राहुल गांधी की संविधान बचाओ रैली – 2019 का बिगुल

राहुल गांधी ने आज दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में संविधान बचाओ रैली की शुरुआत की।

कांग्रेस का आरोप है कि भारतीय जनता पार्टीराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देश के संविधान के साथ खिलवाड़ कर रही है। राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार ने संवैधानिक संस्थाओं के साथ छेड़-छाड़ की है।

उन्होंने कहा, “पार्टी भारत के लोगों की सुरक्षा के लिए, उनके भविष्य के लिये व उनके सपनों की सुरक्षा के लिए हमेशा प्रतिबद्ध है। भारतीय जनता पार्टी चाहै जितनी कोशिश कर ले, हम उन्हें संविधान को दूषित नहीं करने देंगे।

राहुल गांधी ने अपने संबोधन में तीखे हमले करते हुए कहा कि नरेन्द्र मोदी जी की पार्टी उन्हें संसद में बोलने नहीं देतीे है। अगर उन्हें संसद में सिर्फ पन्द्रह मिनट भी बोलने का मौका मिले तो वो सरकार की पोल खोल देंगे। उनके शब्दों में, “मैं राफेल और नीरव मोदी पर बोलूंगा और मोदी जी की बोलती बंद हो जायेगी।”

राहुल गांधी ने आगे कहा कि सरकार ने पहले योजना चलाई थी “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”। अब “बी.जे.पी से बेटी बचाओ” योजना की जरूरत है। भाजपा के सांसद, विधायक ही बेटियों के दुश्मन बने हुए हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि पिछले चार सालों में मोदी सरकार ने भारत की वैश्विक साख को बहुत नुकसान पहुंचाया है।

चुनावी खेल

इस रैली के साथ कांग्रेस ने 2019 के चुनावों के लिए फाड़ा कस लिया है। राहुल गांधी ने इस रैली में अपना और कांग्रेस पार्टी के पूरे दम-खम का प्रदर्शन किया। क्या संभव है कि इसी संविधान बचाओ रैली के पार्श्व  निर्माण के लिए मुख्य न्यायधीश के खिलाफ महाभियोग लाया गया था? ये जानते हुए भी कि यह कभी संसद से पास नहीं हो पायेगा।

क्या कांग्रेस के 2019 चुनाव का मुद्दा संविधान होगा?

भारत जैसे लोक्तन्त्र में संविधान की सुरक्षा के मुद्दे पर सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ना देश के लिए जोखिम भरा है। पर कांग्रेस ऐसा कर रही है। उनका कहना है कि मोदी सरकार ने देश के सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाया है। दलितों व पिछड़ों को दबाया जा रहा है। उनकी सुरक्षा के लिए जरूरी है कि संविधान की सुरक्षा हो।

दलितों व पिछड़ों के शोषण की खबरें आती रहती हैं। पर क्या समस्या इतनी गम्भीर है कि संविधान खतरे में पड़ गया है? क्या विपक्ष एक अघोषित आपातकाल को दृश्य करने की जुगत में लगा हुआ है?

जब अर्थव्यवस्था पटरी पर है व देश की सुरक्षा अथवा सम्प्रभुता पर कोई शक- सन्देह ना हो तब ऐसा करना राष्ट्र की स्थिरता के लिए अत्यंत हानिकारक है।

विचारों में गिरावट

आज शाम ही राहुल गांधी की सहयोगी व पूर्व लोकसभा सदस्य दिव्य स्पंदना ने मुख्य न्यायधीश के खिलाफ बेहद भद्दा बयान दिया। चुनावी उठापटक में जिम्मेदार राजनीति की हत्या यहां अवश्य हो रही है।

भारतीय जनता पार्टी की सरकार कैसा काम कर रही है, इसका आकलन पत्रकार नहीं कर सकते पर यह बात किसी से छुपी नहीं है कि जनता के मन में, खास कर्मध्यम वर्ग जो कि “संविधान बचाओ, दीन बचाओ, आरक्षण बचाओ अथवा हटाओ” जैसी रैलियों में अपने रोजी-रोटी के व्यस्त कार्यक्रम के कारण नहीं जा पाता है, उनके मन में एक प्रकार का अस्पष्ट असन्तोष है।

जनता ने विमुद्रीकरण अथवा जीएसटी लागू होने के समय वो सब किया जो सरकार ने कहा। उन्होंने वो सब सरकार व समाज को दिया जो उनसे मांग गया तो लाज़मी है कि वो अब अपने आप को ग्रहण करने वालर छोर पर महसूस करेंगे। पर उन्हें कुछ ठोस अब तक मिला नहीं जिसकी उन्हें उम्मीद थी।

2014 हो या 2018 योजनाओं व उम्मीदों के बीच मध्यम वर्ग जो कि ग्रामीण क्षेत्रों में आकर किसान वर्ग में तब्दील हो जाता है, उसकी जिंदगी के पुराने ढर्रे में कोई खास बदलाव हुआ नहीं हैं।

निजीचैनलों पर विदेशी कम्पनियों के आने की खबर सुन कर अथवा बुलेट ट्रेन की रफ़्तार के चर्चे सुन व खुश हो जाता है पर फिर दिल में एक असन्तोष रह जाता है कि उसे इनका सीधा फायदा ना मिले।

संविधान बचाओ रैली इसी असन्तोष को विस्तृत रूप देने के लिए केंद्रित है। ऊना जैसी घटनाओं ने समाज को बांटने का काम किया है। और सरकार ने इन घटनाओं को गम्भीरता से नहीं लिया। जैसा विरोध सरकार की तरफ से आना चाहिए था वैसा विरोध कहीं देखने को ना मिला। ये घटनाएं समुदाय के क्रम से लोगों में असन्तोष बढ़ाती जाती हैं

2019 के लिए अभी तो बिगुल ही बचा है, संग्राम पूरा का पूरा बाकी है। बाकी उससे पहले कर्नाटक, मध्य प्रदेश आदि राज्यों की जनता को यह फैसला करना है कि वो “संविधान बचाओ” को सच मानते हैं या “ब्रांड इंडिया” को।

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