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मर्केल युग की समाप्ति के बाद जर्मनी और भारत कैसे बढ़ा सकते हैं सतत विकास कार्यक्रम

जबकि कई वैश्विक संकटों की लड़ाई अपने चरम पर है तब पिछले 16 वर्षों से जर्मनी की चांसलर के रूप में एंजेला मर्केल का युग अब समाप्त हो रहा है। मर्केल-युग के अंत का प्रतीक 26 सितंबर को संपन्न हुए संघीय चुनावों ने वर्तमान में एक अप्रत्याशित राजनीतिक भविष्य को जन्म दिया है। जैसे कि जर्मनी जलवायु परिवर्तन सहित वैश्विक चुनौतियों के खिलाफ लड़ाई में एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय एजेंट के रूप में अपनी भूमिका को कैसे परिभाषित करेगा, और संयुक्त राष्ट्र के 2030 एजेंडा के अनुरूप वैश्विक सतत विकास को कैसे बढ़ावा देगा?

जलवायु परिवर्तन, संसाधनों का विनाश और प्रजातियों का विलुप्त होना विकास के अवसरों और कार्रवाई के वैश्विक दायरे को पहले से कहीं अधिक सीमित कर रहा है। भारत और क्षेत्रीय शक्तियों सहित प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं, पश्चिम के ‘पुराने’ देशों के अलावा, लंबे समय से एक अधिक जटिल, गतिशील, त्वरित दुनिया की आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक अन्योन्याश्रितताओं को आकार दे रही हैं। अब यह जलवायुब से जुड़े कामों को अंजाम तक लाने का समय है: जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के नुकसान, बढ़ती सामाजिक असमानताओं और गरीबी से लड़ने, लोकतंत्र की रक्षा करने और शांति सुरक्षित करने का समय आ गया है।

मुख्य भूमिकाएँ जल्द ही

जर्मनी और भारत आने वाले दो वर्षों में मुख्य भूमिकाएँ निभाते दिखाई देंगे: जर्मनी, विश्व स्तर पर दूसरे सबसे बड़े द्विपक्षीय विकास फण्ड दाता के रूप में (संयुक्त राज्य अमेरिका पहले स्थान पर है), 2022 में जी7 की अध्यक्षता करेगा। वहीं भारत 2023 में जी20 की अध्यक्षता करेगा। ये क्लब गवर्नेंस की प्रक्रियाओं को पारस्परिक रूप से मजबूत करने और हमारे राजनीतिक नेताओं के बीच एक केंद्रित संवाद को बढ़ावा देने और एक सामान्य भविष्य के लिए नीति बनाने का अवसर प्रदान करते हैं।

बदलाव की ओर बढ़ते कदम

जर्मनी की इस जिम्मेदारी को निभाने की क्षमता हाल के चुनावों और गठबंधन वार्ता के परिणाम पर निर्भर करती है। पिछले 16 वर्षों में सतत विकास के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का क्षेत्र संयुक्त राष्ट्र के सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों से स्थानांतरित हो गया है जो न्यू यॉर्क में निम्न और मध्यम आय वाले देशों तक पहुंचने के मानकों के रूप में तैयार किए गए थे। इनकी शुरआत इस समझ के लिए की गयी थी कि गरीबी और बढ़ती असमानताओं को दूर करना और पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन प्रक्रियाओं का मुकाबला करने के साथ-साथ चलता है। ‘विकास’ को ‘सतत विकास’ के रूप में फिर से परिभाषित किया गया था और इस प्रकार, सभी देशों और सभी सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में एक चुनौती के रूप में संबोधित किया जाना था। सतत विकास को प्राप्त करने के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है – जैसा कि पहले से कहीं अधिक स्पष्ट हो गया है।

आज, सतत विकास लक्ष्यों और पेरिस जलवायु समझौते के तैयार होने के छह साल बाद और वैश्विक महामारी में डेढ़ साल बाद, हमें वैश्विक भले के लिए और संयुक्त राष्ट्र के 2030 एजेंडे के अनुरूप मौलिक रूप से परिवर्तनकारी संरचनात्मक नीतियों की आवश्यकता है। विश्व व्यापार में अपनी हिस्सेदारी के मामले में तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में जर्मनी को अपनी जिम्मेदारी निभानी है और इन परिवर्तनों के लिए पाठ्यक्रम निर्धारित करना है। फिर भी यह केवल साझेदारी में और विशेष रूप से भारत सहित बड़ी संक्रमण अर्थव्यवस्थाओं के साथ साझेदारी में ऐसा कर सकता है। हमें ऐसी संरचनात्मक नीतियों की आवश्यकता है जो वैश्विक सामान्य भलाई को बढ़ावा दें। कार्रवाई के मुख्य क्षेत्रों में सामाजिक असमानताओं को कम करना, गरीबी पर काबू पाना और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना, सामाजिक शांति, राजनीतिक भागीदारी और सांस्कृतिक विविधता को बढ़ावा देना, एक जलवायु-तटस्थ और स्थिर आर्थिक प्रणाली बनाना, स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र, स्थिर जलवायु और जैव विविधता की जोरदार वकालत करना शामिल है।

कोविड-19 महामारी द्वारा जिन प्रमुख नीतिगत क्षेत्रों पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है, उन्हें फिर से उजागर किया गया है: हमें वित्तीय बाजारों, डिजिटलीकरण और अर्थव्यवस्था को टिकाऊ बनाने की आवश्यकता है; सामाजिक सुरक्षा, भोजन और स्वास्थ्य प्रणालियों को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है; सामाजिक एकता के लिए शिक्षा, विज्ञान और नवाचार, समावेशी संस्थानों को मजबूत करना और नियम-आधारित, क्षेत्रीय और बहुपक्षीय शासन को बढ़ावा देना भी ज़रूरी है।

ग्लासगो में सीओपी बैठक एक बड़ा अवसर

सामाजिक असमानताओं से लड़ने और जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने में – एक अंतरक्षेत्रीय खिलाड़ी के रूप में – भारत के साथ सहयोग का महत्वपूर्ण तोगडान है। उच्च आय वाले देशों में सकल घरेलू उत्पाद का 16%, मध्यम आय में 4% और कम आय वाले देशों में केवल 1% की राशि के साथ कोविड-19 महामारी का मुकाबला करने में वैश्विक अंतर, ग्रीनहाउस गैस में निरंतर वृद्धि को पूरा करते हैं। ग्लासगो में आगामी सीओपी26 इस प्रकार भारत के ऊर्जा, उत्सर्जनऔर परिवहन क्षेत्रों के ग्रीनहाउस गैस तटस्थ परिवर्तनों में निवेश पर बातचीत करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच के रूप में कार्य करता है।

एक स्थायी भविष्य के लिए एक वैश्विक सहयोग नीति को सामाजिक, पारिस्थितिक और आर्थिक परिवर्तन प्रक्रियाओं के बीच की गतिशीलता पर ध्यान देने के साथ एक ग्रहीय परिप्रेक्ष्य को अपनाना चाहिए। साथ ही विभागीय सीमाओं के पार संवाद विकसित करना और वैश्विक सामान्य भले के लिए परिवर्तनकारी संरचनात्मक नीति को व्यवस्थित रूप से आकार देना चाहिए। मर्केल के बाद के युग में जर्मनी को चांसलर के कार्यालय में बुद्धिमान नेतृत्व की आवश्यकता है जो युवा पीढ़ियों और दुनिया पर अपना ध्यान केंद्रित करे, भारत और दुनिया के साथ एक स्थायी भविष्य के लिए वैश्विक सहयोग नीतियों की तात्कालिकता को पहचाने और कैबिनेट टेबल पर उनका समर्थन करे। इस चुनाव को उसी के अनुसार मार्ग प्रशस्त करना होगा।

About the author

आदित्य सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास का छात्र। खासतौर पर इतिहास, साहित्य और राजनीति में रुचि।

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