स्कूलों से बच्चों की अनुपस्थिति के कारण का अध्ययन

आज़ादी के समय भारत की साक्षरता दर थी 12 प्रतिशत। आज भारत की साक्षरता दर करीब 74.04 प्रतिशत है। वहां से यहां तक हमने एक लम्बी छलांग लगाई है।

हालांकि चिंता की बात यह है कि इस रफ़्तार से अगर हमारी साक्षरता दर बढ़ी तो पूर्ण साक्षरता तक पहुंचने में हमें 2060 तक का वक्त लगेगा।

मानक संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार देश भर में करीब पन्द्रह लाख प्राथमिक, मध्य व उच्च विद्यालय हैं। मतलब हर करीब हर भारतीय पर 700 विद्यालय हैं।

जाहिर है छात्रों की संख्या हमारी कुल जनसंख्या से बेहद कम है तो प्रति विद्यालय छात्रों की संख्या और कम है। फिर भी भारतीय समाज के लिए पूर्ण साक्षरता एक सपने जैसा क्यों लगता है?

बच्चों की अनुपस्थिति के कुछ आंकड़े

एनुअल स्टेट्स ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ए.इस.ई.आर) के 2016 के सर्वे के मुताबिक देशभर में करीब 25 प्रतिशत बच्चे स्कूलों में नामांकित हैं पर स्कूल नहीं जाते। करीब 20 प्रतिशत बच्चे कभी स्कूल जाया करते थे पर अब जाना छोड़ चुके हैं। ए.एस.ई.आर ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की पहुंच व स्तर को जांचने के लिए सर्वे करता है।

2016 के सर्वे के मुताबिक स्कूल छोड़ना व बच्चों की अनुपस्थिति ग्रामीण इलाकों में शिक्षा पहुंचांने को लेकर सबसे बड़ी चुनौती है।

2017 के आंकड़े

2017 में किये गए सर्वे के मुताबिक 14-18 आयु वर्ग के 86 % बच्चे किसी स्कूल अथवा कॉलेज में नामांकित हैं। जबकि करीब 14 % बच्चे पूरी तरह औपचारिक पढ़ाई को त्याग चुके हैं।

आयु के साथ स्कूल छोड़ने वालों की संख्या बढ़ती है।

14 वर्ष की आयु में केवल 5 % युवा किसी स्कूल में नामांकित नहीं हैं। पर 18 वर्ष की आयु में यह आंकड़ा करीब 30 % हो जाता है।

करीब 5 % युवा रोजगार संबन्धी कोई कोर्स कर रहे हैं। 

बुनियादी शिक्षा सर्वे

2017 के ए.एस.ई.आर  सर्वे का मुख्य लक्ष्य बुनियादी शिक्षा की पहुंच का पता लगाना था।

  • सर्वे के मुताबिक, 14 से 18 वर्ष के आयु वर्ग के करीब 25 प्रतिशत छात्र अपनी भाषा में एक सरल वाक्य नहीं पढ़ सकते हैं।
  • पचास प्रतिशत से भी अधिक छात्र साधारण अंकगणित जैसे “तीन अंक की संख्या को एक अंक की संख्या से भाग देने” के सवाल नहीं कर पाये।
  • 14 वर्ष के छात्रों में करीब 53 प्रतिशत अंग्रेजी का एक सरल वाक्य नहीं पढ़ पाये। 18 वर्ष के छात्रों में यह अनुपात करीब 40 प्रतिशत है।

14 से 18 वर्ष के आयुवर्ग में ऐसे छात्र आते हैं जिन्होंने कम से कम 8 वर्ष की औपचारिक शिक्षा प्राप्त की है। ऐसे में इतने बड़े अनुपात में उनकी शिक्षा का अप्रभावी होना बेहद गम्भीर सवाल खड़े करता है।

राज्यों का फैक्टर

स्कूल छोड़ने व छात्रों की अनुपस्थिति जैसी समस्याएं पिछड़े राज्यों में सबसे अधिक व्यपक हैं।

राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, यूपी, छत्तीसगढ़ व झारखण्ड में स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या सबसे अधिक है।

हालांकि गुजरात जो कि इन राज्यों की तुलना में एक विकसित राज्य माना जाता है। वहां भी स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या का औसत काफी ऊंचा है।

ऐसे राज्यों में उच्च विद्यालय यानी नवीं कक्षा तक आने के बाद स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या काफी बढ़ जाती है। 2016 के आंकड़ों के मुताबिक 15-16 साल की उम्र में 15.3 प्रतिशत छात्र स्कूल छोड़ चुके हैं।

जबकि 11-14 वर्ष आयुवर्ग के बच्चों में यही आंकड़ा महज 4.6 प्रतिशत है।

किसी भी आयुवर्ग में स्कूल ना जाने वाले छात्रों में लड़कियों की संख्या बेहद ज्यादा है।

मध्यप्रदेश में 15-16 वर्ष आयुवर्ग में जहां 19.4 प्रतिशत लड़के स्कूल नहीं जाते हैं। वहीं इसी आयुवर्ग में स्कूल ना जाने वाली लड़कियों की संख्या 28 प्रतिशत है।

वजह

अक्सर स्कूल ना जाने की वजह के तौर पर स्कूल के दूर होने का हवाला दिया जाता है। हालांकि बिहार के नालंदा व महाराष्ट्र के सतारा जिले में किये गए सर्वे से पता चला की इसकी मुख्य वजह छात्रों व अभी हावकों की “अनिच्छा” है। खास कर तब जब बात लड़कियों के शिक्षा की आती है।

सर्व शिक्षा अभियान के तहत प्राथमिक विद्यालय करीब हर गांव में खुले हैं। पर धरातल पर उनकी हालत बेहद लचर है। सरकारी स्कूलों से पांचवी पास आधे से अधिक बच्चे अपनी भाषा में एक साधारण वाक्य नहीं पढ़ सकते हैं। क्या हमें चिंतित नहीं होना चाहिए!

भारतीय प्राथमिक शिक्षा प्रणाली बिखर चुकी है

बिहार, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश व राजस्थान में देश के 42 प्रतिशत बच्चे रहते हैं। पर इन राज्यों में किये गए अनुसार बच्चे यहां पांच साल बिताने के बाद भी कुछ नहीं सीख पाते हैं।

बिहार मे “शिक्षा मित्रों” वाली नीति के जरिये शिक्षा को संविदा पर अधिकतर अप्रशिक्षित व अयोग्य लोगों को दे दिया गया है। शिक्षकों पर निगरानी, स्कूलों की रिपोर्ट, बच्चों का प्रदर्शन आदि महत्वपूर्ण मुद्दों पर ना के बराबर ध्यान दिया जा रहा है।

स्कूलों से बच्चों की अनुपस्थिति को मिड-डे  मील तथा यूनिफॉर्म-साइकिल वितरण आदि के माध्यम से कम करने का प्रयास लम्बे समय से जारी है।

इस योजना से बच्चों को रजिस्टर पर व कुछ हद तक स्कूलों में भी लाने में सफलता मिली है।

हालांकि ऐसी योजनाएं बच्चों को लंबे समय तक स्कूल में बांध कर नहीं रख सकती हैं। बच्चा जबतक छोटा है तब तक उसे पैष्टिक खाने व यूनिफॉर्म से लुभाकर स्कूल तक लाया जा सकता है। उम्र बढ़ने के साथ जब बच्चों को ऐसे स्कूलों में ना शिक्षा मिलती है व ना ही कोई लुभावनी चीज़ तब वो स्कूल छोड़ जीवन-यापन के लिये कोई छोटा-मोटा काम शुरू कर देते हैं।

यही वजह है कि 14 से 18 वर्ष के आयुवर्ग में सबसे ज्यादा बच्चे स्कूल ड्रॉप आउट करते हैं।

समाधान

  • अन्य डूबते सरकारी विभागों की तरह शिक्षा के उद्धार के लिए इसके निजीकरण के बारे में सोंचा जा सकता है। एन.जी.ओ अथवा अनुभवी एजुकेशनल ट्रस्टों तथा सोसाइटियों को प्राथमिक विद्यालयों को गोद लेने का मौका दिया जा सकता है। ऐसे में इन विद्यालयों की कार्यक्षमता बढ़ेगी व इन विद्यालयों के लिए किसी की जवाबदेही तय होगी।
  • केद्रीय चयन आयोग के तर्ज पर शिक्षण चयन आयोग का गठन हो। शैक्षिक कार्यों के लिए आई.ए.एस की तरह आई.टी.एस यानि भारतीय शैक्षणिक सेवा का प्रारम्भ हो। राज्य भी ऐसे शैक्षिक अधिकारियों की नियुक्ति राज्य लोक सेवा आयोगों के माध्यम से करें।
  • वर्तमान में शिक्षा मित्रों व करार पर रखे गए शिक्षकों को कड़ी परीक्षा के आधार पर पूर्णतः नियुक्त करें।
  • एक शिक्षित समाज में कई समस्याएं व खर्च खुद कम हो जाते हैं। इसलिए सरकार दूरदर्षिता दिखाते हुए शिक्षा बजट में बढ़ोत्तरी करे।

शिक्षित व्यक्ति अगर पकौड़े भी बेचे तो काफी सफल होगा, इसलिए जरूरी है कि सामाजिक मुद्दों की सूची में शिक्षा को सबसे अधिक महत्व मिले।

वर्तमान रफ़्तार से 2060 तक पूर्ण साक्षरता प्राप्त करना बेहद सन्तुष्टि-कारक नहीं हैं अगले 40 सालों में कम से कम दो पीढियां और असाक्षरता के अंधेरे में गुम हो जाएंगी।

उन्हें बचाने के लिए सरकार के साथ हम सब की भी जिम्मेदारी बनती है कि बच्चों को उनकी जगह यानि स्कूल में बनाये रखने के लिए हरसम्भव प्रयास किया जाये।

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