देश को आजाद हुए 70 साल बीत चुके हैं। आजादी के बाद से भारत ने अमूमन हर क्षेत्र में तरक्की की है। आज देश के तकरीबन सभी हिस्सों में पानी, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध है। आजादी के बाद भारत एक लोकतांत्रिक देश के तौर पर और मजबूत हुआ है। इन उपलब्धियों के साथ-साथ एक स्याह सच यह भी है कि आज भी देश के कई हिस्सों में विकास की रोशनी नहीं पहुँची है और वहाँ के निवासियों को बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही है। कोई भी सरकार चाहे कितना भी जन हितैषी होने का दावा करे पर इस बात से किसी को गुरेज नहीं होगा “जिसकी लाठी, उसकी भैंस” यही इस देश का प्रचलन रहा है। प्राचीन काल में राजाओं ने छोटे तबके के लोगों को गुलाम बना कर रखा, उसके बाद सामंतों और जमीदारों ने उनसे चाकरी कराई।
भारत में लोकतंत्र बहाल होने के बाद शोषित वर्ग में हालात सामान्य होने की जो एक उम्मीद जगी थी, लालफीताशाही और संसाधनों के आभाव ने उसपर भी पानी फेर दिया। आजादी के बाद भी समाज के पिछड़े और निचले तबकों का जमकर शोषण हुआ और उनके अधिकारों का हनन हुआ। लोकतंत्र की बहाली के बाद भी सरकार जमीनी स्तर पर इनके कल्याण के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठा पा रही थी जिससे सरकारी व्यवस्था के प्रति इनकी नाराजगी बढ़ती गई। लगातार हो रही अपेक्षा और शोषण से इस वर्ग में शासन के प्रति धीरे-धीरे आक्रोश बढ़ता गया और इस आक्रोश ने एक सशस्त्र आन्दोलन का रूप ले लिया। कम्युनिस्ट नेताओं चारु मजूमदार और कानू सान्याल के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ यह आन्दोलन धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल गया और इसका नाम नक्सलवाद पड़ गया।
50 साल पुरानी हैं नक्सलवाद की जड़ें
नक्सलवाद की नींव पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गाँव में 1967 में पड़ी थी। इसकी शुरुआत चारु मजूमदार और कानू सान्याल ने संयुक्त रूप से की थी। भारत में नक्सलवाद का जनक कानू सान्याल को ही माना जाता है। कानू सान्याल और चारु मजूमदार की मुलाकात जेल में हुई थी। जेल से बाहर आने के बाद उन्होंने व्यवस्था के खिलाफ बगावत छेड़ते हुए सशस्त्र नक्सल आन्दोलन की शुरुआत की। चारु मजूमदार चीन के कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसक थे और उनके सिद्धांतों को मानते थे। उनकी अवधारणा थी कि भारतीय मजदूरों और किसानों की दुर्दशा के लिए सरकार की नीतियां जिम्मेदार है। इस वजह से ही उच्च वर्ग का प्रभुत्व कृषितंत्र और शासनतंत्र पर स्थापित हो गया है। उनका कहना था कि केवल सशस्त्र क्रांति से ही इस न्यायहीन दमनकारी प्रभुत्व का खत्म किया जा सकता है।
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1967 में नक्सलबाड़ी में शुरू हुए सशस्त्र आन्दोलन की अगुवाई कानू सान्याल ने की थी। वर्ष 1967 में ही नक्सलवादियों ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। स्वयं को औपचारिक तौर पर कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर विद्रोहियों ने भूमिगत होकर सरकार के खिलाफ सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। आगे चलकर कानू सान्याल और चारु मजूमदार में मतभेद हो गए और दोनों की राहें अलग हो गईं। सशस्त्र आन्दोलन के प्रवर्तक चारु मजूमदार की मृत्यु और वर्ष 1971 में सत्यनारायण सिंह के नेतृत्व में हुए आतंरिक विद्रोह के बाद यह सशस्त्र आन्दोलन पूरी तरह अपने लक्ष्य से दूर होता गया और कई भागों में टूटकर अपनी मूल विचारधारा से विचलित हो गया। हालाँकि उस वक्त तक नक्सलवाद पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में अपने पाँव पसार चुका था।
आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में है गहरी पकड़
नक्सलवाद की पैठ मुख्यतः देश के आदिवासी जनसंख्या बाहुल्य इलाकों में है। आजादी के बाद विकास के नाम पर जंगल की कटाई और खदानों के लिए इनको विस्थापित करने की वजह से ये लोग सरकार से रुष्ट थे। इन क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव था और सरकार लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने में नाकाम रही थी। इस असंतोष का फायदा उठाकर कम्युनिस्टों ने इस सशस्त्र आन्दोलन में इलाके लोगों को जोड़ लिया। नक्सलवाद प्रभावित राज्यों में मुख्यतः पश्चिम बंगाल, बिहार, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश (कुछ जिले) और मध्य प्रदेश (कुछ जिले) के नाम शामिल थे। हालाँकि बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश से नक्सलवाद का पूर्णतः सफाया हो चुका है पर छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश अभी भी नक्सलवाद की चपेट में हैं।
राजनीतिक हथियार बन चुका है नक्सली आन्दोलन
शोषितों और दबे-कुचले वर्ग के लोगों के अधिकारों और हक की लड़ाई के लिए शुरू हुआ नक्सल आन्दोलन अपनी राह भटक चुका है। आज कुशल नेतृत्व और विचारधारा के अभाव में यह राजनीतिक दलों के इस्तेमाल का हथियार बन चुका है। देश की कई प्रमुख पार्टियां नक्सली विचारधारा का समर्थन अपने राजनीतिक फायदे के लिए करती हैं। कई नक्सली संगठन आज वैधानिक राजनीतिक दलों में परिवर्तित हो चुके हैं पर आज भी हथियार उठाने वाले हाथों की संख्या ज्यादा है। इनके रवैये से लगता है कि इनकी नाराजगी सरकारी व्यवस्था से नहीं बल्कि हर सरकारी आदमी से है। अब तक इस सशस्त्र आन्दोलन की वजह से हजारों बेगुनाहों को अपनी जान गंवानी पड़ी है और देश के वीर जवानों को अपने ही लोगों के साथ लड़ाई में शहादत देनी पड़ रही है। अब सबकी बेहतरी इसी में है कि नक्सली हथियार छोड़ मुख्य धारा में शामिल हो जाए।
सरकार की दमनकारी नीति नहीं है हल
केंद्र सरकार ने नक्सलियों के खात्मे के लिए नक्सल प्रभावित इलाकों में कई ऑपरेशन चला रखे हैं। इन सबमें छत्तीसगढ़ में चलाए जा रहे “ऑपरेशन कोबरा” का जिक्र सबसे ऊपर होता है। सरकार ने नक्सलियों के शक्तिपूर्ण दमन के लिए छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ की कई टुकड़ियों को तैनात कर रखा है और अक्सर वहाँ से जवानों की शहादत और नक्सलियों के मौत की खबरें सामने आती रहती हैं। यह तो एक उदाहरण मात्र है। यह चोर-सिपाही का खेल देश में पिछले 5 दशकों से चल रहा है और अब तक सरकार को यह समझ लेना चाहिए था कि दमनकारी नीति इस समस्या का हल नहीं है। सरकार को नक्सली नेताओं से बात करनी चाहिए और उनकी शिकायतें सुननी चाहिए।
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विकास सभी को पसंद होता है पर विकास की कीमत हर किसी ने नहीं चुकाई होती है। सरकार के विरुद्ध सशस्त्र आन्दोलन कर रहे नक्सलियों ने विकास की कीमत चुकाई है पर उनका इसकी वजह से हथियार उठा लेना कोई हल नहीं है। जख्म को भरने का काम मरहम करता है पर उसी जख्म पर लगतार चोट करते रहे तो वह नासूर बन जाता है। नक्सलियों का हाल भी कुछ ऐसा ही है। सरकार की दमनकारी नीति उनके सशस्त्र आन्दोलन को और बढ़ावा दे रही है जिसकी आग में निर्दोष जवान झुलस रहे हैं। सरकार को नक्सलियों को मुख्यधारा में जोड़ने और उनको मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए हर संभव प्रयास करने चाहिए। नक्सलवाद देश को अंदर से खोखला कर रहा है और एक खोखला देश विदेशी ताकतों से नहीं लड़ सकता। सरकार को नक्सलियों को मुख्यधारा में जोड़कर यह बताना होगा रक्त की नदियां बहाकर मुरझाए चेहरों पर मुस्कान नहीं लाई जा सकती।