शुक्रवार, फ़रवरी 28, 2020

तालिबान के साथ अमेरिका के शान्ति समझौते की जल्दबाज़ी पर भारत है सचेत

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कविता
कविता ने राजनीति विज्ञान में स्नातक और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। वर्तमान में कविता द इंडियन वायर के लिए विदेशी मुद्दों से सम्बंधित लेख लिखती हैं।

अमेरिका (america) और तालिबान (taliban) के बीच नए चरण की वार्ता क़तर में शुरू हो चुकी है और भारत आतंकी समूह के साथ वांशिगटन के जल्दबाज़ी के समझौते के प्रति सचेत हैं। अमेरिका अफगान के बेहतर हितो से ज्यादा समयसीमा पर ध्यान दे रहा है। बुधवार को सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्य सईद अकबरुद्दीन ने कहा कि “पाकिस्तान में आतंकवादियों के लिए सुरक्षित पनाह को बंद करना शान्ति समझौते की पहली शर्त होनी चाहिए।”

अफगानिस्तान की गुरह जंग के अंत के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के स्वागत करते हुए उन्होंने कहा कि “हम देश सकते  हैं कि कुछ लोग तत्कालिता के भाव से प्रेरित है लेकिन यह अफगानी लोगो की जरूरतों के मुताबिक नहीं है। आतंकी संघठनो को पाकिस्तान से मिली सुरक्षित पनाह की मज़बूत गारंटी के साथ बातचीत करने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए।”

अकबरुद्दीन ने अमेरिका और पाकिस्तान का नाम नहीं लिया लेकिन यह सन्देश स्पष्ट है। उन्होंने कहा कि “हम इस बात की अनदेखी नहीं कर सकते कि समूह समर्थन का मजा ले रहा है और सुरक्षित ठिकाने सीमाओं से हिंसक और आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दे रहा है। उन्हें फायदे से बातचीत करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।”

उन्होंने कहा कि “आतंकी नेटवर्क के लिए प्रदान की गयी पनाहों और सुरक्षित ठिकानों को वास्तविक और स्थायी शांति के लिए नष्ट करना चाहिए। तालिबान, हक्कानी नेटवर्क, इस्लामिक स्टेट, अलकायदा और इसके अभियुक्त सहयोगी, लश्कर  ए -तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद का अंत करने की जरूरत है।”

वाशिंगटन तालिबान के साथ एक शांति समझौता करने की कोशिश में हैं ताकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अफगानिस्तान में अमेरिकी भागीदारी को समाप्त करने और अगले साल के चुनाव से पहले अफगान में तैनात सैनिकों को वापस लाने के अपने चुनावी वादे को पूरा कर सके।

हाल ही में वार्ता की गति तीव्र हुई है और तालिबान नेताओं और जलमय ख़लीलज़ाद के बीच वार्ता का एक महत्वपूर्ण दौर दोहा में इस सप्ताह शुरू होगा। दोनों पक्ष अमेरिकी सेना की वापसी पर सहमत हुए हैं।

तालिबान के वार्ताकारों के प्रवक्ता ने मंगलवार को ट्वीट किया था कि अमेरिका ने अपने सैनिकों को बाहर निकालने पर सहमति व्यक्त की थी। लेकिन खलीलजाद ने एक ट्वीट में स्पष्ट किया कि अमेरिका ने “एक व्यापक शांति समझौते की मांग की, न कि एक वापसी समझौते की मांग की थी।”

अफगानी वार्ताकार खलीलज़ाद ने पिछले महीने वार्ता पर भारतीय अधिकारियों के साथ बातचीत के लिए नई दिल्ली का दौरा किया था।

अमेरिकी मिशन के समन्वयक रोडनी हंटर ने सुरक्षा परिषद में कहा कि “अमेरिका ने तालिबान से साफ़ कर दिया है कि हम अपनी सेना को कमतरी के लिए तैयार हैं हालांकि, हम संख्या या समयसीमा पर सहमत नहीं हैं। किसी भी शांति समझौते के लागू होने के लिए अफगानिस्तान सरकार को सीधे तालिबान के साथ बातचीत करनी होगी।”

अफगानिस्तान के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिनिधि तदमची यामामोटो ने कहा कि “तालिबान के लिए संदेश स्पष्ट है कि  वार्ता की टेबल पर आये और सीधे अफगान सरकार के साथ बातचीत करें। सभी पक्ष इस पर सहमत हैं कि आतंकवाद पर यूएस-तालिबान की समझ को अंतिम रूप देने और विदेशी टुकड़ी की मौजूदगी, आंतरिक अफगान वार्ता और वार्ता के लिए दरवाजा खोलेगी।”

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