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    अविश्वास प्रस्ताव

    आने वाले लोक सभा चुनावो से पहले मोदी सरकार को सामना करना होगा एक पूर्व चुनाव से जो उसके लिए परेशानीयो का तोहफा लाया है। अविश्वास प्रस्ताव से तो एनडीए सरकार भली-भांति परिचित होगी।

    साल 2003 में हुए ऐसे ही एक अविश्वास प्रस्ताव के कारण ही अटल विहारी वाजपेयी कि सरकार गिर गई थी। इतिहास दोहराने के मकसद से ही विपक्ष ने एक बार फिर से सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी कर ली है। यह मोदी सरकार का पहला अविश्वास प्रस्ताव होगा जिसका उसे सामना करना है।

    संसद में टीडीपी ने अविश्वास प्रस्ताव पेश किया जिसको लोकसभा अध्यक्ष द्वारा मंज़ूर कर लिया गया। प्रस्ताव पर संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार ने कहा वह इस पर चर्चा के लिए तैयार हैं। बता दे कि टीडीपी ने ही इस प्रस्ताव कि नींव रखी। आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा ना दिलवाने के कारण टीडीपी भाजपा से अलग हो गई थी उसी के बाद से वह अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई। कांग्रेस समेत ज्यादातर विपक्षी दल एकजुट हैं, लेकिन मोदी सरकार इसको लेकर बिलकुल भयमुक्त है।

    एक बार संसद के गणित पर नज़र डाले तो 545 सदस्यों वाली लोकसभा में मौजूदा समय में 535 सांसद हैं। यानी बीजेपी को बहुमत हासिल करने के लिए महज 268 सांसद चाहिए। लोकसभा अध्यक्ष को हटाकर बीजेपी के पास अभी 273 सदस्य हैं। इसके अलावा बीजेपी के सहयोगी दलों में शिवसेना के 18, एलजेपी के 6, अकाली दल के 4, आरएलएसपी के 3, जेडीयू के 2, अपना दल के 2 अन्य के 6 सदस्य हैं।

    इस तरह से कुल संख्या 314 पहुंच रही है। ऐसे में बीजेपी को अविश्वास प्रस्ताव को गिराने और सरकार को बचाने में कोई दिक्कत नहीं होने वाली। इसके बावजूद विपक्ष मोदी सरकार को हराने का दम भर रहा है। भाजपा के कई नेताओं ने आज कल बागी रुख इख्तियार कर रखा है एवं उसकी सहयोगी दलों से भी अनबन चल रही है। इसी को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरने की रणनीति बनाई है।

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