भारत-ईरान सम्बन्ध: इतिहास, आर्थिक एवं सामरिक साझेदारी

भारत और ईरान के बीच द्विपक्षीय सम्बन्धों की शुरुआत 1950 में हुई। तब से लेकर दोनों देशों के रिश्ते मुख्य तौर पर तेल के व्यापार तक ही सीमित रहे हैं। लेकिन आज भारत, ईरान में चाबहार बंदरगाह के निर्माण से नए एवं महत्वपूर्ण सामरिक सम्बन्धों की नींव रख रहा है।

भारत-ईरान सन् 1947 तक आपस में सीमा साझा करते थे जोकि भारत के बंटवारे के बाद पाकिस्तान का हिस्सा बन गई। शीत युद्ध के ज्यादातर समय, अलग-अलग राजनैतिक पक्ष होने के कारण दोनों देशों के बीच रिश्ते मधुर नहीं थे। भारत सोवियत यूनियन का करीबी था वहीं ईरान अमरीका से नज़दीकी सम्बन्ध साझा करता था।

इसके बावजूद उच्च स्तरीय मुलाकातों का दौर जारी रहा। 1956 में ईरान के शाह, मोहम्मद रेज़ा पहलावी ने भारत की यात्रा की। इसके बाद अपने-अपने कार्यकाल में तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु एवं प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने भी ईरान का दौरा किया।

1979 में ईरान में क्रांति के बाद कुछ समय के लिए रिश्ते पटरी पर लौटे पर ईरान का पाकिस्तान को समर्थन तथा भारत का इराक़-ईरान युद्ध के दौरान इराक़ को समर्थन, सम्बन्धों में गर्मी आने से रोकते रहे। 1990 के दौर में अफ़ग़ानिस्तान की तालिबान सरकार के खिलाफ दोनों देश उत्तरी गठबंधन सेनाओं के साथ खड़े हुए।

2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के तेहरान दौरे ने आपसी रिश्तों को एक नयी उर्जा दी और ‘तेहरान डिक्लेरेशन’ के तहत आपसी सहयोग बढ़ाने के लिए क्षेत्रों का चिन्हांकन किया गया। इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए 2003 में तब के ईरानी राष्ट्रपति मोहम्मद खतामी भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बुलाये गए। इस दौरान ‘डेल्ही डिक्लेरेशन’ में सामरिक साझेदारी के लिए विभिन्न क्षेत्रों का चयन किया गया।

मई 2016 में मौजूदा भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान का दौरा किया जिसमें द्विपक्षीय व्यापार और उर्जा विकास जैसे मुद्दों को केंद्र में रखा गया।

नरेन्द्र मोदी भारत-ईरान

हाल ही में, फरवरी 2018 की ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी की भारत यात्रा के दौरान 9 महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, इसमें चाबहार बंदरगाह के एक हिस्से को भारतीय कंपनी को उपयोग के लिए लीज़ पर देने का समझौता भी शामिल है।

आर्थिक सम्बन्ध:

2003 के ईरानी राष्ट्रपति के भारत दौरे के बाद से ही ईरान के साथ आर्थिक रिश्तों ने ज़ोर पकड़ना शुरू किया। इसमें तेल के व्यापार ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई है।

2008-09 में ईरान से आयातित तेल भारत के कुल आयातित कच्चे तेल का 16.5 प्रतिशत था। यह 2008-09 में आयात के 9.5 प्रतिशत की वृद्धि से मुमकिन हुआ जिससे ईरान, भारत को दूसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल की आपूर्ति करने वाला देश बन गया। यहाँ तक कि साल 2009 में ईरान का 40 प्रतिशत तेल का निर्यात भारत को होने लगा, जिससे वह चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा कच्चे तेल का निर्यातक बन गया था।

हालांकि इसके बाद, अमरीका के तत्कालीन ओबामा प्रशासन ने तेहरान की बढ़ती परमाणु कार्यक्रम गतिविधयों की वजह से ईरान के खिलाफ सख्त़ आर्थिक प्रतिबंधों को लागू कर दिया। भारत पर ईरान के के साथ व्यापार न करने के बढ़ते दबाव के बीच ईरान से आयातित कच्चे तेल की मात्रा में कमी आई और भारत ईरान को तेल के लिए भारतीय रुपए में भुगतान करने लगा।

ईरान के फर्ज़ाद बी गैस फील्ड के अनुबंध के लिए बोली में भारतीय कंपनी ओएनजीसी ने इच्छा जताई थी किंतु ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों ने इस प्रक्रिया को ज़्यादा आगे बढ़ने नहीं दिया। इसकी वजह से ईरान ने इस गैस फील्ड के लिए शुरुआती अनुमति रुसी कंपनी गेज़प्रॉम को दे दी। इससे दोनों देशों के रिश्तों में तनाव आया।

2016 में इस मामले को सुलझाने के लिए भारत के पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने ओएनजीसी और आईओसीएल जैसी कंपनी के अधिकारियों के साथ ईरान की यात्रा भी की। इस फील्ड के समझौते के लिए दोनों देशों के बीच अभी बातचीत जारी है।

सामरिक साझेदारी:

भारत ईरान में 8 बिलियन डॉलर के निवेश से चाबहार बंदरगाह के निर्माण कार्यों में ज़ोरो-शोरों के साथ लगा हुआ है। इस परियोजना को चीन के पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह के विकास के जवाब में विकसित किये जाने के तौर पर देखा जाता है।

अफ़ग़ानिस्तान तक रसद पहुँचाने के रास्ते में पाकिस्तान इस वक्त भारत के रास्ते में आता है। चाबहार बंदरगाह के विकास के ज़रिये भारत-ईरान-अफगानिस्तान के बीच सीधा संपर्क खड़ा हो सकता है। और हाल ही में 3 दिसंबर 2017 को चाबहार परियोजना का पहला चरण पूरा कर इस्तेमाल के लिए खोल दिया गया है।

यह बंदरगाह पकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से 80 किलोमीटर दूरी पर स्थित है और भारत के पश्चिमी तट से आसानी से पहुँचने योग्य है। चाबहार बंदरगाह, मध्य एशिया को भारत-अफ़गानिस्तान-ईरान के लिए एक बड़े बाज़ार के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखता है।

1.6 बिलियन डॉलर की लागत से चाबहार से ज़ाहेदान तक की रेल लाइन का विकास भी भारत की सहायता से हो रहा है।

रक्षा क्षेत्र की बात की जाये तो भारत-ईरान के बीच 2001 में एमओयू पर हस्ताक्षर हुए थे। चाबहार बंदरगाह के विकास के साथ ही दोनों देश जल मार्ग का विकास उसे व्यापार के लिए खुला रख कर करना चाहते हैं. इसके लिए भारत-ईरान की नौसेनाओं को इस मार्ग की सुरक्षा का ध्यान रखना होगा, जिसके लिए नौसैनिक अभ्यास में निवेश भी प्रस्तावित है।

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