मायावती का एलान: बसपा नहीं लड़ेगी रायबरेली व अमेठी से 2019 चुनावों में

कांग्रेस का गढ़ कही जाने वाली लोकसभा की सीटें, अमेठी व रायबरेली पर बहुजन समाज पार्टी ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारने की घोषणा की है।

उत्तर प्रदेश मे उपचुनावों में समाजवादी पार्टी को समर्थन देने के बाद बसपा का यह एलान खासा चौकाने वाला नहीं है। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस खबर की पुष्टि की। मायावती ने कहा कि इस कदम से मतों का फैलना बंद होगा व कांग्रेस सीधे भारतीय जनता पार्टी के साथ मैदान में होगी।

2014 में बसपा की तरफ से बरेली में प्रवेश सिंह लड़े थे। अमेठी में 2014 चुनाव में बसपा को लगभग 6 प्रतिशत व बरेली में 7.7 प्रतिशत वोट मिले थे।

2014 में दोनो ही सीटों पर भाजपा कांग्रेस के काफी नजदीक थी। ऐसे में कांग्रेस पर इन सीटों को बचाने का दबाव है। अमेठी में स्मृति इरानी राहुल गांधी के खिलाफ खड़ी थीं और लगभग 31 प्रतिशत वोट भी उन्होंने प्राप्त किये थे।

ऐसे में राज्य चुनावों से साबित होती काग्रेस की दिनों दिन घटती लोकप्रियता व भाजपा व योगी का बढ़ता जमीनी नेटवर्क कांग्रेस के लिए उसके पारिवारिक गढ़ में ही खासी मुश्किलें खड़ी कर सकती है।

हालांकि समाजवादी पार्टी 2004 से ही दोनो लोक सभा क्षेत्रों में अपने उम्मीद्वार नहीं खड़े करती आई है।

क्यों हैं ये सीटें खास?

रायबरेली

रायबरेली आजादी के बाद से ही कांग्रेस का गढ़ रही है। 1967 में इंदिरा गांधी यहां से पहली बार जीती थीं। तब से लेकर अबतक सिर्फ दो बार यहां से कोंग्रेस पार्टी के सांसद नहीं रहे एक बार 1977 में जनता पार्टी के उम्मीदवार ने इंदिरा गांधी को हराया था व दूसरी बार भाजपा के प्रत्याशी यहां से जीते थे।

2004 में यह पहली बार सोनिया गांधी जीती थीं व तब से वही जीतती आई हैं।

सोनिया गांधी यहां से 2004, 2006 (उपचुनाव), 2009 व 2014 में जीती हैं। 2014 में वह दूसरे नम्बर के भाजपा प्रत्याशी से करीब 4 लाख मतों से जीती थीं।

2019 चुनावों की तैयारी वहां भी जोर शोर से चल रही है।

21 अप्रैल को रायबरेली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का दौरा था। उनके साथ मंच पर करीब आधी उत्तर प्रदेश सरकार बरेली में मौजूद थी। भाजपा अपनी पूरी रायबरेली में झोंक रही है। कांग्रेस को अपना गढ़ बचाने में खासी मुश्किल होगी।

अमेठी

अमेठी लोकसभा सीट का निर्माण 1967 में हुआ था। तब पहली बार यहां विद्याधर वाजपेयी दो कार्यकालों के लिये जीते। 1977 में यह से कांग्रेस जनता पार्टी के प्रत्याशी से हारी थी। व 1980 में यहां से संजय गांधी जीते।

उनकी मौत के बाद राजीव गांधी भी यहीं से लोकसभा के सदस्य बने 1998 में यहां कांग्रेस दूसरी बार हारी। पर 1999 में यहां से सोनिया गांधी की जीत के बाद से यहां लगातार कांग्रेस का राज रहा है।  

वर्तमान में राहुल गांधी यहां से लोकसभा के सदस्य हैं। उनके खिलाफ भाजपा से स्मृति जुबिन ईरानी 2014 में चुनाव लड़ी थीं पर हार गयीं। अमेठी से ही आम आदमी पार्टी के कुमार विश्वास भी 2014 के चुनावी दंगल में शामिल हुए थे।

2019 का जो परिणाम रहे, कांग्रेस पार्टी की दिशा, दशा व नेतृत्व का फैसला यही दो सीटें तय करेंगी।

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