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भारत और यूरोपीय संघ ने आठ वर्ष के बाद एफटीए पर बातचीत शुरू करने का लिया फैसला: जानें क्या होंगे परिणाम

भारत और यूरोपीय संघ ने पिछले शनिवार को आठ वर्ष के अंतराल के बाद मुक्त कारोबार समझौता (एफटीए) पर बातचीत शुरू करने की घोषणा की। साथ ही निवेश सुरक्षा तथा भौगोलिक संकेत के विषय पर दो महत्वपूर्ण समझौते पर वार्ता शुरू करने पर भी सहमति जतायी। इस संबंध में निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और 27 सदस्यीय यूरोपीय संघ समूह के शासनाध्यक्षों या राष्ट्राध्यक्षों के बीच डिजिटल माध्यम से हुई शिखर बैठक में लिया गया। इस बैठक में कारोबार, सम्पर्क और निवेश के क्षेत्र सहित सम्पूर्ण सहयोग बढ़ाने को लेकर विस्तृत चर्चा हुई।

अधिकारियों ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में यूरोपीय संघ को भारत एवं दक्षिण अफ्रीका के उस प्रस्ताव का समर्थन करने का आग्रह किया जिसमें कोविड-19 रोधी टीके पर पेटेंट में छूट देने की बात कही गई है ताकि टीके तक पूरी दुनिया की समान रूप से पहुंच सुनिश्चित हो सके। हालांकि, इस विषय पर यूरोपीय संघ की ओर से कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका। भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन पर विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) विकास स्वरूप ने संवाददाताओं से कहा,‘‘ यह एक महत्वपूर्ण क्षण है, बैठक ने संबंधों को नयी गति दी है।’’ कोरोना वायरस रोधी टीके पर पेटेंट में छूट पर स्वरूप ने कहा कि इस पर यूरोपीय संघ का विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में समर्थन टीके के उत्पादन को गति देगा।

इसके अलावा वर्ष 2018 में यूरोपीय संघ ने भारत के साथ सहयोग के लिये एक नई रणनीति जारी की जिसे बहुध्रुवीय एशिया में एक भू-राजनीतिक स्तंभ कहा गया जो कि इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिये महत्त्वपूर्ण है।

भारतीय दृष्टिकोण से यूरोपीय संघ के साथ सहयोग शांति को बढ़ावा दे सकता है, रोज़गार सृजित कर सकता है, रोज़गार उन्मुख आर्थिक विकास और सतत् विकास को बढ़ावा दे सकता है। इसलिये यूरोपीय संघ और भारत स्वाभाविक भागीदार प्रतीत होते हैं तथा उन्हें मौजूदा अवसरों का लाभ उठाने की आवश्यकता है।

वर्चुअल शिखर सम्मेलन की मुख्य विशेषताएँ

शिखर सम्मेलन का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह रहा कि आठ वर्षों के बाद भारत और यूरोपीय संघ ने पुनः एक व्यापक व्यापार समझौते के लिये बातचीत शुरू करने का फैसला किया है। इन वार्ताओं को वर्ष 2013 में निलंबित कर दिया गया था क्योंकि दोनों पक्ष टैरिफ में कटौती, पेटेंट संरक्षण, डेटा सुरक्षा और भारतीय पेशेवरों के यूरोप में काम करने के अधिकार जैसे कुछ प्रमुख मुद्दों पर अपने मतभेदों को दूर करने में विफल रहे थे।

दोनों पक्ष एक स्टैंडअलोन निवेश संरक्षण समझौते और भौगोलिक संकेतों पर समझौते के लिये बातचीत शुरू करने पर भी सहमत हुए हैं। वर्चुअल शिखर सम्मेलन में भारत और यूरोपीय संघ ने डिजिटल, ऊर्जा, परिवहन और लोगों से लोगों के बीच एक महत्त्वाकांक्षी “कनेक्टिविटी साझेदारी” शुरू की, जिससे दोनों अफ्रीका, मध्य एशिया से लेकर हिंद-प्रशांत तक फैले क्षेत्रों में स्थायी संयुक्त परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में सक्षम होंगे।

व्यापक-आधारभूत व्यापार एवं निवेश समझौता  क्या है?

यह भारत और यूरोपीय संघ के बीच का एक व्यापारिक समझौता प्रस्ताव है जिसमें प्रारम्भिक वार्ता बेल्जियम के ब्रुसेल्स में 28 जून, 2007 को शुरू हुई थी। इस प्रकार के व्यापाक आधारभूत व्यापार एवं निवेश समझौते के लिए 13 अक्टूबर, 2006 में हेलसिंकी में आयोजित सातवें भारत यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में उपस्थित राजनेताओं ने प्रतिबद्धता दिखाई थी। इसके पूर्व इस विषय में भारत और यूरोपीय संघ के एक उच्च-स्तरीय तकनीकी समूह ने एक प्रतिवेदन दिया था जो इस प्रकार के समझौता का मूल आधार होने वाला था।

वार्ता में अवरोध क्यों हो रहा था?

2013 से ही व्यापक आधारभूत व्यापार एवं निवेश समझौता के अंतर्गत वार्ताएं ठंडी पड़ी हुई थी। इसका मुख्य कारण यह है कि यूरोपीय संघ ने कुछ ऐसी माँगें रख दी थीं कि जिसपर सहमति नहीं बन पा रही थी। ये माँगें थीं – स्वचालित वाहन, मदिरा एवं स्प्रिट के लिए बड़ा बाजार तथा बैंकिंग बीमा और ई-कॉमर्स जैसी वित्तीय सेवाओं को और भी अधिक सुलभ बनाना।

यूरोपीय संघ यह भी चाहता था कि वार्ता में श्रम, पर्यावरण और सरकारी खरीद को भी शामिल किया जाए। दूसरी ओर, भारत की माँग थी कि कामगार वीजा और अध्ययन वीजा के मानक सरल बनाए जाएँ और डाटा सुरक्षा इस प्रकार की हो जिससे कि यूरोपीय कम्पनियाँ भारत में अपना व्यवसाय आउटसोर्स कर सकें। परन्तु इसके प्रति यूरोपीय संघ के देशों ने उत्साह नहीं दिखाया।

यूरोपीय संघ और भारत : स्वाभाविक भागीदार

यूरोपीय संघ ने हाल ही में चीन के साथ निवेश को लेकर एक व्यापक समझौते पर हस्ताक्षर किये जिसे राजनयिक तनाव के कारण अब निलंबित कर दिया गया है। झिंजियांग क्षेत्र में उइगर मुस्लिम अल्पसंख्यकों की सहायता के लिये यूरोपीय संघ द्वारा चीन के खिलाफ प्रतिबंध लगाया गया जिसके जवाब में चीन द्वारा EU के कुछ सदस्यों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके चलते यूरोपीय संसद इस सौदे का भारी विरोध कर रही है।

यूरोपीय संघ भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और दूसरा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य है जिससे मज़बूत भारत-यूरोपीय संघ के आर्थिक संबंधों का तर्क स्वयं स्पष्ट हों जाता है। इसके अलावा, भारत घरेलू विनिर्माण आधार विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करने के क्रम में खुले व्यापार के लिये अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करना चाहता है।

वर्तमान स्थिति को देखते हुए स्वास्थ्य सहयोग ने एक नया महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। यूरोपीय संघ के सदस्य-राज्यों ने पिछले कुछ हफ्तों में महत्त्वपूर्ण चिकित्सा आपूर्ति भेजकर भारत का समर्थन करने की पहल की है, जो भारत द्वारा पिछले वर्ष दूसरे देशों के लिये किया जा रहा था। चूँकि दोनों पक्ष वैश्विक स्वास्थ्य पर एक साथ काम करने के लिये प्रतिबद्ध हैं अतः लचीली चिकित्सा आपूर्ति श्रृंखला पर ध्यान केंद्रित करने अधिक आवश्यकता है।

यूरोपीय संघ को अपनी विदेश नीति की अनिवार्यता के भू-राजनीतिक निहितार्थों के लिये मजबूर किया जा रहा है और भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समन्वय स्थापित करने के लिये समान विचारधारा वाले देशों के साथ महत्त्वपूर्ण साझेदारी की तलाश कर रहा है। इसके अलावा, भारत अमेरिका और चीन के बीच द्विध्रुवी भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से परे देख रहा है और एक बहुध्रुवीय विश्व की स्थापना की दिशा में काम कर रहा है।

भारत वर्ष 2050 तक अपने कार्बन-उत्सर्जन को तटस्थ बनाने के लिये यूरोपीय संघ की ग्रीन डील नामक एक नई औद्योगिक रणनीति को अपना सकता है। यूरोपीय संघ और भारत स्वच्छ ऊर्जा में निवेश करके खुद को वर्ष 2050 तक कार्बन-तटस्थ अर्थव्यवस्थाओं में बदलने का प्रयास कर सकते हैं। भारत में नवीकरणीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाने के भारत के प्रयासों में यूरोप का निवेश और प्रौद्योगिकी सर्वोपरि है।

आगे की राह

भारत सुरक्षा की दृष्टि से नहीं तो भू-आर्थिक रूप से, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संलग्न होने के लिये यूरोपीय संघ के देशों को लक्षित कर सकता है। यह क्षेत्रीय बुनियादी ढाँचे के सतत् विकास के लिये बड़े पैमाने पर आर्थिक संसाधन जुटा सकता है, राजनीतिक प्रभाव को नियंत्रित कर सकता है और हिंद-प्रशांत वार्ता को आकार देने के लिये अपनी महत्त्वपूर्ण सॉफ्ट पावर का लाभ उठा सकता है।

भारत और यूरोपीय संघ एक मुक्त व्यापार सौदे पर बातचीत कर रहे हैं जो कि वर्ष 2007 से लंबित है। इसलिये भारत और यूरोपीय संघ के बीच घनिष्ठ समन्वय के लिये दोनों को व्यापार समझौते को जल्द से जल्द अंतिम रूप देने में संलग्न होना चाहिये।

वर्ष 2018 की शुरुआत में फ्राँस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन की भारत यात्रा ने रणनीतिक साझेदारी को पुनर्जीवित करने के लिये एक विस्तृत ढाँचे का अनावरण किया। फ्राँस के साथ भारत की साझेदारी अब हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक मज़बूत क्षेत्रीय सहयोग है। इसके अलावा भारत को भारत-ऑस्ट्रेलिया-जापान मंच और फ्राँस तथा ऑस्ट्रेलिया के साथ त्रिपक्षीय वार्ता एवं अन्य मध्य शक्तियों के साथ बहुपक्षीय समूहों के नेटवर्क के अलावा अमेरिका के साथ अपनी साझेदारी को पूरक बनाना चाहिये।

About the author

आदित्य सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास का छात्र। खासतौर पर इतिहास, साहित्य और राजनीति में रुचि।

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