सोमवार, अप्रैल 6, 2020

हिमाचल प्रदेश चुनाव : पीएम मोदी की कांगड़ा रैली के सियासी मायने

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हिमांशु पांडेय
हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।

वीरभूमि कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में 9 नवंबर को विधानसभा चुनाव प्रस्तावित है। राज्य के 12 जिलों की 68 विधानसभा सीटों पर एक साथ चुनाव होंगे और मतगणना 18 दिसंबर को की जाएगी। विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सत्ताधारी दल कांग्रेस और प्रमुख विपक्षी दल भाजपा जोर-शोर से प्रचार-प्रसार में लगे हुए है। हिमाचल प्रदेश देश के उन गिने-चुने राज्यों में हैं जहाँ कांग्रेस की सरकार है। इस लिहाजन कांग्रेस हिमाचल प्रदेश में कुर्सी बचाने की हरसंभव कोशिश कर रही है। वहीं दूसरी ओर राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी और केंद्र में सत्ताधारी दल भाजपा हिमाचल प्रदेश में सत्ता वापसी की जी-तोड़ कोशिशें कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कांगड़ा रैली हिमाचल प्रदेश में भाजपा की सत्ता वापसी की रणनीति का अहम हिस्सा है। अपने सम्बोधन में पीएम मोदी ने इस बात का जिक्र भी किया।

हिमाचल की सत्ता के लिए जरुरी है कांगड़ा जीतना

कांगड़ा में रैली को सम्बोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “जो कांगड़ा में चुनाव जीतता है, हिमाचल प्रदेश में उसी की सरकार बनती है।” उनकी यह बात सोलह आने सच है। कांगड़ा हिमाचल प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है। हिमाचल प्रदेश विधानसभा की कुल 68 सीटों में से अकेले 15 सीटें कांगड़ा जिले की है। एक तरह से कांगड़ा जिला हिमाचल प्रदेश की सियासत में किंगमेकर की भूमिका निभाता है। इसी वजह से यह कहा जाता है कि हिमाचल जीतने के लिए कांगड़ा जीतना जरुरी है।

2012 के चुनावों में भाजपा को कांगड़ा की 15 में से 2 सीटों पर जीत मिली थी वहीं कांग्रेस के हाथ 10 सीटें लगी थी। हालाँकि 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में भाजपा के वरिष्ठ नेता शांता कुमार ने कांगड़ा संसदीय सीट से निवर्तमान सांसद कांग्रेस के चन्दर कुमार को तकरीबन 2,07,000 मतों के बड़े अंतर से हराया था। शांता कुमार को 5,56,000 मत मिले थे वहीं चन्दर कुमार को तकरीबन 2,86,000 मत मिले थे। मतों के लिहाज से शांता कुमार की यह जीत कांगड़ा में अब तक का रिकॉर्ड थी। 2014 आम चुनावों में भाजपा ने हिमाचल प्रदेश में क्लीन स्वीप किया था।

कांगड़ा + मण्डी + शिमला = हिमाचल की सत्ता

अगर सियासी गणित पर नजर डालें तो हिमाचल की सत्ता तक पहुँचने का रास्ता कांगड़ा, मण्डी और शिमला से होकर जाता है। हिमाचल प्रदेश के 12 जिलों में कांगड़ा सबसे बड़ा जिला है। कांगड़ा जिले में 15 विधानसभा सीटें हैं। कांगड़ा के बाद मण्डी हिमाचल का दूसरा सबसे बड़ा जिला है। मण्डी में 10 विधानसभा सीटें हैं। इसके बाद स्थान आता है हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला का। शिमला में 8 विधानसभा सीटें हैं। हिमाचल विधानसभा में कुल 68 सीटें हैं। राज्य में सरकार बनाने के लिए बहुमत का आंकड़ा 35 सीटों का है। अगर कांगड़ा, मण्डी और शिमला की विधानसभा सीटों को मिला दें तो इन 3 जिलों को मिलकर ही आंकड़ा 33 तक पहुँच जाता है जो बहुमत के आंकड़े से मात्र 2 सीटें कम है।

हिमाचल भाजपा के गढ़ और मुख्यमंत्री उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल के गृह जनपद हमीरपुर की 5 सीटें मिला दें तो आंकड़ा 38 तक पहुँच जाता है। भाजपा हिमाचल प्रदेश की सियासत में अहम स्थान रखने वाले इन 4 जिलों पर अपना ध्यान केंद्रित कर रही है। भाजपा के सभी शीर्ष नेता इन महत्वपूर्ण जिलों का लगातार दौरा कर रहे हैं और मतदाताओं को लुभाने का प्रयास कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और स्वास्थ्य मंत्री जे पी नड्डा अब तक हिमाचल का दौरा कर चुके हैं। जे पी नड्डा तो पिछले काफी समय से हिमाचल में खूंटा गाड़ कर बैठे हैं और आलाकमान को सियासी माहौल से अवगत करा रहे हैं। भाजपा हिमाचल प्रदेश में सत्ता वापसी के लिए हर जरुरी समीकरण साध रही है।

सत्ता वापसी बनी भाजपा की प्राथमिकता

भाजपा हिमाचल प्रदेश में सत्ता वापसी को कितनी आतुर है इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि भाजपा आलाकमान ने सत्ता की चाह में ‘रूल 75’ को ताक पर रख दिया है। अमित शाह ने मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर प्रेम कुमार धूमल के नाम का ऐलान कर यह स्पष्ट कर दिया कि भाजपा सत्ता वापसी के लिए एक बार अपने सिद्धांतों से समझौता कर सकती है। प्रेम कुमार धूमल की आयु 73 वर्ष, 6 महीने है। चुनाव परिणाम की घोषणा के वक्त तक उनकी आयु 73 वर्ष, 8 महीने हो जाएगी। अगर भाजपा के ‘रूल 75’ के लिहाज से देखें तो बतौर मुख्यमंत्री उनके पास 16 महीने का कार्यकाल होगा। भाजपा पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल की लोकप्रियता को हिमाचल में सत्ता वापसी का आधार बनाना चाहती है।

हिंदुत्व और कोर वोटबैंक का दांव

बीते दिनों देश में हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हिमाचल प्रदेश का दौरा किया था। कभी अपने बेबाक भाषणों से चर्चा में रहने वाले योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता में मुख्यमंत्री बनने के बाद जबरदस्त इजाफा हुआ है और देशभर में उनको जनसमर्थन मिल रहा है। योगी आदित्यनाथ आज भाजपा के फायरब्रांड नेता होने के साथ-साथ स्टार प्रचारकों की सूची में भी अग्रणी स्थान पर आते हैं। गुजरात भाजपा के एक नेता ने तो उन्हें भाजपा का तीसरा सबसे सशक्त नेता बता दिया था। योगी आदित्यनाथ को हिमाचल प्रदेश में चुनावी अभियान में शामिल कर भाजपा ने हिन्दू मतदाताओं को लुभाने की कोशिश की है। हिमाचल प्रदेश की 95 फीसदी से अधिक आबादी हिन्दू है। ऐसे में योगी का प्रचार अभियान हिमाचल के चुनाव परिणामों पर असर डाल सकता है।

हिमाचल प्रदेश चुनाव
हिंदुत्व और कोर वोटबैंक का दांव

हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा आलाकमान की पहली पसंद मोदी सरकार के मंत्री जे पी नड्डा थे। प्रेम कुमार धूमल को ऐन वक्त पर मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर भाजपा आलाकमान ने हिमाचल प्रदेश में जातिगत समीकरणों को साधने का प्रयास किया है। हिमाचल प्रदेश के मतदाता वर्ग पर नजर डालें तो राज्य की तकरीबन 37 फीसदी आबादी राजपूत समाज की है। ब्राह्मण मतदाताओं की आबादी 18 फीसदी है। सवर्ण वर्ग को हमेशा से भाजपा का कोर वोटबैंक माना जाता है। मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किए गए प्रेम कुमार धूमल राजपूत समाज से आते हैं वहीं मोदी सरकार में मंत्री जे पी नड्डा ब्राह्मण समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं। अगर जातिगत समीकरणों के आधार पर देखें तो धूमल का पलड़ा भारी दिखाई देता है। भाजपा आलाकमान ने इसी आधार पर जे पी नड्डा की जगह प्रेम कुमार धूमल को तरजीह दी है।

‘मिशन 2019’ के लिए अहम होगा हिमाचल का सियासी रुख

2012 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने हिमाचल की 68 विधानसभा सीटों में से 36 सीटों पर कब्जा जमाया था वहीं भाजपा को 26 सीटों पर कामयाबी मिली थी। अन्य दलों के हाथ 6 सीटें लगी थी। 2012 में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा को 2007 के चुनावों की अपेक्षा 16 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था वहीं कांग्रेस को 13 सीटों का फायदा हुआ था। अगर मतों के लिहाज से देखें तो कांग्रेस को 43 फीसदी मत मिले थे वहीं भाजपा को 39 फीसदी मत मिले थे। 2007 के चुनावों की अपेक्षा भाजपा के मत प्रतिशत में 5 फीसदी की कमी आई थी वहीं कांग्रेस का मत प्रतिशत 5 फीसदी बढ़ गया था। 4 फीसदी मतान्तर के बावजूद भाजपा कांग्रेस से 10 सीट पीछे रही थी। अब भाजपा सवर्ण समीकरण को साध मतान्तर पाटकर सत्ता वापसी की राह तलाशने में जुटी है।

हिमाचल प्रदेश में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव भाजपा और कांग्रेस के लिए साख की लड़ाई बन चुका है। दिग्गज कांग्रेसी और राज्य के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह संभवतः अपनी आखिरी सियासी पारी खेलने को तैयार है वहीं प्रमुख विपक्षी दल भाजपा सत्ता वापसी की जी-तोड़ कोशिशों में लगी हुई है। वीरभद्र सिंह के राजनीतिक कद और व्यक्तित्व को देखते हुए भाजपा आलाकमान ने सभी समीकरणों में फिट बैठ रहे प्रेम कुमार धूमल पर दांव खेला है। एक ओर जहाँ हिमाचल की वादियों में पारा लगातार गिर रहा है वहीं सियासी सरगर्मियां लगातार बढ़ रही हैं। सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि हिमाचल की सियासत में बाजी किसके हाथ लगती है। हिमाचल प्रदेश के चुनाव 2019 लोकसभा चुनावों के लिहाज से काफी अहम है और सबकी नजरें चुनाव परिणामों की ओर लगी है।

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