Wed. Dec 7th, 2022
    तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा

    चीन ने बुधवार को दस्तावेज जारी कहा कि साल 2018 में तिब्बत की जीडीपी 22 अरब डॉलर तक पंहुच गयी है। यह साल 1959 के आंकड़ों की तुलना में 191 गुना अधिक है। तिब्बत के आध्यात्मिक गुरु साल 1959 में तिब्बत से भागकर भारत आये थे। उनके निर्वासन को 60 वर्ष पूरे हो चुके हैं।

    तिब्बत की जनता की कड़ी मेहनत के कारण कृषि और पशुपालन में आज आधुनिकरण हो गया है। सिन्हुआ एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, कृषि, वन, पशुपालन, मछली पालन और सुविधा उद्योग के अतिरिक्त मूल्य में साल 1959 में 128  मिलियन युआन से बढ़कर आज साल 2018 में 13.41 अरब युआन हो गयी है।

    जारी दस्तावेज एक अनुसार तिब्बत का आधुनिक उद्योग में वृद्धि का ग्राफ निरंतर बढ़ता जा रहा है। तिब्बत के उद्योग का मूल्य साल 1959 में 15 मिलियन युआन था और अब 11.45 अरब युआन हो गया है।

    तिब्बत के 10000 से अधिक किसान और चरवाहे पर्यटन से काफी कमाते हैं। तिब्बत अब अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन का केंद्र बन गया है। तिब्बत में ढांचागत सुविधाओं में सुधार हुआ है। राजमार्ग, रेलवे और मार्गों को जोड़कर एक व्यापक परिवहन नेटवर्क का निर्माण किया गया है।

    दलाई लामा से क्यों चिढ़ता है चीन?

    18 अप्रैल 1959 को भारत पहुंचे दलाई लामा
    18 अप्रैल 1959 को भारत पहुंचे दलाई लामा

    दलाई लामा का होना ही विश्व को यह दिखाता है कि वे चीन से तिब्बत भागकर अब निर्वासन में रह रहे हैं और तिब्बत पर चीन नें कब्ज़ा कर लिया था। दलाई लामा का निर्वासन यह जाहिर करता है कि तिब्बत के लोगों नें चीन का अधिकार स्वीकार नहीं किया है।

    इसके अलावा दलाई लामा विश्व में कहीं भी जाते हैं, तो उनका बहुत स्वागत होता है। यह साफ़ दिखाता है कि वे एक इज्जतदार नेता हैं और विश्व उन्हें ही तिब्बत का असली उत्तराधिकारी मानता है।

    ऐसा मानना है कि लोग उनका सम्मान सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि वे तिब्बत के गुरु हैं। ऐसे में तिब्बत को दलाई लामा के साथ जोड़कर देखा जाता है।

    जब दलाई लामा भारत आये थे, तब उनकी वजह से भारत और चीन के बीच रिश्ते नाजुक हो गए थे और दोनों देश युद्ध में भी चले गए थे।

    इसी दौरान यह भी कहा जाता है कि अमेरिका नें दलाई लामा की मदद लेकर चीन में घुसपैठ करने की कोशिश की थी।

    इसी दौरान 80 के दशक में दलाई लामा अमेरिका और भारत का सहारा लेकर तिब्बत की आजादी की मांग करते थे। यह मांग हालाँकि अब कम हो गयी है, लेकिन दलाई लामा का तिब्बत से नाता कभी भी टूट नहीं सकता है।

    ऐसे में जब भी विश्वभर में कहीं भी दलाई लामा को बुलाया जाता है, तो चीन गुस्सा होता है क्योंकि दलाई लामा की उपस्थिति ही कहीं ना कहीं तिब्बत की आजादी की सोच पैदा करती है।

    हाल के समय में भारत सरकार नें दलाई लामा को अरुणाचल प्रदेश जाने की अनुमति भी दी थी, जिसे चीन दक्षिणी तिब्बत कहता है। ऐसे में चीन नें उस समय काफी विरोध प्रदर्शन किया था।

    दलाई लामा नें हाल ही में यह साफ़ किया था कि उनकी मौत के बाद अगला दलाई लामा भारत से हो सकता है।

    By कविता

    कविता ने राजनीति विज्ञान में स्नातक और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। वर्तमान में कविता द इंडियन वायर के लिए विदेशी मुद्दों से सम्बंधित लेख लिखती हैं।

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