गुरूवार, फ़रवरी 27, 2020

भारत में दलाई लामा के निर्वासन को हुए 60 वर्ष, तिब्बत में चीन से आज़ादी की लौ हुई मंद

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कविता
कविता ने राजनीति विज्ञान में स्नातक और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। वर्तमान में कविता द इंडियन वायर के लिए विदेशी मुद्दों से सम्बंधित लेख लिखती हैं।

तिब्बत के धर्मगुरु दलाई लामा को स्थायी तौर पर भारत में निर्वासित हुए 60 वर्ष हो चुके हैं और तिब्बत में आज़ादी की मशाल बूझ सी रही है। तिब्बत में कार्य के लिए दलाई लामा को नोबेल प्राइज से भी सम्मानित किया जा चुका है। इसके बाद वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सेलिब्रिटी बनकर उभर गए थे। हालांकि वक्त के साथ ही बीजिंग का प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है।

चीन ने तिब्बत के अंदर अपने खिलाफ आवाज़ उठाने वाले सभी संघठनो को कुचल दिया है। तिब्बत अध्ययन के विशेषज्ञ नाथन हिल ने कहा कि “तिब्बत की किस्मत अब बीजिंग की हाथ में हैं। तिब्बत के बाहरी इलाकों में रहने वाले तिब्बती लोग अपने देश की किस्मत से वाकिफ नहीं है, इसमें दलाई लामा भी शामिल है।”

tibet dalai lama

साल 2007 में तिब्बत के धार्मिक नेता ने कहा था कि “उनका मातृभूमि बीते 2000 वर्षों में सबसे बुरे दिनों से जूझ रही है।” साल 2008 में तिब्बत में व्यापक प्रदर्शन हुए थे और चीन ने क्रूरता से इसका प्रतिकार किया था। अमेरिका में तिब्बत के अंतर्राष्ट्रीय अभियान के कैट सौंडर्स ने कहा कि “आपने उस तरीके के प्रदर्शन कभी नहीं देखा होगा। तिब्बती जनता दलाई लामा के अहिंसक सन्देश पर अडिग है।”

दलाई लामा का अभियान का मुख्य फोकस स्वतंत्रता के बजाये स्वायत्तता थी। चीन के साथ बातचीत का सिलसिला साल 2010 स्थगित हो गया। अफवाहों के मुताबिक चीन इस बेबुनियादी वार्ता को खींच रहा था ताकि हत्याओं के मामले में अंतर्राष्ट्रीय दबाव कम हो सके।

नास्तिक कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी इच्छा व्यक्त की है कि वह तिब्बती बौद्ध धर्म में दखलंदाज़ी करेंगे। जैसे पंचेन लामा जो अगले दलाई लामा के चयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। दलाई लामा ने पंचेन लामा के तहत जिस बच्चे का चयन किया था वह छह वर्ष की आयु से चीनी विभाग की हिरासत में हैं। साल 1995 में तिब्बत में चीन ने अपने उम्मीदवारों को उतारा था।

tibet

निर्वासित नेता अभी भी काफी मशहूर प्रवक्ता थे लेकिन साल 2016 के बाद उन्होंने वैश्विक नेताओं से मुलाकात बंद कर दी थी। कई सरकार चीन के क्रोध के कारण दलाई लामा को न्योता देने ही हिचकिचाती है। तिबाटोलॉजिस्ट कटिया बुफ्फतरिले ने कहा कि “पश्चिमी देशों में साल 1980 के दशक में तिब्बत को लेकर जो जूनून था, वह अब कम होता जा रहा है।”

साल 1959 में भारत ने दलाई लामा को शरण दी थी, जब वह एक सैनिक के लिबास में हिमालय को पार कर गए थे। भारत अब अपनी प्रतिबद्धताओं से यू टर्न ले रहा है। सरकार भी कूटनीतिक संवेदनशीलताओं का हवाला देकर अधिकारीयों को दलाई लामा के समारोह में न शरीक होने की हिदायत देती है।

तिब्बत वासियों को अपने परम्पराओं को जीवित रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। तिब्बत के नागरिक पुलिस के राज में रह रहे हैं। अगर वह पाबंदियों को चुनौती देते हैं तो परिणाम बेहद बुरे मिलते हैं।

दक्षिण पंथी समूहों के मुताबिक चीन की सरकार प्रदर्शनकारियों के परिवार और दोस्तों को निशाना बना रही है। बीजिंग दावा करता है कि तिब्बत आज़ादी का आनंद उठा रहा है और वह हिमालय क्षेत्र में आर्थिक वृद्धि कर रहा है। वही चीन अल्पसंख्यक उइगर मुस्लिमों का भी अंत करने पर तुला हुआ है।

कई स्थानीय लोगों के मुताबिक चीन उनके धर्म को कुचल रहा है और उनकी संस्कृति को मिटा रहा है लेकिन आर्थिक प्रगति वृद्धि हो रही है। हर वर्ष तिब्बत की यात्रा करने वाले फ्रांकोइस रोबिन ने कहा कि “चीन हमेशा तिब्बत में आर्थिक वृद्धि का हवाला देकर स्वतंत्रता की बात को प्रभावी तौर पर दरकिनार कर देता है।”

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