सोमवार, अक्टूबर 14, 2019

श्रीलंका की मायूस जनता कर सकती है प्रदर्शन: रानिल विक्रमसिंघे

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कविता
कविता ने राजनीति विज्ञान में स्नातक और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। वर्तमान में कविता द इंडियन वायर के लिए विदेशी मुद्दों से सम्बंधित लेख लिखती हैं।

श्रीलंका में दो सियासी दलों के बीच के मचे राजनीति कोहराम में जनता का आक्रामक होना लाजिमी है और नुकसान भी जनता का ही होगा। श्रीलंका की प्रधानमन्त्री की कुर्सी से बेदखल किये गए रानिल विक्रमसिंघे ने चेतावनी दी है कि देश में जनता में आक्रोश उमड़ सकता है। उन्होंने कहा कि उम्मीद है कि आगामी दिनों में बहाल संसद संविधान के इन जख्मों को भर देगी।

प्रधानमंत्री पद से हटाए जाने के बावजूद रानिल विक्रमसिंघे पीएम हाउस को त्यागने के मूड में नहीं है। वहीँ रानिल विक्रमसिंघे के हजारों समर्थक उनके निवास के बाहर जमावड़ा लगाये हुए हैं। रानिल विक्रमसिंघे ने कहा कि मायूस जनता देश में कोहराम मचा सकती है। उन्होंने कहा कि हमने अपने समर्थकों को से कहा है, कि हिंसक गतिविधियों को अंजाम न दें। हालांकि इस मायूसी के माहौल में गुस्सा निकलना जायज है। उन्होंने कहा कि कुछ मायूस लोग उत्पात मचा सकते हैं।

हाल ही में श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना ने संसद को भंग कर, रानिल विक्रमसिंघे को प्रधानमंत्री पद से बर्खास्त कर दिया था। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को गोपनीय तरीके से प्रधानमंत्री की शपथ दिला दी थी।

रानिल विक्रमसिंघे ने कहा कि उम्मीद है कि यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से खत्म हो जायेगा और जल्द ही इस संकट का समाधान ढूंढ लिया जायेगा। उन्होंने कहा कि संसद को आखिरकार बहाल कर दिया गया है लेकिन कब तक बैठक नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि हमारी प्राथमिकता संसद को सर्वश्रेष्ठ बनाये रखना है।

श्रीलंका के दोनों दलों ने शुक्रवार को एक याचिका पर दस्तखत करके स्पीकर को सौंपा था। इस याचिका में 7 नवम्बर से 225 सदस्यों वाली संसद में बैठक की मांग की थी। आंकड़ों के मुताबिक रानिल विक्रमसिंघे के की पार्टी के पास बहुमत है और फ्लोर टेस्ट पास करने के लिए सिर्फ सात सीते कम है।

रानिल विक्रमसिंघे ने कहा कि बहुमत के आधार पर राष्ट्रपति को संसद को बहाल करना चाहिए। राजनीतिक दबाव के अलावा सामाजिक समूह भी राष्ट्रपति से संविधान के सम्मान की बात कह रहा है। राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना ने कहा कि विक्रमसिंघे के साथ निजी और सांस्कृतिक अंतरों के कारण कार्य करना अब मुमकिन नहीं है।

श्रीलंका के दोनों सियासी दलों के बीच घमासान पर अंतराष्ट्रीय समुदाय ने नज़रे गड़ाई हुई है। अमेरिका ने राष्ट्रपति सिरिसेना को संविधान के मुताबिक कार्य करने का मशवरा भी दिया है।

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