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गुजरात विधानसभा चुनाव : ओबीसी मतदाताओं को साध पाटीदारों की कमी पूरी करेगी भाजपा

नरेंद्र मोदी और अमित शाह
कांग्रेस के लिए यह चुनाव वजूद बचाए रखने का चुनाव है वहीं भाजपा के लिए यह चुनाव बादशाहत बनाए रखने का चुनाव है। यह बात भी स्पष्ट है कि गुजरात विधानसभा चुनावों पर भाजपा, कांग्रेस ही नहीं वरन सभी राजनीतिक दलों की निगाहें जमी होंगी और इसके परिणाम ही देश की राजनीति की दिशा तय करेंगे।

गुजरात में वर्ष के आखिर तक विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। सभी दल अपनी-अपनी चुनावी रणनीति तैयार करने में लगे हुए हैं। सत्ताधारी दल भाजपा गुजरात में पिछले 19 सालों से सत्तासीन है। बतौर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दौरान गुजरात ने हर क्षेत्र में तरक्की की थी और वह देश का सबसे समृद्धशाली राज्य बन गया था। देश के किसी भी कोने में हो रहे विकास की तुलना गुजरात से की जाती थी और नरेंद्र मोदी के “गुजरात मॉडल” की देशभर में मिसालें दी जाती थी। 2002 में गोधरा में हुए दंगों की वजह से नरेंद्र मोदी की छवि धूमिल हुई थी और उन्हें सांप्रदायिक कहा जाने लगा था। अपनी इस छवि को उन्होंने बड़ी ही बखूबी से “विकास पुरुष” की छवि से ढका और धीरे-धीरे सियासत के राष्ट्रीय पटल का जाना-माना चेहरा बन गए। उनके शासनकाल में भाजपा ने गुजरात विधानसभा चुनावों में लगातार एकतरफा जीत दर्ज की।

नरेंद्र मोदी ने गुजरात में उद्योग-धंधों को बढ़ावा दिया और राज्य में रोजगार के अवसर पैदा किए। उनके शासनकाल के दौरान गुजरात ने काफी तरक्की की और वह देश का सर्वाधिक रोजगार उपलब्ध कराने वाला राज्य बन गया। 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद नरेंद्र मोदी गुजरात की सियासत छोड़कर केंद्र के सिंहासन पर बैठ गए और देश के प्रधानमंत्री बन गए। उनके गुजरात छोड़ने के बाद से ही गुजरात में भाजपा की पकड़ ढीली होने लगी थी। प्रधानमंत्री के दाहिने हाथ कहे जाने वाले अमित शाह ने भाजपा अध्यक्ष का पद संभाल लिया और वह पूरे देश के हालातों पर नजर रखने लगे। अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा कांग्रेस द्वारा लाए गए भ्रष्टाचार के अँधेरे में चिराग बनकर चमकी। अमित शाह के करिश्माई नेतृत्व की रोशनी पूरे देश में बिखरी पर चिराग तले अँधेरा छाने लगा। गुजरात भाजपा का संगठन कमजोर होने लगा और जनता में असंतोष बढ़ने लगा।

गुजरात विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए राह इतनी आसान नहीं रहने वाली है। भाजपा का पारंपरिक आधार पाटीदार वोटबैंक कहीं दूर खिसक चुका है और मुख्यमंत्री के रूप में विजय रुपाणी प्रभावी नहीं रहे है। ऐसा नहीं है कि विजय रुपाणी का कार्यकाल खराब रहा है पर अगर उनकी तुलना नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री कार्यकाल से करें तो वह कहीं नहीं ठहरते। इसके अतिरिक्त अन्य अहम मुद्दे जो भाजपा की जीत की राह में रोड़ा बन सकते हैं, नीचे वर्णित हैं –

कमजोर मुख्यमंत्री, असंतुष्ट जनता

नरेंद्र मोदी के बाद अमित शाह ही ऐसे नेता थे जो गुजरात भाजपा में दमखम रखते थे। राजनाथ सिंह ने गृह मंत्री के बाद भाजपा अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और नरेंद्र मोदी के विश्वासपात्र अमित शाह भाजपा के अध्यक्ष चुने गए। गुजरात को आनंदीबेन पटेल के हाथों में सौंपकर भाजपा ने महिला सशक्तीकरण के नारे को बुलंद करने की कोशिश की। आनंदीबेन पटेल गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री बनी। भाजपा ने उनको कमान सौंपकर अपने परंपरागत पाटीदार मतदाता वर्ग को साधने का प्रयास भी किया। आंनदीबेन पटेल ने 75 वर्ष की आयु पूरी होने के पश्चात मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और उनकी जगह विजय रुपाणी को गुजरात का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया। विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री बनाकर भी भाजपा ने वोटबैंक साधने की ही कोशिश की थी।

दरअसल नरेंद्र मोदी और अमित शाह के बाद गुजरात भाजपा के पास कोई ऐसा चेहरा नहीं था जो पार्टी को अपने कन्धों पर आगे ले जा सके। नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में किसी भी अन्य भाजपा नेता को इतनी लोकप्रियता ही नहीं मिली कि वह पुरे सूबे का प्रतिनिधित्व कर सके। गुजरात के नाम पर लोगों के जेहन में सिर्फ एक ही नाम आता था और वह था नरेंद्र मोदी। अमित शाह के राज्यसभा जाने के बाद अब गुजरात भाजपा की स्थिति भी गुजरात कांग्रेस जैसी हो गई है। भाजपा को नरेंद्र मोदी और अमित शाह के चेहरे पर वोट तो मिल जाएंगे पर सवाल यह है कि क्या राज्य को फिर एक बार नरेंद्र मोदी जैसा करिश्माई नेतृत्व मिल सकेगा?

पाटीदार आन्दोलन ने खड़ी की मुश्किलें

नरेंद्र मोदी के गुजरात की कुर्सी छोड़कर प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही गुजरात में पाटीदार समाज में आरक्षण की मांग उठने लगी। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री रहते यह मांग कभी सतह तक नहीं आई थी। इस वजह से उन्हें इस बात का अंदाजा था या नहीं यह कहना मुश्किल है। अमित शाह के भाजपा अध्यक्ष पद संभालने और गुजरात छोड़ने के कुछ समय बाद ही पाटीदार समाज के लाखों लोग युवा नेता हार्दिक पटेल के नेतृत्व में सडकों पर उतर गए। पाटीदार समाज गुजरात भाजपा के परंपरागत वोटबेंकों में से एक था और इसलिए यह आन्दोलन भाजपा के लिए खतरे की घंटी था। पाटीदार समाज गुजरात के समृद्ध वर्गों में गिना जाता है और इसका आलीशान गाड़ियों से उतरकर आरक्षण मांगना सबकी समझ से परे था। हालाँकि विपक्षी दलों ने इसका लाभ उठाने की पूरी कोशिश की और खुद को पाटीदार समाज का हिमायती बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

गुजरात में पाटीदार समाज के मतदाताओं की संख्या कुल मतदाताओं की संख्या का 22 फीसदी है। इस लिहाज से पाटीदार समाज का समर्थन गुजरात की सत्ता तक पहुँचने के लिए कितना महत्वपूर्ण है यह सभी दल जानते हैं। भाजपा अभी तक पाटीदार समाज के प्रतिनिधियों को मनाने में कामयाब नहीं हुई है और यह उसके लिए भरी पद सकता है। हालाँकि भाजपा ने पाटीदार समाज के रुष्ट होने बिगड़े अपने जातीय समीकरणों को साधने के लिए अन्य विकल्पों की ओर देखना शुरू कर दिया है। पर एक मुद्दे के आधार पर अगर कोई आपके परंपरागत वोटबैंक में सेंधमारी कर जाए तो यह पार्टी के कमजोर होते संगठन को दर्शाता है। भाजपा को भविष्य में ऐसी किसी भी स्थिति से बचने के लिए तैयार रहना होगा वरना यह उसके अभेद्द्य दुर्ग की दीवार ढहने की शुरुआत हो सकती है।

अहमद पटेल निभा सकते हैं अहम भूमिका

हालिया सम्पान गुजरात राज्यसभा चुनावों के वक्त भाजपा की लाख कोशिशों और साम, दाम, दण्ड और भेद के सभी तरीके अपनाने के बावजूद कांग्रेस के चाणक्य कहे जाने वाले अहमद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का चक्रव्यूह भेदने में सफल रहे थे। उनकी जीत को गुजरात कांग्रेस के लिए संजीवनी कहा गया था। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल गुजरात से आते हैं और वह राजीव गाँधी के निकटतम सहयोगियों में से एक रहे हैं। उन्हें कांग्रेस में वही मुकाम हासिल है जो इंदिरा गाँधी के जमाने में प्रणब मुखर्जी को हासिल था। बगावत से जूझ रही गुजरात कांग्रेस में अहमद पटेल की जीत ने गुजरात विधानसभा चुनावों से पूर्व नया उत्साह भर दिया है। अब कांग्रेस के लिए अहमद पटेल विधानसभा चुनावों में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

दिग्गज कांग्रेसी नेता शंकर सिंह वाघेला की बगावत के बाद गुजरात कांग्रेस में बगावत खुलकर सतह पर आ गई थी। शंकर सिंह वाघेला के पीछे-पीछे 14 विधायकों ने पार्टी छोड़ दी और उनमें से कुछ तो भाजपा में भी शामिल हो गए। शंकर सिंह वाघेला के जाने के बाद गुजरात कांग्रेस के पास ऐसा कोई लोकप्रिय चेहरा नहीं बचा जिसकी जनता में पकड़ हो और जो अपने दम पर पार्टी को विधानसभा चुनावों में जीत दिला सके। अहमद पटेल को संगठन का अच्छा-खासा अनुभव है और वह बिखरी हुई गुजरात कांग्रेस को साथ ला सकते हैं। कांग्रेस अहमद पटेल को गुजरात विधानसभ चुनावों में मुख्यमंत्री का चेहरा बनाकर आगे कर सकती है और वर्तमान परिदृश्य में कांग्रेस के पास इससे बेहतर और कोई विकल्प नजर नहीं आता है। ऐसे हालातों में भाजपा के लिए परिस्थितियां और बिगड़ सकती हैं और उसकी बादशाहत पर भी खतरा आ सकता है।

जातीय समीकरण साधने में जुटी भाजपा

भाजपा आलाकमान आजकल गुजरात में सरकार से नाराज चल रहे पाटीदार समाज के परंपरागत वोटबैंक के खिसकने की वजह से हुए नुकसान की भरपाई को लेकर चिंतित है। पाटीदार समाज के मतदाताओं की संख्या कुल मतदाताओं की संख्या का 22 फीसदी है और राज्य की कई सीटों पर इनका सीधा हस्तक्षेप है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने चुनावी गणित को ध्यान में रखकर जातीय समीकरणों को साधना शुरू कर दिया है। गुजरात हिन्दू बाहुल्य राज्य है और यहाँ की 88 फीसदी आबादी हिन्दू है। 9 फीसदी आबादी मुसलमानों की है और शेष 3 फीसदी आबादी में अन्य धर्मों के लोग है। इससे एक बात स्पष्ट है कि हमेशा की तरह हिंदुत्व का असर इस बार भी चुनावों पर रहेगा।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ अहमदाबाद की सिदी सैयद मस्जिद गए थे। प्रधानमंत्री बनने के बाद यह पहली बार था जब मोदी किसी मस्जिद गए हो। उनके इस कदम की कई हिन्दू संगठनों ने आलोचना की थी। कांग्रेस ने इसे भाजपा की तुष्टिकरण की राजनीति करार दिया था और कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण करना चाहते है। हालाँकि ट्रिपल तलाक मुद्दे पर भी प्रधानमंत्री मोदी मुस्लिम महिलाओं का पक्ष ले चुके हैं और हर मंच पर उन्होंने मुस्लिम महिलाओं के हक की बात को आगे रखा है। वजह चाहे जो भी हो पर मुस्लिम बिरादरी में नरेंद्र मोदी और भाजपा की छवि सुधर रही है और भाजपा इस मौके को भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहेगी।

ओबीसी वर्ग अदा करेगा बड़ी भूमिका

गुजरात विधानसभा में कुल 182 सीटें हैं। इन 182 सीटों में से 70 सीटों पर ओबीसी वर्ग के मतदाताओं का बड़ा जनाधार है। मुस्लिम मतदाता 35 सीटों पर बाहुल्य में हैं वहीं 26 सीटें आदिवासी बाहुल्य मतदाता क्षेत्र की हैं। 13 सीटों पर दलित वर्ग बाहुल्य मतदाता हैं और 13 सीटों पर ही सवर्ण मतदाताओं का जनाधार है। हार्दिक पटेल के आन्दोलन के बाद भाजपा गुजरात में थोड़ा असहज महसूस कर रही है। निश्चित तौर पर पाटीदार आन्दोलन को मिले जनसमर्थन ने भाजपा के माथे पर शिकन ला दी है। भाजपा अपने परंपरागत वोटबैंक कहे जाने वाले पाटीदार समाज के खिसकने के बाद अब ओबीसी वर्ग को साध रही है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसकी रूपरेखा तैयार करने में जुटे हुए हैं। भाजपा गुजरात में 18 सितंबर को खेड़ा जिले के फगवेल में ओबीसी सम्मेलन का आयोजन कर रही है जिसमें अमित शाह समेत अनेक वरिष्ठ भाजपा नेता मौजूद होंगे।

राज्यभर में ओबीसी वर्ग के मतदाताओं तक पहुँचने के लिए भाजपा राज्य में 2 बड़ी यात्राओं की रुपरेखा बना रही है। पहली पहली यात्रा एक अक्टूबर को सरदार पटेल के जन्मस्थान करसमद से शुरू होगी जबकि दूसरी यात्रा 2 अक्तूबर को महात्मा गांधी की जन्मभूमि पोरबंदर से शुरू होगी। गुजरात सरकार के योजनाओं की जानकारी राज्य के लोगों तक पहुँचाने के लिए मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने राज्यभर में 12 दिनों तक चलने वाले नर्मदा महोत्सव यात्रा का आयोजन किया है। 17 सितम्बर को अपने जन्मदिन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात में होंगे और वह नर्मदा नदी पर बने बांध के नवनिर्मित गेट का उद्घाटन करेंगे। भाजपा राज्यभर में लोगों को यह बता रही है कि ओबीसी आरक्षण में सुधारों की उसकी संतुस्तियों का कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने विरोध किया था जिस वजह से ओबीसी कोटे के अंतर्गत आने वाली सभी जातियों को जातिगत आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा है।

एक बात साफ है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए ही गुजरात विधानसभा चुनाव आसान नहीं रहने वाले हैं। दोनों ही दल सत्ता तक पहुँचने के लिए जरुरी सभी सियासी समीकरणों को साधने में लगे हुए हैं। दोनों ही दलों के सामने चुनौती भी एक सी है। कांग्रेस के लिए यह चुनाव वजूद बचाए रखने का चुनाव है वहीं भाजपा के लिए यह चुनाव बादशाहत बनाए रखने का चुनाव है। यह बात भी स्पष्ट है कि गुजरात विधानसभा चुनावों पर भाजपा, कांग्रेस ही नहीं वरन सभी राजनीतिक दलों की निगाहें जमी होंगी और इसके परिणाम ही देश की राजनीति की दिशा तय करेंगे।

About the author

हिमांशु पांडेय

हिमांशु पाण्डेय दा इंडियन वायर के हिंदी संस्करण पर राजनीति संपादक की भूमिका में कार्यरत है। भारत की राजनीति के केंद्र बिंदु माने जाने वाले उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले हिमांशु भारत की राजनीतिक उठापटक से पूर्णतया वाकिफ है।

मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक करने के बाद, राजनीति और लेखन में उनके रुझान ने उन्हें पत्रकारिता की तरफ आकर्षित किया। हिमांशु दा इंडियन वायर के माध्यम से ताजातरीन राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर अपने विचारों को आम जन तक पहुंचाते हैं।

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