दा इंडियन वायर » अर्थशास्त्र » गिरते रूपये की मार शहरी मध्यम वर्ग पर सबसे ज्यादा
अर्थशास्त्र व्यापार

गिरते रूपये की मार शहरी मध्यम वर्ग पर सबसे ज्यादा

मध्यम वर्ग पर रूपये के गिरने का असर

भारतीय रूपये की रिकॉर्ड गिरावट ने भारतीय समाज के सभी वर्गों को गहरी चिंता में डाल दिया है। कम्पनिया, निर्यातक, छुट्टी पर जाने वाले लोग, पढाई के लिए विदेश जाने की तैयारी में लगे छात्र- इन सभी के लिए ये चिंता का विषय है।

चूँकि ये समस्या अभी तक ज्यों की त्यों है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए आगामी बड़े राज्य के चुनावों या अगले आम चुनाव से पहले काम और भी कठिन हो गया है।

चाहें वो कच्चा तेल हो या इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर सोना, भारत इन सभी का एक बड़ा खरीददार है और मार्च 2019 में इस विपणन वर्ष के ख़त्म होने तक इसका आयात बिल 600 बिलियन डॉलर से भी ज्यादा होने की उम्मीद है। पिछले साल ये आंकडा 565 बिलियन डॉलर था। रूपये की कीमत में 9.3% की गिरावट ने पहले ही लोकल स्तर पर बाजारों में ऐसी सभी चीजों के दाम बढ़ा दिए हैं जिसमे आयातित वस्तुओं का प्रयोग होता है। जुलाई लगातार ऐसा नौवा महीना था जब भारत में महंगाई केंद्रीय बैंक के मध्यम टर्म टारगेट चार प्रतिशत से ज्यादा था।

बीते गुरुवार को 1 डॉलर की कीमत 70.25 रूपये चल रही थी और इसने अब तक के अबसे नीचले स्तर 70.40 को भी छुआ।

“रूपये में इतनी बड़ी गिरावट हमारे लिए झटका देने वाली सूचना है” अपने परिवार से मिलने अमेरिका जा रहे दिल्ली के एक सीनियर सरकारी अधिकारी ने ये बात कही “अब मुझे इस यात्रा पर दस हजार रूपये ज्यादा खर्च करने पड़ेंगे।”

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) शहरी माध्यम वर्गीय लोगों को अपने वोट बैंक का एक बड़ा आधार मानती है और गिर रहे रुपये की सबसे ज्यादा मार भी इन्ही लोगों पर पड़ रही है।

वहीं दूसरी तरफ विपक्षी कांग्रेस ने सरकार की गलत नीतियों को इस समस्या का जिम्मेदार ठहराया है और इसे अर्थव्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी का संकेत बताया।

ओआरएफ यानी आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के एक सीनियर फेलो ने बताया कि यद्दपि रूपये के गिरने के पीछे बहुत सारे कारण हैं, लेकिन सरकार की इमेज पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। “चूँकि सभी चीजों के दाम बढ़ेंगे और महंगाई बेलगाम हो सकती है, ऐसे में मध्यम वर्ग का गुस्सा सरकार को झेलना पड़ सकता है क्योंकि वो किसी भी चुनाव में निर्णायक शक्ति होते हैं” उन्होंने कहा।

वहीं सरकार ने इस समस्या का ठिकरा तुर्की के वित्तीय संकट पर फोड़ा और कहा कि उसी कारण सभी विकाशशील देशों की मुद्रा नीचे गिर रही है। “टर्की में उत्पन्न हुए वित्तीय संकट और मजबूत होते डॉलर ने दुनिया भर के विकासशील देशों की मुद्रा पर प्रभाव डाला है और ये इसी का परिणाम है ” सीनियर कैबिनेट मंत्री अरुण जेटली ने बुधवार को ये बात कही “हलांकि भारतीय अर्थव्यवस्था के सूक्ष्म आधार अभी भी मजबूत और सही हैं, लेकिन फिर भी हम सारी घटनाओं पर कड़ी नजर रख रहे हैं ताकि पल-पल बदलते वैश्विक घटनाक्रमों के प्रभाव का अगर कोई गलत असर हो तो हम उस से निबटने के लिए पहले से ही तैयार रहें।”

हलांकि कुछ ऐसे भी सेक्टर हैं जिन्हें रूपये के गिरने का फायदा भी हुआ है, जैसे कि आईटी सेक्टर और सॉफ्टवेर की आयातक कम्पनियां।

थोमसन रयूटर इंडिया आईटी & कंसल्टिंग शेयर इंडेक्स जिसमे बड़ी कम्पनियां जैसे कि इनफ़ोसिस, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, विप्रो, एचसीएल टेक्नोलॉजी इत्यादि शामिल हैं, उनका इस साल लगभग 31% विकास हुआ है।

जिन भारतीय कम्पनियों ने विदेशों से पैसा जुटाया है वो सर्विसिंग के बढ़ते कीमत को लेकर चिंता जाहिर का रही है। भारत की बाहरी लेनदारी मार्च तक 530 बिलियन डॉलर तक बढ़ गई है वहीं कई कम्पनियों ने कहा कि रूपये में भारी गिरावट से उनके मार्जिन पर बुरा असर पडा है।

नई दिल्ली में आधारित जिंदल स्टेंलेस लिमिटेड ने कहा कि चूँकि ये चीजों का भरी मात्रा में आयात करता है, इसीलिए इस से उन्हें और ज्यादा मार पड़ी है। बता दें कि ये कम्पनी स्टील पर आयात शुल्क घटाने की भी मांग करती आ रही है। मैनेजिंग डायरेक्टर अभ्युदय जिंदल ने कहा कि रूपये के गिरने से ये समस्या और भी बढ़ गई है।

बांकी कम्पनियां जैसे कि जेएसडब्ल्यू स्टील्स लिमिटेड और जीवीके ग्रुप जो ऊर्जा, संसाधन, एअरपोर्ट, ट्रांसपोर्ट और अस्पताल के क्षेत्रों में काम करती है, वो भी ज्यादा इनपुट कोस्ट का सामना कर रही है। अगर इसका कुछ भार ग्राहकों पर नहीं डाला गया तो कम्पनी को नुकसान उठाना पड़ सकता है। “अगर आप देखें तो इस साल महंगाई 4.5 प्रतिशत के दर पर है, इसीलिए हम रुपये के स्थिर होने की उम्मीद नहीं कर सकते” जेएसडब्ल्यू के जॉइंट मैनेजिंग डायरेक्टर सेशागिरी राव ने कहा जो कि कोयले का एक बहुत बड़ा आयातक है- “सभी को रूपये के गिरने का अंदाजा था लेकिन ये काफी तेजी से हो रहा है”।

महंगाई को काबू में करने के लिए और गिरते रूपये को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक ने ब्याज दर को दो लगातार पालिसी मीटिंग में 50 बेसिस पॉइंट तक बढ़ा दिया। एक मीटिंग अप्रैल में हुई थी और एक हाल ही में अगस्त में हुई है।

अगर रूपये की कुछ दिन और यही स्थिति रहती है तो सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स कम करने की घोषणा कर सकती है ताकि ग्राहकों के गुस्से से बचा जा सके,- एक वित्त मंत्रालय के अधिकारी ने ये सूचना दी। एक एक्सपर्ट ने कहा कि अभी महंगाई में और बढ़ोतरी होने की आशंका है जो विकास पर सीधा असर करेगा।

About the author

अनुपम कुमार सिंह

बीआईटी मेसरा, रांची से कंप्यूटर साइंस और टेक्लॉनजी में स्नातक। गाँधी कि कर्मभूमि चम्पारण से हूँ। समसामयिकी पर कड़ी नजर और इतिहास से ख़ास लगाव। भारत के राजनितिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक इतिहास में दिलचस्पी ।

Add Comment

Click here to post a comment




फेसबुक पर दा इंडियन वायर से जुड़िये!