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तालिबान ने कहा: शांति समझौते के लिए अफगान राष्ट्रपति को हटना होगा

तालिबान ने शुक्रवार को कहा कि वे सत्ता पर एकाधिकार नहीं करना चाहते हैं। लेकिन जोर देकर यह भी कहा कि अफगानिस्तान में तब तक शांति नहीं होगी जब तक कि काबुल में नई सरकार नहीं बन जाती और राष्ट्रपति अशरफ गनी को हटा नहीं दिया जाता।

एसोसिएटेड प्रेस के साथ एक साक्षात्कार में तालिबान के प्रवक्ता और समूह की बातचीत करने वाली टीम के सदस्य सुहैल शाहीन ने आगे आने वाले समय में देश को लेकर विद्रोहियों के रुख के बारे में बातचीत की।

हाल के हफ्तों में अमेरिका और नाटो सैनिक अफगानिस्तान छोड़ने के साथ ही तालिबान ने देश के कई क्षेत्रों और सीमा पार के इलाकों पर कब्जा कर लिया है। अब कई प्रांतीय राजधानियों पर भी तालिमान के कब्ज़े के हालात नज़र आ रहे हैं। इस हफ्ते, शीर्ष अमेरिकी सैन्य अधिकारी, जनरल मार्क मिले ने कहा कि तालिबान के पास “रणनीतिक गति” है, और उन्होंने तालिबान के पूर्ण अधिग्रहण की संभावना से इंकार नहीं किया। लेकिन उन्होंने कहा कि यह ज़रूरी नहीं है। उन्होंने कहा कि “मुझे नहीं लगता कि अफ़ग़ानिस्तान को लेकर अंतिम इबारत लिख दी गई है।”

वे अफ़ग़ान जो वहन कर सकते हैं, वे इस डर से कि एक हिंसक माहौल अब अराजकता में बदल जाएगा, हज़ारों की संख्या में अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने के लिए वीज़ा के लिए आवेदन कर रहे हैं। अमेरिका-नाटो की सेनाओं की वापसी भी 95% से अधिक पूरी हो चुकी है। शाहीन ने कहा कि तालिबान अपने हथियार तभी डालेगा जब काबुल में संघर्ष में शामिल सभी पक्षों को स्वीकार्य बातचीत की सरकार स्थापित हो जाएगी और अशरफ गनी की सरकार चली जाएगी।

शाहीन तालिबान के अपने पांच साल के शासन को भी शामिल करते हुए एक मूल्यांकन में कहा कि, “मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि हम सत्ता के एकाधिकार में विश्वास नहीं करते हैं क्योंकि अतीत में अफगानिस्तान में सत्ता पर एकाधिकार करने की मांग करने वाली कोई भी सरकार सफल नहीं रही है। इसलिए हम उसी फॉर्मूले को दोहराना नहीं चाहते हैं।”

शाहीन ने अशरफ गनी के शासन के अधिकार को खारिज किया। शाहीन का कहना है कि अशरफ गनी की 2019 की चुनावी जीत व्यापक धोखाधड़ी से ही मुमकिन हो पायी थी। उस चुनाव के बाद, अशरफ गनी और उनके प्रतिद्वंद्वी अब्दुल्ला अब्दुल्ला दोनों ने खुद को राष्ट्रपति घोषित कर दिया था। हालांकि एक समझौते के बाद, अब्दुल्ला अब अशरफ सरकार में दूसरे नंबर पर हैं और सुलह परिषद के प्रमुख हैं।

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आदित्य सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास का छात्र। खासतौर पर इतिहास, साहित्य और राजनीति में रुचि।

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