Wed. Apr 24th, 2024

    भारत के पारिस्थितिक, समाजीय और आर्थिक पर्यावरण में हिमालय का काफी योगदान रहा है। हिमालय विश्व के सबसे ऊँचे पहड़ों में सर्वोच्च है और भारत के जलवायु को नियमित करने में प्रमुख भूमिका निभाता है। विश्व के ज्यादातर ऊँची चोटियां जैसे एवरेस्ट, काराकोरम द्वितीय, कंचनजंगा, नंदादेवी आदि यहां मौजूद हैं।

    लगभग 50 मिलियन इसका निर्माण इंडो-ऑस्ट्रेलियाई और यूरेशियाई प्लेट के टकराने से हुआ था। यहां कई ऐसे दुर्लभ जीव-जंतु, पेड़-पौधे, घाटियां आदि हैं जिससे यहां का दृश्य बहुत सुंदर रहता है और साल भर तापमान सुहाना बना रहता है। कई प्रमुख खनिज (जैसे कि लाइमस्टोन) भी यहां मिलते हैं। हालाँकि हिमालय क्षेत्र भूकंप-प्रवृत क्षेत्र है और पिछले कई सालों में यहां खतरनाक भूकंप देखे गए हैं।

    हिमालय में हो रहे पर्यावरणीय दुर्दशा (Environmental Degradation of Himalayas)

    वातावरणीय दुर्दशा के कारन हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र को काफी नुकसान पहुँच रहा है। अब वहां का वातावरण पहले की तरह विभिन्न जीव-जंतुओं के निवास के लिए उपयुक्त नहीं है। विस्फोटक दर से बढ़ती हुई जनसँख्या, शहरीकरण, लोगों के बढ़ती हुई उपयोगिता और आरामदायक सम्बन्धी जरूरतों ने उद्योगीकरण को बहुत बढ़ावा दिया है।

    इसके कारण प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपभोग हो रहा है जिससे लगभग लगभग ये संसाधन ख़त्म होने के कगार पर हैं। संसाधनों के अति उपयोग के कारण मृदा अपरदन, बाढ़, भूमि का अनुपजाऊ होना, दुर्लभ जीव लुप्त हो रहे हैं और ऐसी कई समस्याएं सामने आ रही हैं।

    हिमालय में हो रहे पर्वतीय दुर्दशा के कुछ प्रमुख कारण (Major Causes of Environmental Degradation of Himalayas)

    हिमालय में मौजूद पारिस्थितिकी तंत्र दुनिया के सबसे नाजुक पारिस्थितिकी तंत्रों में से एक है। हाल में ही यहां चल रहे आर्थिक और औद्योगिक विकास के कार्यों में काफी तेजी आयी है। उसके अलावा अनियंत्रित सैलानियों का आना, पर्वतारोहण, हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर परियोजनाएं, तेजी से बढ़ते हुए शहरीकरण आदि से हिमालय के जैव विविधता को काफी नुकसान पहुँच रहा है।

    जैविक दबा:- हिमालय क्षेत्र अपने अस्थिर स्थलाकृति के लिए जाना जाता है। बढ़ते हुए जनसँख्या के कारण यहां के प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव बढ़ गया है। मानवीय कार्यों के चलते यहां के दुर्लभ जीव-जंतुओं के प्राकृतिक वास पर खतरा छा रहा और कई जीव जंतुओं को विलुप्त होने के कगार पर घोषित कर दिया गया है। मानवीय जानों के रक्षा के लिए कई जंगली जानवरों जैसे हिम तेंदुओं का काफी मात्रा में शिकार हो रहा है।

    प्रदूषण और कचरा:- गाड़ियों की संख्या में हो रहे बढ़ोतरी के कारण वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, कचरा इधर-उधर फेंके जाने के कारण या पानी में बहा देने के कारण मिट्टी का प्रदूषण और जल प्रदूषण देखने को मिल रहा है। वहां रह रही जनसँख्या और सैलानियों द्वारा कचरा इधर उधर फेंके जाने से कचरे की समस्या काफी बढ़ रही है। अगर यह पानी के स्रोत में फंक दिए जाते हैं तो उससे पानी का भाव रुक जाता और कचरा एक जगह जमा रह जाता है। इससे बारिश के मौसम के दौरान बाढ़ आता है।

    शहरी विकास:- बढ़ती हुई जनसँख्या, बहुत से सैलानियों का घाटियों में घूमने आना, सैन्य जरूरतें आदि के कारण हिमालय के ढलानों पर नए बिल्डिंग, रोड, रेलवे स्टेशन, हवाई अड्डा आदि का निर्माण हो रहा है। ढलान पर हो रहे विकास के कार्यों यहां भूस्खलन की समस्या काफी बढ़ गयी गई है।

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