हुए हैं। शरद यादव का सांझी विरासत सम्मलेन हो या लालू प्रसाद यादव की पटना रैली, कई मौकों पर केंद्रीय महागठबंधन की झलक देखने को मिली है। 2019 में होने वाले सियासी रण के लिए सभी दल अभी से सियासी बिसात बिछाने में जुट गए हैं। अभी से सियासी गलियारों में चुनावों लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाईं जा रही हैं। वामपंथी धड़े के शीर्ष दल सीपीएम का झुकाव धीरे-धीरे कांग्रेस की तरफ होता दिख रहा है। कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर सीपीएम में माथापच्ची चल रही है और पार्टी 2 धड़ों में बँटी नजर आ रही है।

पिछले दिनों दिल्ली में सीपीएम मुख्यालय में हुई केंद्रीय समिति की तीन दिवसीय बैठक में इस बात को लेकर चर्चा हुई। सोमवार, 16 अक्टूबर को बैठक का आखिरी दिन था। अगर अटकलों पर यकीन करें तो सीपीएम आगामी लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन करना चाहती है। 3 साल पूर्व विशाखापत्तनम में हुई सीपीएम की पार्टी कांग्रेस में यह फैसला लिया गया था कि पार्टी ना भाजपा के साथ जाएगी और ना कांग्रेस का समर्थन करेगी। पर अब सीपीएम भाजपा के विरुद्ध धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ सकती है। हालाँकि इस बात को लेकर सीपीएम में दो फाड़ हो चुके हैं। प्रकाश करात गुट किसी भी दल के साथ गठबंधन का पक्षधर नहीं है वहीं सीताराम येचुरी का खेमा कांग्रेस के साथ गठबंधन करना चाहता है।

केंद्रीय समिति की बैठक में उठी रुख बदलने की मांग

दिल्ली में हुई सीपीएम की 3 दिवसीय केंद्रीय समिति की बैठक में देश के बदलते राजनीतिक हालातों पर चर्चा हुई। बैठक में पार्टी नेतृत्व से अपने रुख में बदलाव करने की मांग उठी। 2014 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा जिस तरह से देश के सियासी पटल पर छाई है, उसने सभी दलों की नींद उड़ा कर रख दी है। भाजपा एक के बाद एक विधानसभा चुनावों में भी फतह हासिल करती जा रही है और पूरे देश को भगवामय करने की राह पर है। सीपीएम को सबसे बड़ा झटका तब लगा था जब हालिया संपन्न निकाय चुनावों में भाजपा पश्चिम बंगाल की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। सीपीएम निराशाजनक रूप से चौथे स्थान पर रही थी।

कभी वामपंथियों के गढ़ रहे पश्चिम बंगाल में मिली इस करारी हार से सीपीएम तिलमिला उठी है और भाजपा को सत्ता से हटाने के लिए धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की सोच रही है। केंद्रीय समिति की बैठक में सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी ने प्रस्ताव रखा कि भाजपा को हराने के वामपंथी दलों को 2019 लोकसभा चुनावों में देश की अन्य धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के साथ तालमेल बढ़ाना होगा। इस प्रस्ताव में येचुरी ने सीधे तौर पर कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात नहीं की है पर उनका इशारा इसी ओर है। पिछले कुछ समय से चुनावों में सीपीएम का प्रदर्शन लगातार खराब रहा है और इसे सुधारने के लिए येचुरी कांग्रेस का सहारा लेना चाहते हैं। सीपीएम लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ वैचारिक और सैद्धांतिक समझौता कर सियासी रण में उतरना चाहती है।

किसी तरह के गठबंधन के खिलाफ हैं प्रकाश करात

सीताराम येचुरी के विरोधी खेमे का नेतृत्व करने वाले सीपीएम के पूर्व महासचिव प्रकाश करात ने केंद्रीय समिति की बैठक में दूसरा प्रस्ताव रखा। उनका प्रस्ताव था कि सीपीएम को लोकसभा चुनावों में किसी तरह का गठबंधन नहीं करना चाहिए। इस प्रस्ताव पर हुई चर्चा में 63 सदस्यों ने भाग लिया। 32 सदस्यों ने प्रकाश करात के गठबंधन ना करने वाले प्रस्ताव पर अपनी सहमति जताई वहीं 31 सदस्यों ने सीताराम येचुरी के धर्मनिरपेक्ष दलों से गठबंधन करने की बात का समर्थन किया। सीताराम येचुरी और प्रकाश करात गुट दोनों ही केंद्र की सत्ताधारी मोदी सरकार के खिलाफ हैं। दोनों ही नेताओं को मानना है कि 2019 में भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए तत्काल जरूरी प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए। लेकिन इसके लिए क्या रास्ता अपनाया जाए इस बात को लेकर सीपीएम नेतृत्व में मतभेद नजर आ रहा है।

व्यापक होगा सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन का असर

कभी ही सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन की बात अभी अधर में हो पर इसकी वजह से होने वाले सियासी बदलावों पर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। दोनों ही दल गठबंधन के बाद होने वाले सियासी फायदे और घाटे की नाप-तौल में जुट गए हैं। सीपीएम और कांग्रेस दोनों की विचारधाराएं बिल्कुल अलग हैं पर भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकने की बात पर दोनों साथ हैं। भाजपा को सत्ता से बेदखल करना दोनों में से किसी भी दल के अकेले बूते की बात नहीं है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मजबूरी बन रहे सियासी हालातों को मद्देनजर रखते हुए सीपीएम क्या फैसला लेती है और क्या कांग्रेस उससे गठबंधन की बात स्वीकार करती है? सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन होने की हालत में क्या होगा कांग्रेस का सियासी भविष्य? आइए इसपर डालते हैं एक नजर :

वामपंथी दलों को आधार देगा गठबंधन

2014 में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा ने सत्ता विरोधी लहर और नरेंद्र मोदी के चेहरे के दम पर प्रचण्ड बहुमत हासिल किया था। देश के अबतक के इतिहास में यह कांग्रेस की सबसे शर्मनाक हार थी। प्रमुख विपक्षी दल बनी कांग्रेस मात्र 45 सीटों पर सिमट कर रह गई थी। सत्ता में आने बाद भाजपा का प्रभुत्व पूरे देश में बढ़ा है। सभी सियासी दल इस बात से भली-भांति परिचित हैं और इसी वजह से लोकसभा चुनावों में भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर उतरना चाहते हैं। देश के कई हिस्सों में हालिया संपन्न उपचुनावों और निकाय चुनावों में कांग्रेस और समर्थक दलों के हाथ जीत लगी है। कांग्रेस के प्रदर्शन में सुधार को देखते हुए वामपंथी दल गठबंधन में दिलचस्पी ले रहे हैं। वामपंथी दल पिछले कुछ समय से अपना जनाधार खोते जा रहे हैं और कांग्रेस से गठबंधन उन्हें आखिरी सहारा नजर आ रहा है।

पश्चिम बंगाल में छूटेगा तृणमूल कांग्रेस का साथ

पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों के साथ सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते किसी से छिपे नहीं हैं। सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन की सूरत में तृणमूल कांग्रेस इस गठबंधन से दूरी बनाकर रखेगी। तृणमूल कांग्रेस इससे पहले मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में भागीदार रह चुकी है। तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी उस समय रेल मंत्री रही थी। उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद मुकुल रॉय को यह जिम्मेदारी मिली थी। पटना में लालू प्रसाद यादव की रैली में उनके कांग्रेस नेताओं के साथ मंच साझा करने से यह आसार बन रहे थे कि वह एकबार फिर कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल हो सकती हैं। सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन होने की सूरत में कांग्रेस को तृणमूल कांग्रेस के समर्थन से हाथ धोना पड़ सकता है।

अगर मतों के लिहाज से देखें तो भी तृणमूल कांग्रेस सीपीएम पर भारी पड़ती नजर आती है। 2014 लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस भाजपा, कांग्रेस, बसपा के बाद मतों के आधार पर देश की चौथी सबसे बड़ी पार्टी थी। तृणमूल कांग्रेस को 3.8 फीसदी मत मिले थे वहीं 3.2 फीसदी मतों के साथ सीपीएम सातवें स्थान पर थी। पश्चिम बंगाल की 38 सीटों पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा रहा था जबकि सीपीएम का खाता भी नहीं खुला था। तृणमूल कांग्रेस मुख्यरूप से पश्चिम बंगाल की पार्टी है और सीपीएम का आधार त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, केरल सहित कई राज्यों में फैला हुआ है। इसके बावजूद भी सीपीएम तृणमूल कांग्रेस से कहीं पीछे है। पश्चिम बंगाल में सीपीएम के साथ गठबंधन कांग्रेस के लिए घाटे का सौदा साबित होगा।

केरल में टूटेगा यूडीएफ गठबंधन

केरल में सीपीएम के नेतृत्व वाली एलडीएफ सरकार के खिलाफ कांग्रेस का यूडीएफ गठबंधन है। इस गठबंधन में कांग्रेस के साथ केरल कांग्रेस, आईयूएमएल समेत कई ऐसे दल हैं जो सत्ताधारी एलडीएफ सरकार के खिलाफ हैं और प्रमुख विपक्ष की भूमिका में हैं। ऐसे में सीपीएम से गठबंधन करने की सूरत में केरल में कांग्रेस अकेली पड़ जाएगी और उसे पुरानी सहयोगियों से हाथ धोना पड़ जाएगा।

गठबंधन से दूरी बनाएगी बीजेडी

सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन होने की सूरत में उड़ीसा का सत्ताधारी दल बीजेडी भी कांग्रेस से दूरी बना लेगा। बीजेडी हुए सीपीएम की विचारधाराओं में बहुत अंतर है और उड़ीसा में वामपंथी दल बीजेडी के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं। भाजपा 2014 लोकसभा चुनावों के बाद से उड़ीसा पर ध्यान केंद्रित कर रही और राज्य में अपनी जड़ें जमाने की हरसंभव कोशिश कर रही है। मोदी मन्त्रिमण्डल विस्तार में धर्मेंद्र प्रधान की मिली पदोन्नति भाजपा की विस्तार रणनीति का ही हिस्सा है। उड़ीसा में बीजेडी की पकड़ काफी अच्छी है और 2014 लोकसभा चुनावों के समय राज्य की 21 में से 20 लोकसभा सीटें बीजेडी के खाते में गई थी। भाजपा को 1 सीट पर सफलता मिली थी।

बीजेडी भाजपा विरोधी गुट में शामिल होना चाहती है पर वह वामपंथी दलों से दूरी बनाकर रखना चाहती है। बीजेडी उड़ीसा में भाजपा के बढ़ते प्रभाव से रक्षात्मक मुद्रा में है और आगामी विधानसभा चुनावों से पूर्व खुद को सुरक्षित करने में जुटी है। 2014 लोकसभा चुनावों में बीजेडी को 1.7 फीसदी मत हासिल हुए थे जो राष्ट्रीय स्तर का है। नीतीश कुमार के भाजपा से हाथ मिला लेने से भाजपा विरोधी खेमा पहले से ही कमजोर हो गया है। इसके बाद अगर एक-एक कर क्षेत्रीय दल कांग्रेस से अलग हो जाते हैं तो उसके लिए अपना पुराना प्रदर्शन दोहराना भी मुश्किल हो जाएगा। सीपीएम-कांग्रेस गठबंधन से कांग्रेस को आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में फायदा मिलेगा पर समाज का एक बड़ा तबका उससे कट जाएगा। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सीपीएम से गठबंधन को लेकर मची इस खींचतान पर कांग्रेस क्या कदम उठाती है?

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