रोहिंग्या मुस्लिम : मानवता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच किसे चुनेगा भारत

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हिमांशु पांडेय
हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।

म्यांमार के अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों का मुद्दा पुनः विश्वपटल पर छाया हुआ है। हालिया समय में म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों पर अत्याचार हुए हैं और सेना बर्बरतापूर्वक उनका कत्लेआम कर रही है। हजारों की तादात में रोहिंग्या मुस्लिम मारे जा रहे हैं और लाखों रोहिंग्या मुस्लिम पलायन करने को मजबूर हो गए हैं। ऐसे में म्यांमार के निकटतम पड़ोसी देशों में अवैध घुसपैठ और रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर समस्याएं विकराल रूप लेती जा रही हैं। भारत म्यांमार के सबसे निकटतम पड़ोसी देशों में है और शरणार्थियों के मुद्दे पर यह देश अभी तक उदार रहा है। ऐसे में रोहिंग्या मुसलमानों का रुख भारत की तरफ हो रहा है। म्यांमार की सीमा के करीबी राज्यों असम, पश्चिम बंगाल के अलावा रोहिंग्या मुसलमान धीरे-धीरे अब देश भर में फैल गए हैं और उत्तर प्रदेश, बिहार, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में अवैध रूप से रह रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ब्रिक्स की सालाना बैठक से लौटते वक्त म्यांमार गए थे। इस दौरान उन्होंने म्यांमार की क्षेत्रीय अखण्डता बनाए रखने के लिए भारत की स्थायी प्रतिबद्धता की बात दोहराई। हाल ही में म्यांमार के रखिने राज्य में सेना द्वारा रोहिंग्या मुसलामानों का कत्लेआम किया गया जिसकी दुनिभर में निंदा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब विश्वपटल पर बड़े नेता बनकर उभरे हैं और ऐसे में इस मुद्दे पर उनका रवैया काफी महत्वपूर्ण होगा। सभी इसकी अपेक्षा कर रहे हैं कि उदार भारत रोहिंग्या मुसलामानों को अपनाएगा लेकिन सवाल यह है कि किस कीमत पर? भारत के पूर्वोत्तर के राज्य और पश्चिम बंगाल बंगलादेशी घुसपैठियों की समस्या से जूझ रहे हैं और आजादी के 70 सालों बाद भी कश्मीर की समस्या का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका है। ऐसे में भारत रोहिंग्या मुसलामानों को शरण देकर अपनी समस्याएं बढ़ाए इसका कोई औचित्य नजर नहीं आता है।

म्यांमार के निवासी पर नागरिकता नहीं

रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार के रखिने राज्य के निवासी हैं। बौद्ध धर्म के अनुयायी म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमान अल्पसंख्यक हैं। सम्पूर्ण विश्व में इनकी कुल जनसंख्या 15-20 लाख के करीब है। इनमें से तकरीबन 12 लाख रोहिंग्या मुसलमान आज भी म्यांमार में रहते हैं जबकि शेष शरणार्थी के रूप में समूचे विश्व में फैले हुए हैं। रोहिंग्या मुसलमान बतौर शरणार्थी भारत, पकिस्तान, बंगलादेश, नेपाल, थाईलैंड, इण्डोनेशिया, मलेशिया और अमेरिका में रहते हैं। कुछ रोहिंग्या मुसलमान सऊदी अरब में भी रहते हैं। भारत सरकार के पास उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अकेले भारत में 40,000 से अधिक रोहिंग्या मुसलमान अवैध तौर पर रह रहे हैं।

बर्मा नागरिकता कानून,1982 के तहत रोहिंग्या मुसलामानों को म्यांमार की नागरिकता प्राप्त नहीं है। रोहिंग्या मुसलमान 8वीं सदी से बर्मा के निवासी हैं फिर भी यहाँ का नागरिकता कानून उनके म्यांमार राष्ट्र के मूल निवासी होने की पुष्टि नहीं करता है। रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार में राष्ट्रीय आजादी आंदोलन, राजकीय शिक्षा और प्रशासनिक सेवा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में प्रतिबंधित है। रोहिंग्या मुसलामानों को वर्ष 1978, 1991-92, 2012, 2015, 2016-17 के दौरान म्यांमार में सैन्य कार्रवाई का सामना करना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के विशेष जांचकर्ताओं के अनुसार, “म्यांमार पूरी रोहिंग्या आबादी को देश से बाहर निकाल देना चाहता है।” संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी रिपोर्टों में बार-बार रोहिंग्या मुसलामानों के विरुद्ध म्यांमार सरकार के रवैये को अमानवीय करार देता रहा है लेकिन अब तक इस वजह से हालातों में कोई सुधार देखने को नहीं मिला है।

हिंसक रूप लेता जा रहा है अलगाववादी गुट का आन्दोलन

रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में पूरे विश्व से आवाज उठनी शुरू हो गई है। दिल्ली जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ने विश्व के सभी इस्लामिक देशों से इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ने को कहा था। उन्होंने सऊदी अरब के किंग सलमान बिन अब्दुल अजीज को पत्र लिखकर इस विषय पर मदद मांगी थी और दुनिया के सभी 57 इस्लामी देशों को आगे आने को कहा था। सऊदी अरब से ही 20 के करीब रोहिंग्या मुसलमानों के गुट ने म्यांमार सरकार और सेना के खिलाफ हथियारबंद आन्दोलन का आह्वान किया था और इसकी वजह से ही आज म्यांमार में हालात बेकाबू हो रहे हैं। इनकी ट्रेनिंग पाकिस्तान और अफगानिस्तान में हुई है और यह रोहिंग्या मुसलमानों की नई पीढ़ी को प्रशिक्षण दे रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय संकट समूह के अनुसार मक्का और मदीना में इस गुट की नींव पड़ी थी और इसका नाम हराका-अल-याकिन है।

इस गुट को पाकिस्तान, बंगलादेश और पश्चिम एशिया के विभिन्न समर्थक गुटों द्वारा वित्त पोषित किया गया है और यह गुट मुंबई के आजाद मैदान में अगस्त, 2012 में हुए दंगों के लिए उत्तरदायी था। रोहिंग्या मुसलमानों के इस अलगाववादी गुट ने इस्लामिक आतंकवाद के क्षेत्र में धीरे-धीरे नया आयाम हासिल किया है और सम्पूर्ण एशिया में यह अपनी जड़ें पसार रहा है। इस गुट का आधार भले ही रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों का विरोध करना हो पर अब यह इस्लामी आतंकवाद की तरफ विमुख होता जा रहा है। मुमकिन है शीघ्र ही यह प्रतिबंधित आतंकी संगठनों की सूची में अग्रणी स्थान हासिल कर ले। भारत में अभी भी रोहिंग्या मुसलमान बड़ी संख्या में अवैध रूप से रह रहे हैं और ऐसे में इनमे बढ़ावा देना देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हो सकता है।

द्वितीय विश्व युद्ध के वक्त हुई थी संघर्ष की शुरुआत

रोहिंग्या मुसलमानों के इस सशस्र संघर्ष की शुरुआत की कहानी द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लिखी गई थी। उस दौर में भारत पर अंग्रेजी हुकूमत का राज था। अंग्रेजों ने रोहिंग्याओं को हथियारबंद बना कर जापानी सेना पर हमले के लिए तैयार किया था जो उस वक्त तेजी से भारत की तरफ बढ़ रही थी। धीरे-धीरे रोहिंग्याओं का यह युद्ध स्थानीय बौद्ध निवासियों की तरफ केंद्रित हो गया और गृह युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई। ब्रिटिश राज से मुक्ति के बाद 1947-48 के दौर में रोहिंग्याओं का प्रतिरोध और बढ़ गया था और वे रखिने प्रान्त का पूर्वी पकिस्तान (अब बंगलादेश) में विलय चाहते थे। लेकिन बर्मा की सेना द्वारा की गई कार्रवाई के बाद उनका आन्दोलन कमजोर पड़ गया। इसके बाद से तकरीबन 7 लाख रोहिंग्या मुसलमान दक्षिण-पूर्वी बंगलादेश में अवैध रूप से रह रहे हैं।

अतिसंवेदनशील कश्मीर पर संवेदनहीन रुख अपना रही है सरकार

भारत में रोहिंग्या मुसलमानों ने बतौर शरणार्थी अपने निवास के लिए पहली प्राथमिकता लद्दाख को दी है। इसके बाद उन्होंने हैदराबाद, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश को चुना है। यहाँ गौर करने की बात यह है कि लद्दाख भारत के अतिसंवेदनशील राज्य जम्मू-कश्मीर के अंतर्गत आता है। जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद, आतंकवाद, पकिस्तान से अवैध घुसपैठ और निर्वासित कश्मीरी पंडितों की समस्याएं पहले से ही मौजूद हैं। इन सबके बाद लद्दाख में बड़ी तादात में रोहिंग्या मुसलामानों को बसाना समझ से परे है। हालाँकि इन्हें राज्य में शरणार्थियों का दर्जा प्राप्त है पर जम्मू-कश्मीर सरकार इन्हें निरंतर मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करा रही है।

आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. विकास शर्मा द्वारा दायर आरटीआई से यह खुलासा हुआ है कि वर्ष 2008 से 2017 तक जम्मू कश्मीर सरकार ने रोहिंग्या और बंगलादेशी शरणार्थियों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराकर 142.52 लाख रूपये का राजस्व वसूला है। इस दौरान 7,273 बंगलादेशी और रोहिंग्या मुस्लिमों को बिजली कनेक्शन दिए गए हैं। एक देश के भीतर ही रोहिंग्या मुस्लिमों को लेकर देश और प्रदेश की सरकारें दोहरा रवैया अपना रही हैं। जम्मू-कश्मीर में पिछले 3 साल से पीडीपी-भाजपा गठबंधन की सरकार है और इसके बावजूद यह हाल है। कई रोहिंग्या मुसलामानों ने स्थायी कनेक्शन के लिए आवेदन भी किया है और इसके लिए आधार कार्ड, राशन कार्ड जैसे जरुरी दस्तावेज भी दिए हैं। केंद्र सरकार के सख्त आदेश के बावजूद राज्य सरकार का यह ढ़ीला रवैया भविष्य में जम्मू-कश्मीर के हालातों को और बिगाड़ सकता है।

केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया अपना रुख

मोदी सरकार के गृह राज्य मंत्री किरण रिजूजू ने रोहिंग्या मुसलमानों पर भारत का रुख स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि भारत में अवैध रूप से रह रहे 40,000 रोहिंग्या मुसलमानों को निकाला जाएगा। म्यांमार की सरकार रोहिंग्या मुसलामानों को अपना नागरिक मानने से पहले ही इंकार कर चुकी थी। ऐसे में सबकी नजरें भारत की तरफ टिकी थी। भारत काफी समय शरणार्थियों और निर्वासितों की पनाहगाह बना हुआ था। देश अपनी उदारता के प्रदर्शन के फेर में अपने लोगों के लिए पहले से ही काफी मुश्किलें मोल चुका है और आतंरिक और राष्ट्रीय सुरक्षा की विभिन्न समस्याओं से त्रस्त है। ऐसे हालातों में केंद्र सरकार का यह निर्णय बिल्कुल सही प्रतीत होता है। मानवता की आड़ में इस्लामी आतंकवाद को बढ़ावा देना किसी भी दृष्टि से देश के लिए हितकर नहीं होता और सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम सराहनीय है।

मलेशिया ने खोले दरवाजे

रोहिंग्या मुसलमानों को बतौर शरणार्थी अस्थायी तौर पर रहने के लिए मलेशिया ने अपने दरवाजे खोल दिए हैं। मलाशिए सरकार ने रोहिंग्या मुसलामानों को कहा है कि वह यहाँ आकर अस्थायी तौर पर अपना जीवन-यापन कर सकते हैं। अन्य मुस्लिम देशों से भी इस सम्बन्ध में मदद करने की गुहार लगाई गई है। सऊदी अरब के किंग से दिल्ली के जामा मस्जिद के इमाम सैयद अहमद बुखारी ने पत्र लिखकर मदद मांगी है। उन्होंने कहा है कि सऊदी अरब के किसी दूर-दराज के क्षेत्र में रोहिंग्या आबादी को बसाया जाए और वहाँ कल-कारखाने स्थापित कर उन्हें जीवन-यापन का आधार दिया जाए। सऊदी अरब में जनसंख्या घनत्व बहुत ही कम है और सरकार किसी खाली क्षेत्र में पूरी रोहिंग्या आबादी को बसा सकती है।

करुणा और राष्ट्रीय सुरक्षा में चुनाव

रोहिंग्या मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों के मुद्दे पर भारत में भी उबाल है। गृह मंत्रालय के स्पष्ट बयान के बाद भी देश की विपक्षी पार्टियां यह चाहती हैं कि सरकार इस मुद्दे पर अपना रवैया स्पष्ट करे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के नेता हैं और इस मसले पर उनका रुख काफी मायने रखता है। म्यांमार में घटी हालिया घटनाओं के बाद यह बात स्पष्ट है कि रोहिंग्या मुसलमानों पर अत्याचार निःसंदेह रूप से मानवता की हत्या है। भारत में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या मुसलमानों को देश से बाहर निकाल कर भारत सरकार उनके प्रति दयाभाव नहीं दिखा रही है पर यह कहने में भी कोई गुरेज नहीं कि आज हमारी करुणा कल देश की सुरक्षा के लिए निश्चित तौर पर एक बड़ा खतरा बन सकती है।

 

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