रविवार, अप्रैल 5, 2020

‘भारत जोड़ो’ की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं कर्नाटक के मौजूदा हालात

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हिमांशु पांडेय
हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।

देश के 70वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को ‘भारत जोड़ो’ का नया नारा दिया। देश में बढ़ते सामुदायिक संघर्ष की घटनाओं और क्षेत्र आधारित राजनीति के प्रभाव से देशवासियों को मुक्त करने के लिए प्रधानमंत्री ने यह नारा दिया है। उन्हें उम्मीद है कि इससे देश के मौजूदा हालात सुधरेंगे, पर हाल के वक्त में कर्नाटक सरकार द्वारा अपनाया जा रहा रवैया इसपर सवाल खड़े करता है। कर्नाटक में पिछले कुछ दिनों से हिंदी भाषियों पर लगातार हमले हो रहे हैं और कर्नाटक सरकार जम्मू-कश्मीर की तरह राज्य का अलग झंडा चाहती है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में स्पष्ट कहा है कि कन्नड़ कर्नाटक की राज्य भाषा है और किसी भी हालत में हम हिंदी को लागू नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि राज्य की स्थानीय भाषा के अलावा किसी अन्य भाषा को लागू करना असंवैधानिक है।

बढ़ती जा रही है ‘राष्ट्र भाषा’ से नफरत

पिछले वर्ष बेंगलुरु में हिन्दी भाषी लोगों पर हुए हमलों के साथ शुरू हुआ हिंदी-कन्नड़ विवाद लगातार बढ़ता ही जा रहा है। बेंगलुरु के बाद एक-एक कर राज्य के सभी हिस्सों में हिंदी भाषी लोगों पर हमले शुरू हो गए और राज्य से लाखों लोगों का पलायन हो गया। कुछ ऐसा ही घटनाक्रम पहले महाराष्ट्र में भी हुआ था जब मनसे कार्यकर्ताओं ने हिंदी भाषियों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था। धीरे-धीरे हिंदी भाषियों पर हमले तो कम हो गए पर राज्य की हिंदी से नफरत बढ़ती गई। राज्य में हिंदी भाषा में छपे पोस्टरों को हटाए जाने का सिलसिला शुरू हो गया जो अब धीरे-धीरे सभी भाषाओँ के पोस्टरों के साथ होता नजर आ रहा है। बीते जुलाई के महीने में कर्नाटक रक्षणा वैदिक संगठन के कार्यकर्ताओं ने राज्यभर से हिंदी भाषा में छपे पोस्टर-बैनर हटा दिए थे या उनपर काला रंग पोत दिया था। देश के किसी राज्य में ‘राष्ट्र भाषा’ का इतना अपमान निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण और निंदनीय है।

कश्मीर जैसी मांग पर उतरे मुख्यमंत्री

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने हाल ही में राज्य सरकार की तरफ से राज्य के अलग झंडे की मांग की थी। उनकी इस मांग का हर तरफ विरोध हुआ था। भाजपा ने उनकी मांग पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि राज्य का अलग झंडा देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा है। बाद में कोर्ट ने भी उनकी मांग ठुकरा दी थी। बता दें कि राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने जम्मू-कश्मीर का उदाहरण देकर राज्य के लिए अलग झंडे की मांग की थी। उन्होंने झंडे और सिम्बल को डिज़ाइन करने के लिए 9 सदस्यीय कमेटी का भी गठन किया था। देश में जम्मू-कश्मीर एकलौता ऐसा राज्य है जिसके पास खुद का झंडा है। यह अधिकार उसे संविधान के अनुच्छेद 370 की वजह से हासिल है।

आगामी चुनाव है मुख्य वजह

अगले साल कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने हैं। पिछले चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भाजपा की आपसी फूट का फायदा मिला था और वह सत्ता हथियाने में सफल रही थी। मगर इस बार हालात बिलकुल उलट हैं। राज्य की जनता में सरकार की लोकप्रियता घटती जा रही है और ऐसे में सरकार क्षेत्रवादी राजनीति की चाल चल कर चुनावी बाजी जीतने की फ़िराक में हैं। मेट्रो स्टेशनों से हिंदी बोर्ड हटवाने के बाद अब राज्य सरकार ने बैंकर्मियों को कन्नड़ सीखने के लिए 6 महीने का समय दिया है। शिक्षा विभाग ने राज्य के स्कूलों से भी कन्नड़ को सेकंड लैंग्वेज के आधार पर पढाने और सिखाने को कहा है। कन्नड़ विकास प्राधिकरण(केडीए) द्वारा एप्पल के सीईओ टीम कुक को लिखे पत्र में भी एप्पल के उत्पादों कन्नड़ फॉन्ट का इस्तेमाल करने की बात कही गई है।

इस तरह सत्ता के लोभ में देश की एकता और अखंडता को ताक पर रखकर क्षेत्रीय राजनीति को बढ़ावा देना और राष्ट्र भाषा का अपमान कर्नाटक को भारी पड़ सकता है। इस विषय में केंद्र सरकार को शांतिपूर्ण तरीके से कर्नाटक सरकार के समन्वय स्थापित करना चाहिए और इस विवाद का समाधान निकालना चाहिए। देश का संविधान सर्वोपरि है और सरकार को उसकी गरिमा बनाये रखने के लिए हर जरुरी कदम उठाने होंगे। वरना मुमकिन है आने वाले वक्त में कर्नाटक राज्य का भी वही हश्र हो जो आज जम्मू-कश्मीर का हो रहा है।

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