सोमवार, मार्च 23, 2020

भारत-चीन सीमा विवाद : युद्ध नहीं है हल, बातचीत का रास्ता अपनाएं दोनों देश

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हिमांशु पांडेय
हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है। मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।

भारत और चीन के बीच जारी सीमा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा हैं। इसे लेकर दोनों देशों की ओर से रोज बयानबाजी हो रही है। दोनों देशों में से कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। चीन इस मामले पर दुनियाभर में भारत के खिलाफ पृष्ठभूमि तैयार करने की कोशिश कर रहा है मगर उसे अभी तक कुछ खास सफलता हाथ नहीं लगी है। विश्वपटल पर चीन खुद को शांतिप्रिय और भारत को आक्रामक साबित करने में जुटा हुआ है। सम्पूर्ण विश्व दोनों देशों के इतिहास से वाक़िफ़ है ऐसे में उसका यह कदम क्या असर लाता है यह गौर करने की बात होगी।

यह पहला मौका नहीं है जब दोनों देशों के बीच सीमा को लेकर विवाद हुआ है। पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है पर कभी किसी विवाद को इतनी सुर्खियां नहीं मिलीं। विवाद तब शुरू हुआ जब चीन की सेना डोकलाम में सड़क निर्माण के लिए पहुँची। भारतीय सेना ने इसपर ऐतराज जताया और निर्माण कार्य रुकवा दिया। इस घटना को एक महीने गुजर चुके हैं और अभी भी दोनों देश की सेनाएं यहाँ आमने-सामने खड़ी है।

दरअसल चीन इस क्षेत्र को तिब्बत का हिस्सा बताता है और भूटान इसे अपना अधिकार क्षेत्र बताता है। भारत ने इसे चीन, भूटान और भारतीय सीमा के ट्राई-जंक्शन क्षेत्र का हिस्सा बताया है। चीन ने भारतीय सीमा के समीपवर्ती क्षेत्रों में भारी सैन्यबल इकठ्ठा कर लिया है और वह युद्धाभ्यास कर रहा है। भारत भी इस मुद्दे पर पर अपने स्टैंड पर कायम है। चीन की ओर से मिल रही युद्ध की धमकियों के बीच विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने स्पष्ट किया है कि भारत किसी तरह की गीदड़ भभकी से डरने वाला नहीं है और डोकलाम से सेना तभी वापस आएगी जब चीन भी यहाँ से अपनी सेना वापस बुला ले।

ट्राई - जंक्शन क्षेत्र

सीमा विवाद ही बना था 1962 के भारत-चीन युद्ध की वजह

भारत और चीन शुरुआती दिनों में एक दूसरे के सहयोगी थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री पण्डित नेहरू ने विश्वमंच पर हमेशा चीन का साथ दिया था और ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ का नारा भी दिया था। भारत ने जापान द्वारा आयोजित एक शांतिवार्ता में सिर्फ इसलिए हिस्सा नहीं लिया था क्योंकि आमंत्रित देशों में चीन शामिल नहीं था। ऐसे में भारत को चीन से हमले की उम्मीद बिलकुल नहीं थी।

भारत और चीन के बीच हुआ 1962 में हुए युद्ध का मुख्य कारण भी सीमा विवाद ही था। भारतीय सेना तेजी से तिब्बती सीमा पर नई चौकियों का निर्माण कर रही थी। चीन के तिब्बत पर कब्जा जमाने के बाद भारत ने तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा को अपने यहाँ शरण दी और चीन इस बात से बेहद नाराज था। चीन ने 1959 में ल्हासा में हुए विद्रोह को भारत समर्थित बताया।

चीन ने भारत पर सीमा लांघने का आरोप लगाते हुए हमला कर दिया था। 20 अक्टूबर, 1962 को चीनी सेना ने एकसाथ लद्दाख और मैकमोहन लाइन के रास्ते भारत पर हमला बोल दिया। करीब 350 चीनी सैनिकों ने चुशुल में एक भारतीय सैन्य पोस्ट को घेर लिया और लाउडस्पीकर के माध्यम से अपनी बात कह गोरखाओं को भारत की ओर से लड़ाई ना करने के लिए मना लिया। उस समय चीन की सैन्य ताकत भारत के मुकाबले 7-8 गुना थी। भारतीय सेना में कुल 10,000-12,000 सैनिक थे वहीं चीनी सेना में 80,00 सैनिक थे। यह वही दौर था जब क्यूबा में मिसाइल संकट को लेकर सोवियत संघ और अमेरिका आमने-सामने थे। ऐसे में इन दोनों मौजूदा महाशक्तियों में से किसी का भी समर्थन भारत को नहीं मिला।

करीब एक महीने के संघर्ष के बाद चीन ने सीजफायर की घोषणा कर दी और मैकमोहन लाइन की सीमा पर वापस लौट आया। किसी भी अन्य भारतीय सीमा क्षेत्र के मुकाबले चीन ने अक्साई चीन में सैन्यबल की तैनाती पर ज्यादा बल दिया और भारतीय सीमा में जम्मू-कश्मीर के लद्दाख जिले के करीब 37,244 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। यह क्षेत्र ऊँचाई पर स्थित बंजर भूमि है जो प्राचीन काल में तिब्बत को कश्मीर से जोड़ने का रास्ता था। इस क्षेत्र की समुद्रतल से निम्नतम ऊँचाई 5,000 मीटर है। इस क्षेत्र पर आज भी चीन का कब्जा है और वह इसे तिब्बत का हिस्सा बताता है।

जवाहरलाल नेहरू

सिक्किम विवाद, 1967 : नाथु ला और चो ला संघर्ष

इन दोनों हमलों को ज्यादा तवज्जो नहीं दी जाती है। इसका कारण है कि चीनी सेना को इन दोनों हमलों में मुँह की कहानी पड़ी थी। नाथू ला दर्रे पर 5 दिन तक संघर्ष चला था जो 11 सितम्बर, 1967 को शुरू होकर 15 सितम्बर, 1967 को समाप्त हो गया। भारतीय सेना ने चीनी हमले का मुँहतोड़ जवाब दिया था और चीनी सेना को बैरंग वापस लौटना पड़ा था। स्वतंत्र सूत्रों की मानें तो भारतीय सेना ने चीन की पीएलए को काफी नुकसान पहुँचाया था और उसके सभी करीबी पोस्टों को नष्ट कर दिया था।

दूसरा हमला चो ला में 1 अक्टूबर, 1967 को हुआ था और उसी दिन संघर्ष समाप्त भी हो गया था। इस पोस्ट पर भी पीएलए को मुँह की खानी पड़ी थी। उस समय देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी थी। सीमावर्ती क्षेत्रों में अपना प्रभाव बढ़ने के उद्देश्य से चीन द्वारा उठाये गए इन क़दमों का माकूल जवाब देकर भारतीय सेना ने 1962 हमलों के बाद हुए सैन्य सुधारों की मिसाल पेश की थी।

नाथु ला और चो ला संघर्ष

मैकमोहन लाइन को नहीं मानता है ड्रैगन, हो चुके हैं कई समझौते

दोनों देशों के बीच जारी सीमा-विवाद के निपटारे को लेकर कई समझौते हो चुके हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति बनाये रखने को लेकर भारत और चीन ने 7 सितम्बर, 1993 को समझौते पर हस्ताक्षर किये थे। वास्तविक नियंत्रण रेखा के आस-पास गुप्त सैन्य निर्माण ना करने को लेकर दोनों देशों के बीच 29 नवंबर, 1996 को समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे। 11 अप्रैल, 2005 को इसी समझौते को और विस्तृत रूप दिया गया और वास्तविक नियंत्रण रेखा के समीपवर्ती क्षेत्रों में होने वाले लोक व सैन्य निर्माणों को जानकारी के दायरे में लाया गया। सीमा विवादों पर आपसी सहभागिता और समाधान को लेकर 17 जनवरी, 2012 में एक समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे।

1914 में हुए शिमला समझौते के तहत उत्तर-पूर्वी सीमान्त भारत और तिब्बत के बीच मैकमोहन लाइन हेनरी मैकमोहन ने प्रस्तुत की थी। यह पूर्व में अरुणाचल प्रदेश से शुरू होकर हिमालय की पर्वत श्रेणियों से गुजरते हुए भूटान तक जाती है। चीन इसे मानने से इंकार करता है और अक्सर भारत को उकसाने के लिए चीनी सेना मैकमोहन लाइन को लांघने का काम करती है।

तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने 2003 में अरुणाचल प्रदेश को तिब्बत का दक्षिणी हिस्सा बताया था। जनवरी 2007 में उन्होंने कहा कि अंग्रेजी शासनकाल में भारत और तिब्बत के बीच 1914 में मैकमोहन लाइन सन्दर्भ में आयी और इसके मुताबिक अरुणाचल प्रदेश भारत का हिस्सा है। इसपर तिब्बत और अंग्रेजी हुकूमत ने 1914 में सहमति जताई थी।

मैकमोहन लाइन

वर्तमान परिदृश्य में संभव नहीं है युद्ध

चीन भले ही अपने सैन्यबल को सीमावर्ती क्षेत्रों में इकठ्ठा कर युद्धाभ्यास कर रहा हो पर मौजूदा परिस्थितियां युद्ध के माकूल नहीं है। विश्वपटल पर चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए अमेरिका भारत को एशिया में चीन के विकल्प के तौर पर देखता है। तेजी से बढ़ती भारतीय अर्थव्यवस्था और भारत में बड़े विदेशी बाजार की संभावनाओं को देखते हुए वह युद्ध के मुद्दे पर भारत के पक्ष में खड़ा रहेगा। रूस भारत का पुराना सहयोगी रहा है और उसने हर मुश्किल घडी में भारत का साथ दिया है। हाल ही में प्रधानमंत्री के इजराइल दौरे के बाद भारत के सैन्य सहयोगियों की सूची में एक नया और मजबूत साथी जुड़ा है। दक्षिण चीन सागर के मुद्दे पर भारत के रवैये के कारण जापान और दक्षिण कोरिया भी भारत के सहयोगी है। भारत ने हाल में फ्रांस से बड़ी रक्षा डील की है और भारत को इसका भी फायदा मिलना तय है। पश्चिम की लॉबी वैसे भी चीन की धुर विरोधी है और अमेरिका के साथ खड़ी रहती है।

इन सबसे परे, दोनों ही देश विकासशील देश हैं और आने वाले समय में वैश्विक अर्थव्यवस्थता के मजबूत स्तंभ बनेंगे। दोनों ही देश परमाणु क्षमता संपन्न हैं और ऐसे में युद्ध शुरू करने का कदम दोनों देशों की अर्थव्यवस्था को 100 साल पीछे लेकर जायेगा। युद्ध कभी किसी देश के विकास की वजह नहीं रहा है वरन इसने हर देश को गर्त में ही धकेला है। दोनों ही देश बुद्ध के देश रहे हैं। भारत ने बुद्ध को जन्म दिया और उन्हें यहाँ ज्ञान प्राप्ति हुई वहीं चीन ने बुद्ध के उपदेशों का अनुसरण किया है। विश्व में बौद्ध धर्म की सर्वाधिक जनसंख्या चीन में निवास करती है। ऐसे में उम्मीद है कि दोनों देश आपसी मतभेद भूलकर इस मुद्दे का बातचीत से हल निकाल लेंगे और विश्वपटल पर एशिया की महाशक्ति बन साथ खड़े होंगे।

भारत-चीन सीमा विवाद

 

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