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बिस्तर पर लैपटॉप खुला छोड़कर सो गया युवक, घर में लगी भीषण आग, मुश्किल से बची जान

राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद में युवक की छोटी सी गलती के कारण एक बड़ा हादसा होते-होते बच गया। घटना गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन स्थित रिवर हाइट्स आपर्टमेंट में घटित हुई। यहां रहने वाले एक युवक ने सोमवार रात काम करने के बाद हमेशा की तरह अपना लैपटॉप बेड पर रखा छोड़ दिया।

जिसके बाद सुबह नींद से जगने का बाद उसने देखा कि बिस्तार पर आग लगी हुई है। जान बचाने के लिए उन्हें बिल्डिंग के सातवें फ्लोर पर स्थित घर के बाथरूम की छोटी सी खिड़की से बाहर आना पड़ा।

पीड़ित की पहचान राहुल सिंह के रूप में हुई है। जो कि नोएडा स्थित एक मल्टीनेशनल नेटवर्किंग और दूरसंचार कंपनी के साथ इंजीनियर के रूप में काम करता है। उन्होंने बताया कि मंगलवार को वह कंपनी से अपनी शिफ्ट खत्म हो जाने के बाद जल्दी घर निकल आए थे और सोने से कुछ समय पहले तक लेपटॉप पर काम कर रहे थे।

राहुल ने बताया कि “मैंने अपने लैपटॉप को बेड पर स्लीप मोड में छोड़ दिया और दूसरे बेडरूम में सो गया। एक घंटे बाद, लगभग 8.30 बजे, मैं घुटन होने के बाद मेरी आंख खुली और मुझे उल्टी होने लगी। पूरे फ्लैट में घना काला धुआं था। गद्दे के जिस हिस्से में मैंने अपना लैपटॉप रखा था, उसमें आग लग गई थी। वहां कुछ भी नहीं दिख रहा था। फिर मैं सांस लेने के लिए बाथरूम में चला गया।

उन्होंने आगे बताया कि मेरी पत्नी तब तक काम पर निकल गई थी और फ्लैट के दरवाजे पर बाहर से ताला लगा था। धुआं इतना ज्यादा था कि मुख्य दरवाजे पर जाकर उसे खोलना मेरे लिए संभव नहीं था। मैंने बाथरूम की खिड़की खोली और लगभग 4-5 फीट की दूरी पर – विपरीत दिशा में एक बीम देखा। मैंने खिड़की से रेंगकर बीम पर छलांग लगाई और अलार्म बजाया। ”

उसकी चीख-पुकार सुनकर सोसाइटी के लोग घटनास्थल पर पहुंचे और दमकल विभाग को घटना के बारे में सूचित किया।

मुख्य अग्निशमन अधिकारी सुनील कुमार सिंह ने कहा, “यह एक डरावनी स्थिति थी। हमें उसके फ्लैट में घुसना पड़ा और सभी कमरे भीषण धुएँ से भरे हुए थे। हम आग को बुझाने में कामयाब रहे जो बिस्तर पर रखे लैपटॉप से ​​शुरू हुई थी। तब हमारे फायरमैन छत पर गए और राहुल को रस्सियों की सहायता से सुरक्षित किया।”

उन्होंने बताया कि “छोटी खिड़की से भागने में राहुल को खरोंचों का सामना करना पड़ा। उसके पास किसी भी कीमत पर फ्लैट से बाहर निकलने के आलावा कोई विकल्प नहीं था। वहां से निकलने का एकमात्र रास्ता खिड़की ही थी।

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