एनडीए के सांसदों ने संसद की तनख्वाह लेने से किया मना

जारी संसद क्षेत्र मे करीब-करीब कोई कार्य न होने के कारण सत्ताधारी राजग (एनडीए) या राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सांसदों ने अपनी तनख्वाह लेने से मना कर दिया ।

संसदीय कार्य मंत्री अनन्त कुमार ने इस फैसले की घोषणा की।

संसद के उच्च आदर्शो व नैतिक मूल्यों को सर्वोपरि रखते हुए उन्होंने 23 दिनों की तनख्वाह लेने से इनकार कर दिया।

जनता का पैसा

अनंत कुमार ने कहा की यह पैसा जनता की भलाई के लिए आता है तो अगर यह जनता की भलाई के लिए इस्तेमाल नहीं किया गया तो हमें भी इसे लेने का कोई हक नहीं है, इसलिए 23 दिन की राजग सांसद की तनख्वाह विकास कार्यो मे लगाई जायेगी।

तारीफ के योग्य

राजग सांसद बधाई व तारीफ के पत्र हैं। लंबे समय से सिविल सोइटी व सांसदीय मामलों के जांनकार इस बात को लम्बे समय से दोहरा रहे हैं कि सांसदों को उतने समय की ही तनख्वाह मिलनी चाहिये जितने समय संसद मे काम होता है।

इससे एक तो जानबूझ कर संसद को स्थगित करने सांसदों व पार्टियों का मनोबल गिरेगा। तथा जनता के बहुमूल्य समय व पैसे की बचत भी होगी।

विपक्ष का रुख

हाल मे ही सांसदों ने अपनी तनख्वाह मे मोटी बढ़ोत्तरी की थी। साथ ही हर पांच सालों में अपनी तनख्वाहें बढ़ाने का इंतज़ाम कर लिया है।  

विपक्ष ने संसद स्थगित होने के लिये सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया। उनके अनुसार भाजपा अविश्वास मत से डरकर संसद नहीं चलने दे रही है।

एआईएडीएमके जैसी पार्टियां, जो भाजपा को गुप्त रूप से समर्थन करती हैं, उनकी वजह से संसद सत्र नहीं चल पाया है।

हालाँकि इन सबसे अलग भाजपा के ही सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने अपनी पार्टी के फैसले से अलग हट कर घोषणा की, कि वो अपनी तनख्वाह नहीं छोड़ेंगे।

उनके अनुसार वो संसद में हर दिन उपस्थित रहे हैं, और अगर दूसरों के कारण संसद में कार्य नहीं हो पाया तो इसमे उसकी कोई गलती नहीं है। उन्हें उनकी तनख्वाह मिलनी ही चाहिये।

आय में बढ़ोत्तरी

आपको बता दें कि संसदों की तनख्वाह में इस बजट करीब 40 हज़ार की बढ़ोत्तरी हुई है। साथ ही सांसदों, राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति तथा राज्यपालों की आय को भी हर पांच साल में रिवाइज करने का प्रावधान केंद्र सरकार इसी बजट प्रस्ताव के साथ लायी थी।

आवास, वाहन, टेलीफोन तथा यात्रा के लिए सांसदों को भत्ते अलग से मिलते हैं। इतने भत्तों के अलावा उन्हें मोटी तनख्वाह भी मिलती है पर फिर भी अगर संसद में जान बूझ कर व्यवधान उतपन्न किया जाता है तब ये जनता के परिश्रम व सहनशीलता का मज़ाक उड़ाना है।

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