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गर्भ का चिकित्‍सकीय समापन (संशोधन) विधेयक, 2021: क्या है महिलाओं को अपने शरीर पर अधिकार?

मार्च में संपन्न हुए बजट सत्र में राज्य सभा ने गर्भ का चिकित्‍सकीय समापन (संशोधन) विधेयक, 2021 [Medical Termination of Pregnancy (Amendment) Bill, 2021] पारित किया। यह विधेयक गर्भ का चिकित्‍सकीय समापन अधिनियम, 1971 में संशोधन करता है। इस अधिनियम का उद्देश्य महिलाओं के गर्भपात के लिये गर्भावस्था की सीमा को 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह करना है, इस संशोधन के माध्यम से महिलाओं के लिये वैधानिक रूप से अवांछित और सुरक्षित गर्भपात कराना आसान हो जाएगा।

क्या था 1971 का कानून

वर्ष 1971 से पूर्व भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 312 के तहत गर्भपात को आपराधिक कृत्य घोषित किया गया था। 1971 की धारा 3 की उप-धारा (2) व उप-धारा (4) के अनुसार, कोई भी पंजीकृत डॉक्टर गर्भपात कर सकता था। यदि गर्भावस्था की अवधि 12 सप्ताह से अधिक नहीं है या फिर गर्भावस्था की अवधि 12 सप्ताह से अधिक है किंतु 20 सप्ताह से अधिक नहीं है, तो गर्भपात उसी स्थिति में हो सकता है जब दो डॉक्टर ऐसा मानते हैं कि यदि गर्भपात नहीं किया गया तो गर्भवती महिला का जीवन खतरे में पड़ सकता है या यदि गर्भाधान का कारण बलात्कार हो या यदि बच्चों की संख्या को सीमित रखने के उद्देश्य से दंपति ने जो गर्भ निरोधक तरीका अपनाया हो वह विफल हो जाए।

क्या थीं 1971 के क़ानून में समस्याएं

भारत में गर्भपात वास्तविक अर्थों में कानूनी अधिकार नहीं है। कोई महिला डॉक्टर के पास जाकर यह नहीं कह सकती कि वह गर्भपात करवाना चाहती है। सुरक्षित कानूनी गर्भपात उसी स्थिति में हो सकता है अगर डॉक्टर कहे कि ऐसा करना ज़रूरी है। अरसे से महिलाएं और चिकित्सक इसकी मांग कर रहे थे। अदालत ने भी इसके लिए आग्रह किया था। इसके पीछे दलील यह दी गई कि अगर महिला को गर्भवती होने का अधिकार है, अपने शरीर पर उसका अधिकार है तो गर्भपात करवाना है या नहीं इसका भी हक उसी के पास होना चाहिए। बच्चे को जन्म देना ही अहम नहीं होता।

1971 के (2014 में संशोधित) कानून में कई तरह की दिक्कतें आ रही थीं खासकर नाबालिग़ दुष्कर्म पीड़िताओं के मामले में। कई मामलों में तो गर्भधारण का पता ही 20 हफ्ते के बाद चला। उसके बाद वर्तमान कानून के तहत अबॉर्शन नहीं हो सकता था। ऐसे में कई नाबालिग़ों को मजबूरन बच्चे को जन्म देना पड़ा। यही नहीं कई बार कानूनी कार्रवाई और कोर्ट से इजाजत लेने में बहुत समय लग जाता है। इस वजह से भी कई रेप पीड़िताएं और पॉक्सो विक्टिम अपना गर्भपात नहीं करा पाती थीं।

कानून की उलझनों की वजह से ही उन मामलों में भी गर्भपात नहीं हो पाया जिनमें बच्चे के किसी विकृति के साथ जन्म लेने की आशंका थी। विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ विशेष शारीरिक और मानसिक स्थितियों को गर्भावस्था के पाँचवें और छठे महीने के पश्चात् ही पहचाना जा सकता है।

देश में कुल मातृ मृत्यु दर का जो आंकड़ा है उसमें 8 फीसदी मौतें असुरक्षित तरीके से होने वाले गर्भपात के कारण होती हैं। वर्ष 2015 में केवल 7 लाख गर्भपात ही सरकारी दस्तावेज़ों में दर्ज़ किये गए, जबकि शेष आंकलित गर्भपात गैर कानूनी ढंग से चल रहे क्लीनिक में बिना किसी सुरक्षा के डॉक्टरों के द्वारा चोरी छुपे किये गए।

क्या हैं नए क़ानून में प्रावधान

इस विधेयक के मुताबिक गर्भावस्था के 20 सप्ताह तक गर्भपात कराने के लिये एक चिकित्सक की राय लेने का प्रस्ताव किया गया है और गर्भावस्था के 20 से 24 सप्ताह तक गर्भपात कराने के लिये दो चिकित्सकों की राय लेना ज़रूरी होगा। इन महिलाओं में दुष्कर्म पीड़ित, सगे-संबंधियों के साथ यौन संपर्क की पीड़ित और अन्य असुरक्षित महिलाएँ (दिव्यांग महिलाएँ, नाबालिग़) शामिल होंगी।

भ्रूण से संबंधित गंभीर असामान्यता के मामले में 24 सप्ताह के बाद गर्भ की समाप्ति के लिये राज्य-स्तरीय चिकित्सीय बोर्ड की राय लेना आवश्यक होगा। इस मेडिकल बोर्ड में स्त्री रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ, रेडियोलॉजिस्ट या सोनोलॉजिस्ट और राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य कोई सदस्य शामिल होंगे। गर्भ को समाप्त करने वाली किसी महिला का नाम और अन्य विवरण, कानून में अधिकृत व्यक्ति को छोड़कर, किसी के भी समक्ष प्रकट नहीं किया जाएगा।

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परिवार में पुत्र को वरीयता दिये जाने के कारण लिंग निर्धारण केंद्रों का व्यापार अवैध होने के बावजूद चलता रहता है। ऐसे में गर्भपात कानून को और अधिक उदार बनाए जाने से इस प्रकार के मामलों में वृद्धि हो सकती है। इससे लिंग-निर्धारण के अवैध कृत्य को प्रोत्साहन मिल सकता है। वर्तमान विधेयक में व्यक्तिगत पसंद, परिस्थितियों में अचानक परिवर्तन (जैसे साथी से अलग होने या मृत्यु के कारण) तथा घरेलू हिंसा जैसे घटकों पर विचार नहीं किया गया है।

वर्तमान में स्वास्थ्य देखभाल हेतु आवंटित बजट में देश भर में एक बोर्ड का गठन करना आर्थिक और व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है और न ही अनुरोधों एवं याचिकाओं का जवाब देने के लिये कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं की गई है। बोर्ड महिला को गर्भ के समापन की अनुमति देने से पहले विभिन्न प्रकार के परीक्षण कराएगा जो कि निजता के अधिकार और सम्मान के साथ जीवन जीने के अधिकार का उल्लंघन करता प्रतीत होता है।

कई विश्लेषकों ने मुख्य रूप से ग्रामीण महिलाओं के संबंध में चिंता व्यक्त की है, जिनके पास डॉक्टर तक पर्याप्त पहुँच नहीं है। भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र के बुनियादी ढाँचे को देखते हुए यह स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है।आँकड़ों के अनुसार, भारत के 1.3 बिलियन लोगों के लिये देश में सिर्फ 10 लाख पंजीकृत डॉक्टर हैं। इस हिसाब से भारत में प्रत्येक 13000 नागरिकों पर मात्र 1 डॉक्टर मौजूद है।

क्या हो सकते हैं आगे के कदम

यद्यपि गर्भ का चिकित्सकीय समापन (संशोधन) विधेयक, 2021 सही दिशा में उठाया गया एक कदम है फिर भी गर्भपात को सुविधाजनक बनाने के लिये सरकार को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि देश भर के स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों में नैदानिक प्रक्रियाओं से संबंधित सभी मानदंडों और मानकीकृत प्रोटोकॉल का पालन किया जाए। इसके साथ ही मानव अधिकारों, ठोस वैज्ञानिक सिद्धांतों और प्रौद्योगिकी में उन्नति के अनुरूप गर्भपात के मामले पर फैसला लिया जाना चाहिये।

जब तक प्रजनन आयु समूह की प्रत्येक महिला के पास प्रस्तावित कानून का उपयोग करने की क्षमता नहीं होगी, तब तक इस संशोधन की सफलता सुनिश्चित नहीं की जा सकेगी। आवश्यक है कि जिस प्रकार सरकार ने सुदूर गाँवों के रोगियों को मोतियाबिंद के ऑपरेशन से लाभान्वित करने और प्रसव के लिये संस्थागत सुविधाओं का उपयोग करने में सक्षम बनाया है उसी प्रकार गर्भपात से संबंधित नियमों का लाभ प्राप्त करने के लिये भी सक्षम बनाए।

About the author

आदित्य सिंह

दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास का छात्र। खासतौर पर इतिहास, साहित्य और राजनीति में रुचि।

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