मंगलवार, अप्रैल 7, 2020

मंझधार में फँसी नैया : मोदी-नीतीश के खिलाफ कैसे होगा शरद यादव का बेड़ा पार?

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हिमांशु पांडेय
हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।

राष्ट्रपति चुनावों के पहले तक देश में राजनीतिक स्थिरता का माहौल था। केंद्र की सत्ताधारी भाजपा सरकार के खिलाफ पूरा विपक्ष एकजुट था और महागठबंधन के अगुआ और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 2019 में नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष के चेहरे के तौर पर देखे जा रहे थे। हालांकि नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कई मुद्दों पर नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी की तारीफ कर चुके थे पर उन्हें नरेंद्र मोदी का धुर विरोधी माना जाता था। बिहार में महागठबंधन की सरकार थी और जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस का गठबंधन था। इस महागठबंधन ने बिहार में ‘मोदी लहर’ को थाम लिया था और तभी से विपक्ष नीतीश कुमार को मोदी के विकल्प के तौर पर देखने लगी थी। तभी भाजपा ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया और उनके समर्थन को लेकर महागठबंधन में फूट पड़ गई। नीतीश कुमार रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी के पक्षधर थे और आरजेडी-कांग्रेस किसी भी सूरत में एनडीए उम्मीदवार का समर्थन नहीं करना चाहती थी। बिहार की बेटी मीरा कुमार की उम्मीदवारी भी नीतीश कुमार को नहीं डिगा सकी और महागठबंधन में दरार बढ़ती गई। इस अलगाव की आग में घी डालने का काम किया आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के ठिकानों पर पड़े सीबीआई छापों ने। नीतीश कुमार ने अपनी ‘सुशासन बाबू’ की छवि को बरकरार रखने के लिए महागठबंधन से अलग होकर भाजपा के समर्थन से सरकार बना ली। इस तरह विपक्ष का सबसे मजबूत और लोकप्रिय चेहरा भाजपा के साथ जा खड़ा हुआ और उसकी 2019 में ‘मोदी लहर’ को रोकने की संभावनाएं भी धूमिल हो गई।

नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी

 

बिहार में महागठबंधन के टूटने से आया सियासी भूचाल अभी तक थमा नहीं है। रोज इसमें कोई ना कोई नया अध्याय जुड़ रहा है। नीतीश कुमार के महागठबंधन से किनारा कर भाजपा के साथ जाने और पुनः सरकार बनाने के बाद से ही उनके खिलाफ बयानबाजी शुरू हो गई थी। महागठबंधन में उनके साझीदार रहे राहुल गाँधी और लालू यादव ने नीतीश कुमार को निशाने पर लेकर हमला बोला था वहीं उनके इस फैसले के खिलाफ उनकी ही पार्टी में बगावत के सुर उठने लगे थे। डेढ़ दशक से नीतीश कुमार के साथी रहे पूर्व जेडीयू अध्यक्ष और दिग्गज पार्टी नेता शरद यादव भी खुलकर नीतीश कुमार के इस फैसले के खिलाफ आ गए। उन्होंने इसे ‘गलत’ करार देते हुए बिहार की जनता के साथ धोखा बताया। उनके विरोध के चलते नीतीश कुमार का बिहार विधानसभा में विश्वासमत प्रस्ताव आधार में लटकता दिखाई दे रहा था। काफी मान-मनौव्वल के बाद शरद यादव ने नाराज विधायकों को नीतीश के पक्ष में मतदान करने को कहा और नीतीश अपना बहुमत साबित करने में सफल रहे।

हालांकि नीतीश कुमार से शरद यादव की नाराजगी कम नहीं हुई और दोनों पक्षों से आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी रहा। शरद यादव पहले से ही जेडीयू में हाशिए पर थे और वह अब खुलकर नीतीश कुमार के खिलाफ बोल रहे थे। इससे नाराज होकर नीतीश कुमार ने एक-एक कर जेडीयू से शरद यादव के साथियों और अपने विरोधियों को किनारे करना शुरू किया। शुरुआत उन्होंने पार्टी महासचिव अरुण श्रीवास्तव की बर्खास्तगी से की और उनपर पार्टी व्हिप का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। जेडीयू ने अरुण श्रीवास्तव को यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि वह गुजरात में पार्टी के एक मात्र विधायक छोटुभाई वासवा को भाजपा उम्मीदवार बलवंत सिंह राजपूत के पक्ष में मतदान करने को कहे। जेडीयू विधायक का वोट कांग्रेस उम्मीदवार अहमद पटेल को गया था और यही वोट उनकी जीत का आधार बना था।

नीतीश कुमार और शरद यादव

 

नीतीश कुमार की अगली गाज पार्टी के राज्यसभा सांसद और शरद यादव के वरिष्ठ सहयोगी अली अनवर पर गिरी। अली अनवर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी द्वारा बुलाई गई विपक्ष के नेताओं की बैठक में शामिल हुए थे। जेडीयू ने उनपर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया और संसदीय दल से बर्खास्त कर दिया। नीतीश कुमार के भाजपा के साथ जाने पर अली अनवर ने कहा था कि उनकी अंतरात्मा उन्हें भाजपा के साथ जाने की गवाही नहीं देती। पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी पर जेडीयू को तोड़ने का भी आरोप लगाया था। अगला हमला शरद यादव पर हुआ और पार्टी ने उन्हें राज्यसभा नेता के पद से हटाकर उनकी जगह आरसीपी सिंह को राज्यसभा में अपना नेता नियुक्त किया। इसी क्रम में आगे पार्टी ने शरद यादव की बिहार यात्रा के दौरान उनका समर्थन करने वाले 21 पार्टी नेताओं को बर्खास्त कर दिया। इन नेताओं में पूर्व सांसद अर्जुन राय और पूर्व मंत्री रमई राम के नाम शामिल थे। नीतीश कुमार ने दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मुलाक़ात की। अमित शाह ने उन्हें एनडीए में शामिल होने का न्यौता भी दिया।

नीतीश कुमार और अमित शाह

 

बता दें कि शरद यादव 10 से 12 अगस्त तक बिहार के तीन दिवसीय दौरे पर थे। इस दौरान उन्होंने 7 जिलों की यात्रा की और जनता के बीच जाकर बात की। विभिन्न मुद्दों पर उन्होंने जनता का मन टटोलने की भी कोशिश की। उन्होंने लोगों से कहा कि नीतीश कुमार के साथ वो लोग खड़े हैं जो अपना स्वार्थ साधने में लगे हैं। नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जनता दल यूनाइटेड सरकारी है। अपने गुट के बारे में उन्होंने कहा कि मेरे साथ वो लोग खड़े हैं जो जनता से जुड़े हैं और जनता की सेवा को लेकर फिक्रमंद है। मेरी जनता दल यूनाइटेड जनता की है और जनता के लिए है। माना जा रहा है कि शरद यादव नीतीश कुमार से अलग होकर अपने समर्थकों के साथ नई पार्टी का निर्माण करेंगे और लालू प्रसाद यादव की आरजेडी और कांग्रेस के साथ गठबंधन करेंगे। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने स्पष्ट कहा है कि शरद यादव के नेतृत्व वाली जेडीयू के साथ उनका गठबंधन जारी रहेगा। शरद यादव ने दिल्ली में अपने आवास पर गुरुवार, 17 अगस्त को समान विचार वाले नेताओं की बैठक बुलाई है। इस बैठक में विपक्ष के 16 दलों के अलावा देश के शीर्ष दलित और अल्पसंख्यक नेताओं के शामिल होने की भी उम्मीद है। माना जा रहा है कि इस बैठक में विपक्ष मोदी सरकार के खिलाफ एकजुट हो सकता है और यह 2019 लोकसभा चुनावों के लिए केंद्रीय महागठबंधन की शुरुआत हो सकती है।

शरद यादव अपनी राजनीतिक पारी को आगे बढ़ाने और अपनी भूमिका को धार देने के लिए कई रास्ते अपना सकते हैं। शरद यादव के पास राजनीति और गठबंधन का लम्बा अनुभव है और मौकों को भुनाना उन्हें अच्छी तरह आता है। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि शरद यादव अपने लम्बे राजनीतिक जीवन के अनुभव का इस्तेमाल कर नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार के खिलाफ सही दांव चलेंगे। वर्तमान समय में देश एक मजबूत विपक्ष की कमी से जूझ रहा है और ऐसे में विपक्ष को मजबूती से एक सूत्र में पिरोने में शरद यादव अहम् कड़ी साबित हो सकते हैं। शरद यादव का राजनीतिक जीवन में प्रवेश जेपी आंदोलन के वक्त हुआ था। उस वक्त देश में कांग्रेस का बोलबाला था और लमसम आज भी वही हालात है, बस दल का नाम बदल कर भाजपा हो गया है। ऐसे में शरद यादव के सामने निम्न विकल्प बचते हैं-

जय प्रकाश नारायण सरकार विरोधी मॉडल

शरद यादव ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत जय प्रकाश नारायण के आंदोलन से की थी। बिहार छात्र संघर्ष समिति का यह आंदोलन बिहार में सत्ताधारी कांग्रेस सरकार के खिलाफ था। देश में उस वक्त कांग्रेस का बोलबाला था और केंद्र में इंदिरा गाँधी की सरकार थी। इस आंदोलन में लालू प्रसाद यादव छात्र संघर्ष समिति के अध्यक्ष नियुक्त किये गए और शरद यादव, सुशील कुमार मोदी, बसिष्ठ नारायण सिंह, नरेंद्र सिंह और राम विलास पासवान ने इसमें महती भूमिका निभाई थी। शरद यादव ने अपना पहला चुनाव 1974 में हलधर किसान के चुनाव चिन्ह पर जीता था। वह आपातकाल के दौरान जेल भी गए थे। मुमकिन है शरद यादव अपनी बिहार यात्रा के बाद नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोल दें और इसे एक आंदोलन की शक्ल देकर नई सियासी राहें तलाश कर लें।

विश्वनाथ प्रताप सिंह का ओबीसी मॉडल

देश की जातिगत राजनीति में सबसे बड़ा भूचाल तब आया था जब 90 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को मानते हुए ओबीसी आरक्षण को स्वीकृति दी थी। इस दौर को शरद यादव ने बहुत ही करीब से देखा है और वह इसके दूरगामी परिणामों से भी वाक़िफ़ हैं। देश के मतदाताओं में इस वर्ग का बड़ा जनाधार है। शरद यादव भी इसी वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं और मुमकिन है शरद यादव ओबीसी कार्ड खेलकर एक ही तीर से नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार दोनों पर निशाना साध लें।

कांशीराम का दलित मॉडल

जय प्रकाश नारायण के आंदोलन के बाद 80 और 90 का दशक बदलावों का दशक रहा। पहली बार सत्ताधारी दल कांग्रेस को विपक्ष का एहसास हुआ और देश में जातिगत राजनीति की शुरुआत हुई। इसकी नींव डाली कांशीराम ने जिन्होंने इंदिरा गाँधी की सरकार के जमाने में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग के नेतृत्व पर आधारित बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। यह पार्टी जल्द ही देश की प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों में शुमार हो गई और इसने उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश के दलित वोटबैंक को अपना आधार बना लिया। मायावती के नेतृत्व में बसपा 3 बार उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुई और आज भी दलित राजनीति करने वाली देश की प्रमुख पार्टी है। बिहार की राजनीति में आज भी जाति मूल मुद्दा रहती है और शरद यादव यह मॉडल अपना कर क्षेत्र विशेष में अपना अपना प्रभाव छोड़ सकते हैं। अगर शरद यादव देश के राजनीतिक पटल पर अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हैं तो उन्हें इसके साथ अन्य विकल्पों को भी तलाशना होगा।

राष्ट्रीय समन्वय मॉडल

चौथा और सबसे प्रभावी विकल्प जिसे शरद यादव यादव चुनना चाहेंगे वह है राष्ट्रीय समन्वय मॉडल। इस समय देश के सभी विपक्षी दलों का एक ही उद्देश्य है और वह है भाजपा को रोकना। ऐसे में शरद यादव का यह दांव फिट बैठ सकता है। राष्ट्रीय समन्वय मॉडल का आधार है कि इसमें एक सम्मिलित दल रहे जिसमें सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व हो। इस मसले पर सभी दलों की नब्ज टटोलने के लिए शरद यादव ने गुरूवार, 17 अगस्त को अपने आवास पर सामान विचार वाले दलों की बैठक बुलाई है। इस बैठक सभी विपक्षी पार्टियों समेत देश के शीर्ष दलित और अल्पसंख्यक नेताओं के शामिल होने की भी सम्भावना जताई जा रही है। माना जा रहा है कि इस बैठक में नीतीश कुमार के भाजपा के साथ जाने के बाद धूमिल पड़ी केंद्रीय महागठबंधन की आशाओं को फिर से संजीवनी मिल सकती है। शरद यादव इस केंद्रीय महागठबंधन के सूत्रधार बन सकते हैं और इसमें संयोजक की भूमिका निभा सकते हैं।

 

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