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    गुजरात विधानसभा चुनाव

    कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी के तीन दिवसीय गुजरात दौरे का बुधवार, 27 सितम्बर को आखिरी दिन था। इन 3 दिनों में राहुल गाँधी ने सौराष्ट्र क्षेत्र का दौरा किया और छोटे-बड़े कई मंचों से जनता को सम्बोधित किया। इस पूरे दौरे के दौरान राहुल गाँधी की जो सबसे खास बात रही वो थी उनका हिंदुत्व की तरफ झुकाव। अपने गुजरात मिशन के पहले ही दौरे में राहुल गाँधी ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब कांग्रेस गुजरात के हिन्दुओं को साधने के लिए भाजपा का परंपरागत हिंदुत्व कार्ड खेलेगी। अपनी पूरे दौरे के दौरान राहुल गाँधी ने हिन्दू धर्म की राजनीति के इर्द-गिर्द ही ताना-बाना बुना और भाजपा से नाराज चल रहे वर्ग को मनाने की कोशिश की। राहुल गाँधी ने अपनी सौराष्ट्र यात्रा की शुरुआत द्वारका में भगवान् श्रीकृष्ण की पूजा-अर्चना से की थी।

    पूर्व निर्धारित रणनीति के तहत राहुल गाँधी अपने गुजरात दौरे के दौरान हर वक्त हिन्दू नेताओं से ही घिरे रहे। उनके गुजरात पहुँचने से पहले ही यह तय हो गया था कि कोई भी मुस्लिम नेता उनके आस-पास नहीं दिखेगा। सौराष्ट्र दौरे के दौरान पूरे समय गुजरात कांग्रेस प्रभारी अशोक गहलोत, कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी, कांग्रेस सचिव राजीव सातव और यूथ कांग्रेस अध्यक्ष राजा बरार ही कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी संग तस्वीरों में नजर आए। मतलब स्पष्ट है कि कांग्रेस शुरुआत से ही बेहद सतर्कता बरत रही है और अपना हश्र पिछले विधानसभा चुनावों की तरह नहीं होने देना चाहती। कांग्रेस ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाना चाहती है जिससे भाजपा या अन्य विरोधियों को यह भनक लगे कि वह चुनाव परिणाम पक्ष में आने पर अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बना सकती है।

    अहमद पटेल को आगे नहीं करना चाहती है कांग्रेस

    हाल ही में गुजरात में हुए राज्यसभा चुनाव बेहद चर्चित रहे थे। गुजरात राज्य से 3 राज्यसभा सीटों लके लिए हुए इस चुनाव में भाजपा की ओर से राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने दावेदारी की थी वहीँ कांग्रेस ने अहमद पटेल को उम्मीदवार बनाया था। दिग्गज कांग्रेसी शंकर सिंह वाघेला की बगावत के बाद बैकफुट पर नजर आ रही कांग्रेस को उस वक्त और गहरा झटका लगा जब कांग्रेस के सचेतक की भूमिका निभा रहे बलवंत सिंह राजपूत ने भाजपा का दामन थाम लिया। बलवंत सिंह राजपूत ने अहमद पटेल के खिलाफ सियासी जंग में उतर कांग्रेस आलाकमान के माथे पर शिकन ला दी थी। हालाँकि बड़ी ही मुश्किल से अहमद पटेल आधे वोटों के अंतर से अपनी राज्यसभा सीट बचाने में सफल रहे और उनकी जीत को कांग्रेस ने संजीवनी करार दिया।

    अहमद पटेल ने भले ही आधे मतों से जीत हासिल की हो पर उनकी इस जीत के बड़े मायने थे। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साम, दाम, दण्ड, भेद इस्तेमाल करने के बावजूद उन्होंने भाजपा का सियासी चक्रव्यूह भेद दिया था। उनकी जीत से गुजरात में कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ा था पर पार्टी उन्हें प्रचार अभियान से दूर रख रही है। पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में अहमद पटेल को मियाँ अहमद पटेल कहकर कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद का दावेदार बताया था और इसके बूते उन्होंने वोटों का ध्रुवीकरण कर लिया था। कांग्रेस इस बार अपना हश्र पिछले चुनावों जैसा नहीं होने देना चाहती, इसी वजह से अहमद पटेल को प्रचार अभियान से दूर रखा जा रहा है।

    सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था नवरात्रि में सौराष्ट्र दौरा

    यूँ तो पूरे गुजरात में ही नवरात्रि की धूम रहती है पर सौराष्ट्र क्षेत्र में इस दौरान दौरान माहौल कुछ ज्यादा ही भक्तिमय होता है। गुजरात के अधिकतर मंदिर भी इसी क्षेत्र में स्थित हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि नवरात्रि में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी का सौराष्ट्र दौरा महज एक इत्तेफाक नहीं वरन सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। राहुल गाँधी ने अपनी सौराष्ट्र यात्रा के दौरान कई जगहों पर मंदिरों में जाकर पूजा-अर्चना की और माथे पर त्रिपुण्ड और तिलक लगाए नजर आए। उन्होंने जनता को सम्बोधित करने के दौरान भी ऐसी वेशभूषा बनाए रखी जो उनके हिंदूवादी होने की गवाही दे। राहुल गाँधी ने सौराष्ट्र दौरे के दौरान माँ दुर्गा की पूजा की, द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की अर्चना की पर वह किसी मस्जिद क्यों नहीं गए या किसी मुस्लिम नेता से क्यों नहीं मिले, इस बात पर सब मौन हो जाते हैं।

    कांग्रेस की छवि शुरू से ही मुस्लिम हितैषी दल की रही है और इस वजह से उसे हिन्दू जनसँख्या बहुल राज्यों में हाशिए पर रहना पड़ा है। हालाँकि इस छवि का लाभ भी कांग्रेस को बराबर मिलता रहा है और मुस्लिम समाज को कांग्रेस का परंपरागत वोटबैंक माना जाता रहा है। लेकिन अब धीरे-धीरे मुस्लिम समाज धर्म आधारित राजनीति को छोड़कर विकास की राह पर जा रहा है। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की भारत यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अहमदाबाद की सिदी सैयद मस्जिद गए थे। इस बात पर बहुत बवाल मचा था और कांग्रेस समेत सभी विपक्षियों ने इसे भाजपा की तुष्टीकरण की राजनीति कहा था। ऐसे में कांग्रेस गुजरात में भाजपा से नाराज चल रहे पाटीदारों, दलितों और पिछड़े वर्ग को मनाने में जुटा हुआ है जिससे उनकी सियासी मुश्किलें आसान हो जाए।

    मोदी पर हमलावर रहे राहुल

    कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी अपने तीन दिवसीय सौराष्ट्र दौरे के दौरान गुजरात की सत्ताधारी भाजपा सरकार के साथ-साथ केंद्र की मोदी सरकार पर भी निशान साधा था। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपने सौराष्ट्र दौरे के आखिरी दिन राजकोट में लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा था, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बुरी आदत यह है कि वह किसी की सुनते नहीं हैं। अगर वह लोगों की बातें सुननी शुरू कर दें तो देश की आधी समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी।” राहुल गाँधी ने मोदी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा था कि नोटबंदी और जीएसटी को लागू करने जैसे फैसले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिना किसी सलाह-मशविरे के लिए थे। प्रधानमंत्री के इन फैसलों का खामियाजा आज देश भुगत रहा है और देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह हिल गई है।

    कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने कहा था कि भाजपा और कांग्रेस की विचारधाराओं में बहुत अंतर है। भाजपा सरकार ने कोई भी बड़ा कदम उठाने से पहले देश के लोगों या राजनीतिक दलों की राय नहीं ली जबकि कांग्रेस सरकार ने हमेशा ही किसी भी बड़ी योजना को लागू करने से पहले देश की जनता का विचार जाना। उन्होंने कहा कि भाजपा में सिर्फ अच्छे वक्ता है पर कांग्रेस में अच्छे श्रोता हैं। इसी वजह से कांग्रेस देश की जनता से जुड़ पाई थी और उनके हितों को ध्यान में रखकर कोई भी कदम उठाती थी। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपने भाषणों से ना केवल गुजरात सरकार पर हमला बोला बल्कि केंद्र की सत्ताधारी मोदी सरकार को भी आड़े हाथों लिया। इससे स्पष्ट है कि राहुल गाँधी गुजरात विधानसभा चुनावों को 2019 लोकसभा चुनावों की शुरुआत मान रहे हैं और इसे ध्यान में रख कर आगे बढ़ रहे हैं।

    By हिमांशु पांडेय

    हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है।मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।