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    दलित भारत बंद

    सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ने पूरे देश का माहौल बदल दिया है।

    उत्तर भारत का लगभग हर राज्य आज जल रहा है। कल अलग-अलग शहरों में हुई झड़पों में 11 लोगों की मौत हो गयी थी।

    बिहार में चक्का जाम के दौरान एक छोटे बच्चे कोे एम्बुलेन्स में ही आखिरी सांस लेनी पड़ी।

    मध्य प्रदेश के ग्वालियर में प्रदर्शनों के दौरान कुछ लोग ना सिर्फ जानलेवा हथियारों के साथ देखे गए बल्कि उनका इस्तेमाल करते दिखे। पूरे देश में जाने कितनी बसें, गाड़ियां और दुकानें जलाई गयीं।

    सामाजिक आकलन

    संबन्धित खबरें बहुत हैं पर सवाल एक है। क्या इसे रोका जा सकता था? क्या दलितों के गुस्से को इस तरह फैलने से रोका जा सकता था?

    सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर कर के अपनी तरफ से खानापूर्ति कर दी है। विपक्ष भी विरोध कर के दलित विकास का सारा श्रेय एक दिन में अपनी झोली में कर लेना चाहते हैं।

    दलित दंगे

    पर इससे वो विनाश कैसे रुकेगा जो भारतीय समाज की स्थिरता में हुआ है? बड़ी जातिगत झड़पें या विरोध प्रदर्शन मण्डल कमीशन के बाद से नहीं हुई थीं।

    दलित समूहों का इतने बड़े स्तर पर प्रदर्शन तो लगभग कभी नहीं हुआ।

    नई शुरुआत?

    राजनीति में दलितों को वोटबैंक के रूप में शुरू से देखा जाता रहा है। कुछ दलित पार्टियां भी हैं, हाल में दलित नेताओं की नई फौज भी उत्पन्न हुई है।

    पर जिस तरह के नेता की आवश्यक सदियों से पिछड़े एक समाज को उभारने के लिए पड़ती है, वैसा ईमानदार उद्देश्य वाला नेता बाबा साहब के बाद नहीं मिला है।  

    पर इस आंदोलन में बिना किसी नेता के जिस तरह हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आये उससे एक तरफ इस आंदोलन के प्रति एक शक पैदा होता है।

    कहीं इन्हें कैम्ब्रिज एनालिटिका जैसी किसी कम्पनी के इशारे पर तो देश को तोड़ने के लिए तथा राजनैतिक फायदे के लिए तो इन्हें नहीं भड़काया जा रहा है?

    पर एक तरफ आशा की किरण भी दिखती है कि दलित समाज में सवर्णों के खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत दिखायी दी। पुलिस स्टेशन जलाना, गाड़ियां जलाना, तोड़-फोड़ करना सही नहीं है।

    पर दलित समाज के द्वारा ऐसा करना अपने आप में काफी बड़ा है क्योंकि उनकी हर आवाज सदियों से दबाई गयी है।

    आज उस आवाज को शासन के शीर्ष पर बैठा व्यक्ति भी सुनने की कोशिश कर रहा है।

    कहने को तो हमारे राष्ट्रपति भी दलित हैं, पर उनके होने ना होने से दलितों को बहुत फर्क नहीं पड़ता। ठीक उसी तरह जैसे मायावती के हजारों करोड़ के पार्क से एक गरीब दलित के जीवन में कोई बदलाव नहीं आया है।

    दलितों के इस आंदोलन को भारतीय सदी की क्रांति कहें या महज राजनैतिक स्टंट, इसका फैसला अभी करना जल्दबाजी होगा।

    हालांकि दोनों ही सूरत में राजनीति की दशा जरूर बदलेगी। सम्भावना है कि देश को इसका प्रथम दलित प्रधान मंत्री भी जल्दी ही मिले।

    अन्य सबक

    इस आंदोलन से स्वर्ण जातियों के उन लोगों को एक सबक मिला है जो हर सांस में आरक्षण और बाबा साहब के खिलाफ जहर उगलते हैं।

    हर किसी की समझ में यह बात आ गयी है कि सिर्फ एस.सी/ एस.टी एक्ट के हटाये जाने से इतना बवाल मचा है तो आरक्षण को हटाने के बारे में सोचना कितना कठिन होगा?

    सुप्रीम कोर्ट का रुख

    इस मामले में अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट का है। हालांकि कोर्ट का फैसला पूर्णतः गलत नहीं है। इस कानून का गलत इस्तेमाल तो होता ही है।

    स्थानीय स्तर पर इसका राजनैतिक इस्तेमाल भी कम नहीं हुआ है। दफ्तरों में दलित या आदिवासी कर्मचारी व्यक्तिगत मनमुटाव दूर करने के लिए भी इस एक्ट का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं।

    जमीनी हकीकत

    हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में सवर्ण दबंगों से जैसी सुरक्षा यह कानून पहले करता था वैसी सुरक्षा इस फैसले के बाद नहीं कर पायेगा।

    ध्यान से देखें तो पता चलता है कि पहले जहां यह कानून गरीब दलितों को कानून के पचड़े में सालों पड़े बिना त्वरित न्याय दिलवाता था, तथा आरोपी को गिरफ्तार करवा कर उन्हें पीड़ित को आगे की प्रताड़ना व केस वापस लेने के दबाव से भी बचाता था।

    अधिकतर दलित अभी भी गरीबी रेखा के नीचे जी रहे हैं क्या वह लम्बे केस लड़ने की क्षमता रखते हैं, या क्या जब तक केस चलते हैं तब तक उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी पुलिस दे पाती है?

    कानून का गलत इस्तेमाल करने की बात सही है, पर ऐसा कोई फैसला लेने से पहले माननीय न्यायधीशों को इन पहलुओं पर भी विचार करना चाहिए।

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