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प्रणब दा का राष्ट्र के नाम आखिरी सम्बोधन : ‘संविधान मेरा ग्रन्थ, संसद मेरा मंदिर’

देश के तेरहवें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी
देश के तेरहवें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बतौर राष्ट्रपति अपना आखिरी सन्देश जारी किया। अपने पिछले 6 दशकों के राजनीतिक जीवन पर एक नजर डालते हुए उन्होंने कहा कि मेरे लिए इस देश का संविधान ही मेरा धर्मग्रंथ रहा है और संसद मंदिर। जनता की सेवा करना मेरा जूनून रहा है और मैंने इसे अपने धर्म की तरह निभाया है।

देश के तेरहवें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल आज समाप्त हो रहा है। उन्होंने अपने सम्मान में आयोजित विदाई समारोह से पहले राष्ट्र के नाम बतौर राष्ट्रपति अपना आखिरी सन्देश जारी किया। उन्होंने कहा कि अपने पूरे जीवनकाल में मैंने इस देश को जितना दिया, देश ने मुझे उससे कहीं ज्यादा दिया। आज मैं जो कुछ भी हूँ वो इस देश की वजह से हूँ और इसके लिए मैं देश की जनता का सदैव ऋणी रहूँगा।

अपने पिछले 6 दशकों के राजनीतिक जीवन पर एक नजर डालते हुए उन्होंने कहा कि मेरे लिए इस देश का संविधान ही मेरा धर्मग्रंथ रहा है और संसद मंदिर। जनता की सेवा करना मेरा जूनून रहा है और मैंने इसे अपने धर्म की तरह निभाया है। गौरतलब है कि प्रणब दा का बतौर राष्ट्रपति कार्यकाल 25 जुलाई को समाप्त हो रहा है और श्री रामनाथ कोविंद देश के अगले राष्ट्रपति निर्वाचित हुए हैं।

जीवन में सार्थकता और खुशहाली पर दिया जोर

अपने सम्बोधन में प्रणब दा ने ख़ुशी और सार्थक जीवन को हर नागरिक का कर्तव्य बताते हुए कहा कि हमें अपने हितों के साथ-साथ समाज और देश के हित में भी सार्थक कदम उठाने चाहिए। एक देश की उन्नति उसके नागरिकों और समाज की उन्नति से जुड़ी होती है। प्रणब दा ने गरीबों के सशक्तिकरण की जरुरत पर जोर देते हुए कहा कि कल्याण कि योजनाएं गरीबों तक पहुँचनी चाहिए। सरकार को ये तय करना होगा कि उसकी योजनाएं जमीनी पटल पर मूर्त रूप ले पाती हैं या नहीं। असली सशक्तिकरण तभी होगा जब योजनाएं वास्तव में समाज के वंचित वर्ग के आखिरी व्यक्ति तक पहुँचे।

हाल ही में बढ़ रही हिंसक घटनाओं पर चिंता जाहिर करते हुए उन्होंने कहा कि समाज को हिंसा मुक्त होना चाहिए। अपने कार्यकाल की शुरुआत में ही मैंने लोगों को सुरक्षा का भरोसा दिया था। एक अहिंसक समाज ही समाज की एकता और देश में लोकतंत्र के वजूद का प्रदर्शक होता है। देश की आत्मा विविधता में एकता और सहिष्णुता में निवास करती है। यह हमारी संस्कृति का मुख्य भाग रहा है। हम ‘सर्वधर्म समभाव’ की अवधारणा को मानने वाले देश के वासी हैं। हमें अपनी संस्कृति और सभ्यता के आधार पर विचार करने की जरुरत है।

प्रणब दा ने छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षा के स्तर को सुधारने पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों को नोट्स और सिलेबस से परे रचनात्मक और शोधपरक शिक्षा पर बल देना चाहिए। उन्होंने पर्यावरण के दूषित होने को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पर्यावरण सुरक्षा के लिए सबको साथ चलना होगा और मिलकर शीघ्रातिशीघ्र प्रभावी कदम उठाने होंगे।

About the author

हिमांशु पांडेय

हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है।

मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।

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