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भारत को नवंबर से शुरू होगी S-400 मिसाइल सिस्टम की डिलिवरी

भारत में रूस के राजदूत निकोलाई कुदाशेव ने बुधवार को पुष्टि की कि भारत और रूस एस -400 मिसाइल प्रणाली के लिए अपना अनुबंध पूरा करने के लिए “प्रतिबद्ध” हैं। रुसी राजदूत के अनुसार भारत में इस प्रणाली की डिलीवरी साल के अंत तक हो जायेगी। उन्होंने कहा कि दोनों देशों ने इस मुद्दे पर अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध किया।

क्या है एस-400 ट्रायम्फ मिसाइल प्रणाली

एस-400 ट्रायम्फ रूस द्वारा डिज़ाइन की गई एक गतिशील (मोबाइल) और सतह से हवा में मार करने वाली  मिसाइल प्रणाली है। यह विश्व में लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने में सक्षम परिचालन के लिये तैनात सबसे खतरनाक आधुनिक मिसाइल प्रणाली है, जिसे अमेरिका द्वारा विकसित ‘टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस सिस्टम’ से भी बेहतर माना जाता है।

यह प्रणाली 30 किमी. तक की ऊँचाई पर 400 किमी. की सीमा के भीतर विमान, मानव रहित हवाई वाहन और बैलिस्टिक तथा क्रूज मिसाइलों सहित सभी प्रकार के हवाई लक्ष्यों को भेद सकती है। यह प्रणाली एक साथ 100 हवाई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकती है और उनमें से छह को एक साथ लक्षित कर सकती है।

सतह से हवा में प्रहार करने में सक्षम S-400 को रूस ने सीरिया में तैनात किया है। S-400 मिसाइल प्रणाली S-300 का उन्नत संस्करण है, जो इसके 400 किमी. की रेंज में आने वाली मिसाइलों एवं पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों को नष्ट कर सकता है। इसमें अमेरिका के सबसे उन्नत फाइटर जेट F-35 को भी गिराने की क्षमता है।

इस प्रणाली में एक साथ तीन मिसाइलें दागी जा सकती हैं और इसके प्रत्येक चरण में 72 मिसाइलें शामिल हैं, जो 36 लक्ष्यों पर सटीकता से मार करने में सक्षम हैं। इस रक्षा प्रणाली से विमानों सहित क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइलों तथा ज़मीनी लक्ष्यों को भी निशाना बनाया जा सकता है।

भारत के लिए महत्त्व

चीन भी इस प्रणाली को खरीद रहा है, चीन ने इस प्रणाली की छह यूनिट की खरीद के लिये वर्ष 2015 में रूस के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किये थे, इसकी डिलीवरी जनवरी 2018 में शुरू हुई थी। चीन द्वारा एस-400 प्रणाली का अधिग्रहण किया जाना इस क्षेत्र में एक ‘गेम-चेंजर’ के रूप में देखा जा रहा है। हालाँकि भारत के खिलाफ इसकी प्रभावशीलता बहुत ही सीमित है। भारत के लिये F-35 जैसे उन्नत कोटि के लड़ाकू विमानों का मुकाबला करने सहित दो मोर्चों (चीन और पाकिस्तान के संदर्भ में) पर युद्ध की चुनौतियों से निपटने हेतु इस प्रणाली को प्राप्त करना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है।

काउंटरिंग अमेरिका एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट (काट्सा)

रूसी अधिकारियों ने काट्सा के तहत भारत पर प्रतिबंध लगाने की संभावनाओं को भी खारिज किया है। उन्होंने कहा कि यह डील राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया गया है। जो बाइडन सरकार में रक्षा मंत्री बने लॉयड ऑस्टिन ने भी अपने पहले भारत दौरे के समय कहा था कि हमारे दोस्तों को रूस से हथियारों की खरीद से बचना चाहिए।

यह अधिनियम प्राथमिक रूप से रूसी हितों, जैसे कि तेल और गैस उद्योग, रक्षा एवं सुरक्षा क्षेत्र तथा वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंधों से संबंधित है। यह अधिनियम अमेरिकी राष्ट्रपति को रूसी रक्षा और खुफिया क्षेत्रों (महत्त्वपूर्ण लेन-देन) से जुड़े व्यक्तियों पर अधिनियम में उल्लिखित 12 सूचीबद्ध प्रतिबंधों में से कम से कम पाँच लागू करने का अधिकार देता है।

इन दो प्रतिबंधों में से एक निर्यात लाइसेंस प्रतिबंध है जिसके द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति को युद्ध, दोहरे उपयोग और परमाणु संबंधी वस्तुओं के मामले के निर्यात लाइसेंस निलंबित करने के लिए अधिकृत किया गया है। यह स्वीकृत व्यक्ति के इक्विटी या ऋण में अमेरिकी निवेश पर प्रतिबंध लगाता है।

इसकी विशेषताएँ अमेरिका के थाड मिसाइल डिफेंस सिस्टम जैसी होंगी और इसे अंतर-महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल के अलावा हाइपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों और वायु रक्षा के लिये विमानों को अवरुद्ध तथा नष्ट करने के लिये डिज़ाइन किया गया है। माना जा रहा है कि यह रूसी मिसाइल रक्षा प्रणाली बेहद शक्तिशाली और मारक होगी तथा अमेरिका के अदृश्य लड़ाकू विमान एफ-22 और एफ-35 भी इसके सामने नाकाम सिद्ध होंगे। हालिया वर्षों में अमेरिका और भारत के सैन्य संबंधों में आए सुधार के मद्देनज़र अब अमेरिका के उस कानून के प्रावधानों से बचने के तरीके तलाशने की ज़रूरत है, जिसके तहत रूस के रक्षा अथवा खुफिया प्रतिष्ठानों से लेन-देन करने वाले देशों और कंपनियों को दंडित करने की बात कही गई है।

भारत-रूस सहयोग की वर्त्तमान स्तिथि

शीत युद्ध के बाद के समय में भारत और रूस के आर्थिक संबंधों में गिरावट देखने को मिली और हाल के वर्षों में अमेरिका, भारत के लिये शीर्ष हथियार आपूर्तिकर्त्ता के रूप में उभरा जिसने रूस को हथियार आपूर्तिकर्त्ता के रूप में दूसरे स्थान (2011-13 के आँकड़ों के आधार पर) पर धकेल दिया।

वर्ष 2013-14 में रक्षा खरीद में आई गिरावट में सुधार कर लिया गया है और काट्सा के तहत प्रतिबंधों के भय के बावजूद ‘एस-400 हवाई रक्षा मिसाइल प्रणाली’ जैसे महत्त्वपूर्ण सौदे की शुरुआत की गई।  हाल के वर्षों में भारत द्वारा इज़राइल, अमेरिका और फ्राँस के साथ अनुबंधों के माध्यम से अपनी रक्षा आपूर्ति को विकेंद्रीकृत करने का प्रयास किया जा रहा है, परंतु रूस अभी भी एक प्रमुख आपूर्तिकर्त्ता बना हुआ है। इसे दोनों देशों के बीच हुए हालिया घटनाक्रमों के आधार पर समझा जा सकता है।

भारत ने रूस से 2.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर की लागत वाले मिग 29 और सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमानों के अधिग्रहण के प्रस्तावों को मंज़ूरी दी है। दोनों पक्ष सफलतापूर्वक एके-203 राइफल और 200 केए-226टी यूटिलिटी हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति से जुड़े अनुबंध के कार्यान्वयन की ओर बढ़ रहे हैं। स्टिम्सन सेंटर द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, वर्तमान में भारतीय सैन्य सेवा में 86% उपकरण, हथियार और प्लेटफॉर्म रूसी मूल के हैं।

About the author

आदित्य सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास का छात्र। खासतौर पर इतिहास, साहित्य और राजनीति में रुचि।

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