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टीआरपी क्या है? टीआरपी की फुल फॉर्म क्या है?

टीआरपी

टीआरपी (trp in hindi) एक प्रकार की गणना होती है, जिसमें यह नापा जाता है कि किसी एक जगह में कितने लोग टीवी में किस चैनल को दिन में कितनी देर देखते हैं।

टीआरपी नापने के लिए एक इलाके के कुछ घरों के टीवी में एक उपकरण लगाया जाता है, जिससे यह पता लग जाता है कि उस टीवी में कौनसा चैनल कितनी देर देखा गया है? इसी से यह अंदाजा लगाया जाता है कि उस इलाके में मौजूद सभी घरों में लोग टीवी पर कौनसा चैनल कितनी देर देखते हैं।

टीआरपी उपकरण उस टीवी में देखे गए सभी प्रोग्राम के समय के साथ रिकॉर्ड कर लेता है। एक बार गणना करने के लिए कम से कम 30 दिनों का डेटा लिया जाता है।

टीआरपी की फुल फॉर्म (trp full form in hindi)

टीआरपी की फुल फॉर्म टारगेट रेटेड पॉइंट (TRP – Target rating point) होती है।

टारगेट रेटेड पॉइंट का मतलब है कि निश्चित इलाके में कितने बार एक निर्धारित प्रोग्राम देखा गया है।

टीआरपी का उपयोग (use of trp in hindi)

टीआरपी का उपयोग मुख्य रूप से टीवी पर विज्ञापन दिखाने के लिए किया जाता है।

विज्ञापन देने वाली कंपनियां पहले यह देखती हैं, कि इस निर्धारित चैनल को किसी एक इलाके में कितनी बार देखा जाता है और कितने देर के लिय देखा जाता है?

उदाहरण के तौर पर, गाँवों में स्टार प्लस, जी टीवी, आज तक जैसे चैनल सबसे ज्यादा देखे जाते हैं। इन कारणों से बड़ी कंपनियां अपने विज्ञापन ऐसे ही चैनलों को देती हैं।

आपने देखा होगा कि किसी महत्वपूर्ण क्रिकेट मैच को एक साथ करोड़ों लोग देखते हैं। इन चैनल की भी टीआरपी मापी जाती है, और उसी पर निर्धारित उनपर विज्ञापन चलाये जाते हैं।

उदहारण के तौर पर यदि किसी चीज को ज्यादा लोग देख रहे हैं, तो उस चैनल पर विज्ञापन चलाने के लिए भी ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं। जब कोई विश्व कप आदि का फाइनल चलता है, तो उसें दिखने वाले विज्ञापन चंद सेकंड दिखने के लिए लाखों रूपए खर्च करते हैं।

कंपनियां टीआरपी का इस्तेमाल कैसे करती हैं?

जब किसी कंपनी को किसी इलाके में टीवी पर अपने विज्ञापन दिखाने होते हैं, तो वह कंपनी उस इलाके का टीआरपी डेटा एकत्रित करती है।

अब कंपनी यह निर्धारित करती है, कि प्रत्येक व्यक्ति के विज्ञापन देखने से उसको औसतन कितना फायदा होगा? इसके बाद उस इलाके में टीवी देखने वाले लोगों का डेटा एकत्रित किया जाता है।

इन दोनों को गुणा करने के बाद जो संख्या आती है, कंपनी उस हिसाब से अपने विज्ञापन चैनल को देती है और उसके पैसे देती है।

इसी प्रकार इन्टरनेट पर विज्ञापन दिखाने के लिए कंपनियां व्यूज या इम्प्रैशन का उपयोग करती हैं। इनका मतलब भी यही होता है कि किसी विज्ञापन को कितने लोग देखते हैं?

इसी के आधार पर विज्ञापन की कीमत निश्चित की जाती है।

यदि इस लेख से सम्बंधित आपका कोई सवाल या सुझाव है, तो आप उसे नीचे कमेंट में लिख सकते हैं।

About the author

पंकज सिंह चौहान

पंकज दा इंडियन वायर के मुख्य संपादक हैं। वे राजनीति, व्यापार समेत कई क्षेत्रों के बारे में लिखते हैं।

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